ब्रेकिंग न्यूज़
India's Skyroot Aerospace wins two-launch order from US firm Reflect Orbital | Model Mission Shakti Kendra opens at Kanpur's Badshahinaka police station | India-New Zealand FTA comes into force; 100% duty-free access for Indian exports, new visa pathways | PLFS September 2026: Unemployment rate falls to 5%, urban female participation rises | Asian Para Games 2026: India reaches 30 medals; Deepthi Jeevanji, Simran set Games records | Global Hunger Index 2026: India ranks 100th of 122 countries, child wasting a concern | PM Modi inaugurates five projects worth ₹3,350 crore in Ladakh | Rain washes out Bengaluru decider, India-West Indies T20I series ends 2-2
K
Kanpur.live
कानपुर की आवाज़ | Voice of Kanpur

भारतीय स्टार्टअप स्काईरूट को अमेरिकी कंपनी से दो लॉन्च का ऑर्डर

India's Skyroot Aerospace wins two-launch order from US firm Reflect Orbital

Kanpur Live News Desk ·

WhatsApp पर भेजेंFacebookX
भारतीय स्टार्टअप स्काईरूट को अमेरिकी कंपनी से दो लॉन्च का ऑर्डर
भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक बड़ी खबर आई है। हैदराबाद की स्पेस स्टार्टअप कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस को अमेरिका की कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल से दो समर्पित रॉकेट लॉन्च का कॉन्ट्रैक्ट मिला है। पहला लॉन्च स्काईरूट के विक्रम-1 रॉकेट से होगा, जबकि दूसरा लॉन्च विक्रम-1यू से किया जाएगा, जो अभी विकास के चरण में है। जुलाई 2026 में विक्रम-1 की पहली सफल कक्षीय उड़ान के कुछ ही महीनों बाद यह अंतरराष्ट्रीय कॉन्ट्रैक्ट मिलना भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग की बढ़ती साख का सबूत है। रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल क्या करती है रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल एक अनोखी तकनीक पर काम कर रही है। कंपनी ऐसे अंतरिक्ष यान बना रही है, जो अंतरिक्ष से सूरज की रोशनी को धरती पर तय जगहों तक भेज सकेंगे। यानी रात के समय भी किसी खास इलाके को सूरज की रोशनी से रोशन किया जा सकेगा। रिपोर्टों के अनुसार यह प्रणाली करीब 5 किलोमीटर चौड़े इलाके में नियंत्रित रोशनी देने के लिए बनाई जा रही है, जिसे जरूरत के हिसाब से चालू और बंद किया जा सकेगा। कंपनी का कहना है कि इस तकनीक का इस्तेमाल दूर-दराज के इलाकों में काम के लिए रोशनी, रक्षा, नागरिक बुनियादी ढांचे और सौर ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सोलर पावर प्लांट को सूरज ढलने के बाद भी कुछ देर रोशनी मिल सके, तो बिजली उत्पादन बढ़ सकता है। बड़ी योजना रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल का लक्ष्य इस साल दो उपग्रह कक्षा में भेजने, 2028 तक एक हजार से ज्यादा उपग्रह और आगे चलकर 50 हजार से ज्यादा उपग्रह तैनात करने का है। अमेरिका के संघीय संचार आयोग (एफसीसी) ने जुलाई में कंपनी के प्रदर्शन अंतरिक्ष यान "एरेंडिल-1" को मंजूरी दी थी। तकनीक पर सवाल भी यह तकनीक जितनी अनोखी है, उतनी ही विवादों में भी है। एफसीसी के पास कंपनी के आवेदन पर दो हजार से ज्यादा टिप्पणियां आई थीं, जिनमें कई लोगों ने संभावित नुकसान को लेकर चिंता जताई। खगोलविदों को आशंका है कि रात के आसमान में कृत्रिम रोशनी से तारों और अंतरिक्ष के अध्ययन में बाधा आ सकती है। पर्यावरण विशेषज्ञ रात में रोशनी से जीव-जंतुओं, पक्षियों और इंसानों की प्राकृतिक दिनचर्या पर पड़ने वाले असर को लेकर भी सवाल उठाते हैं। कंपनियों ने क्या कहा रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के सीईओ बेन नोवैक ने कहा