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इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पहली बार तैनात हुआ स्निफर डॉग, जंगल में छिपे शिकारियों के फंदे सूंघकर खोजेगा;

Indravati Tiger Reserve deploys first sniffer dog to detect poachers' snares,

Kanpur Live News Desk ·

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इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पहली बार तैनात हुआ स्निफर डॉग, जंगल में छिपे शिकारियों के फंदे सूंघकर खोजेगा;
जंगलों में बेजुबान वन्यजीवों की जान लेने वाले शिकारियों के खिलाफ अब एक नया और खास योद्धा मैदान में उतरा है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में स्थित इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पहली बार एक प्रशिक्षित स्निफर डॉग तैनात किया गया है। यह डॉग जंगल में शिकारियों द्वारा छिपाकर बिछाए गए फंदों को अपनी सूंघने की असाधारण क्षमता से खोज निकालेगा। वन विभाग ने इस डॉग स्क्वॉड की मदद से एंटी-स्नेर वॉक और मॉक ड्रिल भी शुरू कर दी है। वन्यजीव संरक्षण की दिशा में इसे एक अहम और सराहनीय कदम माना जा रहा है। पहली बार तैनात हुआ स्निफर डॉग बस्तर के घने जंगलों में शिकारी अक्सर वन्यजीवों को फंसाने के लिए फंदे बिछाते हैं। इन फंदों को बेअसर करने के उद्देश्य से इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पहली बार एक प्रशिक्षित स्निफर डॉग तैनात किया गया है। यह डॉग न केवल छिपाए गए फंदों की खोज करता है, बल्कि गंध के सहारे संभावित संदिग्ध शिकारियों के ठिकानों तक पहुंचने का अभ्यास भी कर रहा है। वन विभाग गश्त को और मजबूत बनाने के लिए तकनीक और डॉग स्क्वॉड के बीच तालमेल बिठा रहा है। आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षित डॉग की क्षमता के मेल से जंगल की निगरानी पहले से कहीं ज्यादा प्रभावी हो सकेगी। कैसे होती है मॉक ड्रिल अभ्यास के दौरान वन अमला जंगल में एक तय स्थान पर फंदा छिपाकर रखता है। इसके बाद स्निफर डॉग को फंदे की गंध सुंघाकर सुराग का पीछा करने के लिए छोड़ा जाता है। डॉग स्क्वॉड गंध के आधार पर आगे बढ़ते हुए संभावित संदिग्ध के स्थान तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया को दोहराता है। इस तरह के नियमित अभ्यास से वन कर्मियों और डॉग स्क्वॉड के बीच तालमेल बेहतर हो रहा है। दुर्गम इलाकों में किए जा रहे ये अभ्यास वास्तविक अभियानों के लिए टीम को तैयार कर रहे हैं। क्यों जरूरी था यह कदम इंद्रावती टाइगर रिजर्व का वन क्षेत्र बेहद विशाल है। घनी झाड़ियों और दुर्गम परिस्थितियों के कारण सामान्य पैदल गश्त के दौरान हर फंदे को खोज पाना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। शिकारी अक्सर फंदा लगाने के बाद तुरंत वहां से चले जाते हैं। ऐसे में प्रशिक्षित डॉग की सूंघने और पीछा करने की क्षमता वन अमले के काम को आसान बना रही है। बाघ से लेकर हिरण तक खतरे में शिकारियों के ये फंदे बाघ, तेंदुए, हिरण और जंगली सूअर समेत कई वन्यजीवों की जान के लिए बड़ा खतरा हैं। फंदे में फंसकर बेजुबान जीव गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं या उनकी मौत हो जाती है। फंदे यानी स्नेयर आमतौर पर लोहे के तार, केबल या मजबूत रस्सी से बनाए जाते हैं। इन्हें जानवरों के आने-जाने वाले रास्तों, पानी के स्रोतों के आसपास या झाड़ियों में छिपाकर लगाया जाता है। जब कोई जानवर इसमें पैर या गर्दन फंसा देता है, तो छूटने की कोशिश में फंदा और कसता जाता है। कई बार जानवर घंटों या दिनों तक तड़पते रहते हैं। बाघ और तेंदुए जैसे बड़े शिकारी जानवर भी कई बार ऐसे फंदों का शिकार हो जाते हैं, भले ही फंदा किसी छोटे जानवर के लिए लगाया गया हो। एंटी-स्नेर वॉक क्या है एंटी-स्नेर वॉक वन विभाग का एक खास अभियान होता है, जिसमें वनकर्मी समूह बनाकर जंगल के संवेदनशील इलाकों में पैदल गश्त करते हैं और शिकारियों द्वारा लगाए गए फंदों को खोजकर हटाते हैं। ये अभियान खासतौर पर उन इलाकों में चलाए जाते हैं, जहां वन्यजीवों की आवाजाही ज्यादा होती है, जैसे जलस्रोतों के पास, जंगल के रास्तों और गांवों से सटे इलाकों में। स्निफर डॉग के जुड़ने से अब इन अभियानों की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाएगी, क्योंकि डॉग उन फंदों को भी ढूंढ सकता है, जो घनी झाड़ियों या पत्तियों के नीचे छिपे होते हैं और आंखों से नजर नहीं आते। पंचकूला से मिला विशेष प्रशिक्षण इस अभियान में शामिल स्निफर डॉग ने हरियाणा के पंचकूला स्थित डॉग प्रशिक्षण केंद्र से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया है। डॉग के साथ उसके हैंडलर को भी गहन प्रशिक्षण दिया गया है। प्रशिक्षण के दौरान डॉग को फंदे की गंध पहचानने और उसके आधार पर सुराग जुटाने में पारंगत बनाया गया। वहीं हैंडलर को डॉग के शारीरिक संकेतों को समझने और वन कर्मियों के साथ मिलकर संयुक्त तलाशी अभियान चलाने का तरीका सिखाया गया है। हैंडलर की भूमिका: किसी भी स्निफर डॉग की सफलता उसके हैंडलर पर बहुत हद तक निर्भर करती है। डॉग और हैंडलर के बीच गहरा भरोसा और समझ होनी चाहिए। डॉग जब किसी गंध को पहचानता है, तो वह खास तरह के संकेत देता है, जैसे रुक जाना, बैठ जाना या किसी दिशा में खींचना। इन संकेतों को सही समय पर पढ़ना हैंडलर का काम होता है। कुत्तों की सूंघने की अद्भुत क्षमता कुत्तों की सूंघने की क्षमता इंसानों से कई हजार गुना ज्यादा होती है। उनकी नाक में गंध पहचानने वाली कोशिकाओं की संख्या बहुत अधिक होती है और उनके मस्तिष्क का बड़ा हिस्सा गंध के विश्लेषण में लगा रहता है। यही वजह है कि कुत्ते बेहद हल्की और पुरानी गंध को भी पहचान लेते हैं। इसी क्षमता का इस्तेमाल पुलिस, सेना और सुरक्षा एजेंसियां विस्फोटक, नशीले पदार्थ खोजने और अपराधियों का पता लगाने में करती हैं। अब यही क्षमता वन्यजीवों की सुरक्षा में भी काम आ रही है। देश में वन्यजीव अपराधों के खिलाफ डॉग स्क्वॉड भारत के कई टाइगर रिजर्व और राष्ट्रीय उद्यानों में वन्यजीव अपराधों से निपटने के लिए डॉग स्क्वॉड का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये डॉग बाघ की खाल, हाथी दांत, पैंगोलिन के शल्क और अन्य वन्यजीव अंगों की तस्करी पकड़ने में मदद करते हैं। कई मामलों में इन डॉग्स की मदद से शिकारियों और तस्करों तक पहुंचने में सफलता मिली है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व में डॉग स्क्वॉड की तैनाती इसी सफल मॉडल को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व: एक परिचय इंद्रावती टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में स्थित है और इसका नाम यहां से बहने वाली इंद्रावती नदी के नाम पर पड़ा है। यह छत्तीसगढ़ के प्रमुख संरक्षित वन क्षेत्रों में से एक है। साल और सागौन के घने जंगल, घास के मैदान और नदियां इसे विविध वन्यजीवों का प्राकृतिक घर बनाते हैं। यहां बाघ, तेंदुआ, जंगली भैंसा, गौर, भालू, चीतल, सांभर और कई तरह के पक्षी पाए जाते हैं। यह क्षेत्र दुर्लभ जंगली भैंसे यानी वाइल्ड बफेलो के लिए भी जाना जाता है, जो छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु है। बाघ संरक्षण में भारत की भूमिका भारत दुनिया में सबसे ज्यादा जंगली बाघों का घर है। 1973 में शुरू हुए प्रोजेक्ट टाइगर के बाद देश में बाघों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं। आज देश में कई टाइगर रिजर्व हैं और बाघों की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि शिकार, आवास का नुकसान और इंसान-वन्यजीव संघर्ष अभी भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में शिकार रोकने के लिए हर नया और प्रभावी तरीका बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में भी हैं टाइगर रिजर्व उत्तर प्रदेश में भी दुधवा, पीलीभीत और अमानगढ़ जैसे प्रमुख बाघ संरक्षित क्षेत्र हैं। तराई के इन जंगलों में बाघ, तेंदुआ, हाथी, गैंडा और बारहसिंगा जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं। यहां भी शिकार और इंसान-वन्यजीव संघर्ष की चुनौतियां रहती हैं। इंद्रावती जैसे प्रयोगों की सफलता दूसरे राज्यों के टाइगर रिजर्व के लिए भी मॉडल बन सकती है। वन्यजीव संरक्षण में आम लोगों की भूमिका वन्यजीवों की रक्षा केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। आम नागरिक भी कई तरह से इसमें योगदान दे सकते हैं: वन्यजीवों के अंगों से बने उत्पाद जैसे खाल, दांत, नाखून या शल्क कभी न खरीदें। जंगल या संरक्षित क्षेत्रों में घूमते समय नियमों का पालन करें और कचरा न फैलाएं। शिकार या वन्यजीव तस्करी की कोई जानकारी मिले, तो तुरंत वन विभाग या पुलिस को सूचना दें। बच्चों को प्रकृति और वन्यजीवों के महत्व के बारे में जागरूक करें। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े अभियानों और संस्थाओं का समर्थन करें। वन्यजीव संरक्षण कानून भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत बाघ, तेंदुआ और कई अन्य वन्यजीवों का शिकार गंभीर अपराध है। इसके लिए कड़ी सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। वन्यजीवों के अंगों का व्यापार भी पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद अवैध शिकार और तस्करी के मामले सामने आते रहते हैं, इसलिए निगरानी और सख्ती दोनों जरूरी हैं। तकनीक और परंपरा का मेल आज वन विभाग ड्रोन, कैमरा ट्रैप, जीपीएस आधारित गश्त और डिजिटल निगरानी जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। इसके साथ प्रशिक्षित डॉग जैसे परंपरागत लेकिन बेहद प्रभावी तरीके भी जोड़े जा रहे हैं। तकनीक जहां बड़े क्षेत्र पर नजर रखने में मदद करती है, वहीं डॉग जमीन पर छिपी उन चीजों तक पहुंच जाता है, जिन्हें कैमरा या ड्रोन नहीं देख पाते। दोनों का मेल जंगलों की सुरक्षा को कई गुना मजबूत बना सकता है। निष्कर्ष इंद्रावती टाइगर रिजर्व में स्निफर डॉग की तैनाती वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक नवाचारी और सराहनीय पहल है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो इससे शिकारियों के फंदों से हर साल कई बेजुबानों की जान बचाई जा सकेगी। साथ ही यह मॉडल देश के दूसरे टाइगर रिजर्व और संरक्षित क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। पर्यावरण, वन्यजीव और प्रकृति से जुड़ी हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।

इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पहली बार तैनात हुआ स्निफर डॉग, जंगल में छिपे शिकारियों के फंदे सूंघकर खोजेगा;

जंगलों में बेजुबान वन्यजीवों की जान लेने वाले शिकारियों के खिलाफ अब एक नया और खास योद्धा मैदान में उतरा है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में स्थित इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पहली बार एक प्रशिक्षित स्निफर डॉग तैनात किया गया है। यह डॉग जंगल में शिकारियों द्वारा छिपाकर बिछाए गए फंदों को अपनी सूंघने की असाधारण क्षमता से खोज निकालेगा। वन विभाग ने इस डॉग स्क्वॉड की मदद से एंटी-स्नेर वॉक और मॉक ड्रिल भी शुरू कर दी है। वन्यजीव संरक्षण की दिशा में इसे एक अहम और सराहनीय कदम माना जा रहा है। पहली बार तैनात हुआ स्निफर डॉग बस्तर के घने जंगलों में शिकारी अक्सर वन्यजीवों को फंसाने के लिए फंदे बिछाते हैं। इन फंदों को बेअसर करने के उद्देश्य से इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पहली बार एक प्रशिक्षित स्निफर डॉग तैनात किया गया है। यह डॉग न केवल छिपाए गए फंदों की खोज करता है, बल्कि गंध के सहारे संभावित संदिग्ध शिकारियों के ठिकानों तक पहुंचने का अभ्यास भी कर रहा है। वन विभाग गश्त को और मजबूत बनाने के लिए तकनीक और डॉग स्क्वॉड के बीच तालमेल बिठा रहा है। आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षित डॉग की क्षमता के मेल से जंगल की निगरानी पहले से कहीं ज्यादा प्रभावी हो सकेगी। कैसे होती है मॉक ड्रिल अभ्यास के दौरान वन अमला जंगल में एक तय स्थान पर फंदा छिपाकर रखता है। इसके बाद स्निफर डॉग को फंदे की गंध सुंघाकर सुराग का पीछा करने के लिए छोड़ा जाता है। डॉग स्क्वॉड गंध के आधार पर आगे बढ़ते हुए संभावित संदिग्ध के स्थान तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया को दोहराता है। इस तरह के नियमित अभ्यास से वन कर्मियों और डॉग स्क्वॉड के बीच तालमेल बेहतर हो रहा है। दुर्गम इलाकों में किए जा रहे ये अभ्यास वास्तविक अभियानों के लिए टीम को तैयार कर रहे हैं। क्यों जरूरी था यह कदम इंद्रावती टाइगर रिजर्व का वन क्षेत्र बेहद विशाल है। घनी झाड़ियों और दुर्गम परिस्थितियों के कारण सामान्य पैदल गश्त के दौरान हर फंदे को खोज पाना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। शिकारी अक्सर फंदा लगाने के बाद तुरंत वहां से चले जाते हैं। ऐसे में प्रशिक्षित डॉग की सूंघने और पीछा करने की क्षमता वन अमले के काम को आसान बना रही है। बाघ से लेकर हिरण तक खतरे में शिकारियों के ये फंदे बाघ, तेंदुए, हिरण और जंगली सूअर समेत कई वन्यजीवों की जान के लिए बड़ा खतरा हैं। फंदे में फंसकर बेजुबान जीव गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं या उनकी मौत हो जाती है। फंदे यानी स्नेयर आमतौर पर लोहे के तार, केबल या मजबूत रस्सी से बनाए जाते हैं। इन्हें जानवरों के आने-जाने वाले रास्तों, पानी के स्रोतों के आसपास या झाड़ियों में छिपाकर लगाया जाता है। जब कोई जानवर इसमें पैर या गर्दन फंसा देता है, तो छूटने की कोशिश में फंदा और कसता जाता है। कई बार जानवर घंटों या दिनों तक तड़पते रहते हैं। बाघ और तेंदुए जैसे बड़े शिकारी जानवर भी कई बार ऐसे फंदों का शिकार हो जाते हैं, भले ही फंदा किसी छोटे जानवर के लिए लगाया गया हो। एंटी-स्नेर वॉक क्या है एंटी-स्नेर वॉक वन विभाग का एक खास अभियान होता है, जिसमें वनकर्मी समूह बनाकर जंगल के संवेदनशील इलाकों में पैदल गश्त करते हैं और शिकारियों द्वारा लगाए गए फंदों को खोजकर हटाते हैं। ये अभियान खासतौर पर उन इलाकों में चलाए जाते हैं, जहां वन्यजीवों की आवाजाही ज्यादा होती है, जैसे जलस्रोतों के पास, जंगल के रास्तों और गांवों से सटे इलाकों में। स्निफर डॉग के जुड़ने से अब इन अभियानों की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाएगी, क्योंकि डॉग उन फंदों को भी ढूंढ सकता है, जो घनी झाड़ियों या पत्तियों के नीचे छिपे होते हैं और आंखों से नजर नहीं आते। पंचकूला से मिला विशेष प्रशिक्षण इस अभियान में शामिल स्निफर डॉग ने हरियाणा के पंचकूला स्थित डॉग प्रशिक्षण केंद्र से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया है। डॉग के साथ उसके हैंडलर को भी गहन प्रशिक्षण दिया गया है। प्रशिक्षण के दौरान डॉग को फंदे की गंध पहचानने और उसके आधार पर सुराग जुटाने में पारंगत बनाया गया। वहीं हैंडलर को डॉग के शारीरिक संकेतों को समझने और वन कर्मियों के साथ मिलकर संयुक्त तलाशी अभियान चलाने का तरीका सिखाया गया है। हैंडलर की भूमिका: किसी भी स्निफर डॉग की सफलता उसके हैंडलर पर बहुत हद तक निर्भर करती है। डॉग और हैंडलर के बीच गहरा भरोसा और समझ होनी चाहिए। डॉग जब किसी गंध को पहचानता है, तो वह खास तरह के संकेत देता है, जैसे रुक जाना, बैठ जाना या किसी दिशा में खींचना। इन संकेतों को सही समय पर पढ़ना हैंडलर का काम होता है। कुत्तों की सूंघने की अद्भुत क्षमता कुत्तों की सूंघने की क्षमता इंसानों से कई हजार गुना ज्यादा होती है। उनकी नाक में गंध पहचानने वाली कोशिकाओं की संख्या बहुत अधिक होती है और उनके मस्तिष्क का बड़ा हिस्सा गंध के विश्लेषण में लगा रहता है। यही वजह है कि कुत्ते बेहद हल्की और पुरानी गंध को भी पहचान लेते हैं। इसी क्षमता का इस्तेमाल पुलिस, सेना और सुरक्षा एजेंसियां विस्फोटक, नशीले पदार्थ खोजने और अपराधियों का पता लगाने में करती हैं। अब यही क्षमता वन्यजीवों की सुरक्षा में भी काम आ रही है। देश में वन्यजीव अपराधों के खिलाफ डॉग स्क्वॉड भारत के कई टाइगर रिजर्व और राष्ट्रीय उद्यानों में वन्यजीव अपराधों से निपटने के लिए डॉग स्क्वॉड का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये डॉग बाघ की खाल, हाथी दांत, पैंगोलिन के शल्क और अन्य वन्यजीव अंगों की तस्करी पकड़ने में मदद करते हैं। कई मामलों में इन डॉग्स की मदद से शिकारियों और तस्करों तक पहुंचने में सफलता मिली है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व में डॉग स्क्वॉड की तैनाती इसी सफल मॉडल को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व: एक परिचय इंद्रावती टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में स्थित है और इसका नाम यहां से बहने वाली इंद्रावती नदी के नाम पर पड़ा है। यह छत्तीसगढ़ के प्रमुख संरक्षित वन क्षेत्रों में से एक है। साल और सागौन के घने जंगल, घास के मैदान और नदियां इसे विविध वन्यजीवों का प्राकृतिक घर बनाते हैं। यहां बाघ, तेंदुआ, जंगली भैंसा, गौर, भालू, चीतल, सांभर और कई तरह के पक्षी पाए जाते हैं। यह क्षेत्र दुर्लभ जंगली भैंसे यानी वाइल्ड बफेलो के लिए भी जाना जाता है, जो छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु है। बाघ संरक्षण में भारत की भूमिका भारत दुनिया में सबसे ज्यादा जंगली बाघों का घर है। 1973 में शुरू हुए प्रोजेक्ट टाइगर के बाद देश में बाघों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं। आज देश में कई टाइगर रिजर्व हैं और बाघों की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि शिकार, आवास का नुकसान और इंसान-वन्यजीव संघर्ष अभी भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में शिकार रोकने के लिए हर नया और प्रभावी तरीका बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में भी हैं टाइगर रिजर्व उत्तर प्रदेश में भी दुधवा, पीलीभीत और अमानगढ़ जैसे प्रमुख बाघ संरक्षित क्षेत्र हैं। तराई के इन जंगलों में बाघ, तेंदुआ, हाथी, गैंडा और बारहसिंगा जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं। यहां भी शिकार और इंसान-वन्यजीव संघर्ष की चुनौतियां रहती हैं। इंद्रावती जैसे प्रयोगों की सफलता दूसरे राज्यों के टाइगर रिजर्व के लिए भी मॉडल बन सकती है। वन्यजीव संरक्षण में आम लोगों की भूमिका वन्यजीवों की रक्षा केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। आम नागरिक भी कई तरह से इसमें योगदान दे सकते हैं: वन्यजीवों के अंगों से बने उत्पाद जैसे खाल, दांत, नाखून या शल्क कभी न खरीदें। जंगल या संरक्षित क्षेत्रों में घूमते समय नियमों का पालन करें और कचरा न फैलाएं। शिकार या वन्यजीव तस्करी की कोई जानकारी मिले, तो तुरंत वन विभाग या पुलिस को सूचना दें। बच्चों को प्रकृति और वन्यजीवों के महत्व के बारे में जागरूक करें। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े अभियानों और संस्थाओं का समर्थन करें। वन्यजीव संरक्षण कानून भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत बाघ, तेंदुआ और कई अन्य वन्यजीवों का शिकार गंभीर अपराध है। इसके लिए कड़ी सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। वन्यजीवों के अंगों का व्यापार भी पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद अवैध शिकार और तस्करी के मामले सामने आते रहते हैं, इसलिए निगरानी और सख्ती दोनों जरूरी हैं। तकनीक और परंपरा का मेल आज वन विभाग ड्रोन, कैमरा ट्रैप, जीपीएस आधारित गश्त और डिजिटल निगरानी जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। इसके साथ प्रशिक्षित डॉग जैसे परंपरागत लेकिन बेहद प्रभावी तरीके भी जोड़े जा रहे हैं। तकनीक जहां बड़े क्षेत्र पर नजर रखने में मदद करती है, वहीं डॉग जमीन पर छिपी उन चीजों तक पहुंच जाता है, जिन्हें कैमरा या ड्रोन नहीं देख पाते। दोनों का मेल जंगलों की सुरक्षा को कई गुना मजबूत बना सकता है। निष्कर्ष इंद्रावती टाइगर रिजर्व में स्निफर डॉग की तैनाती वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक नवाचारी और सराहनीय पहल है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो इससे शिकारियों के फंदों से हर साल कई बेजुबानों की जान बचाई जा सकेगी। साथ ही यह मॉडल देश के दूसरे टाइगर रिजर्व और संरक्षित क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। पर्यावरण, वन्यजीव और प्रकृति से जुड़ी हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।

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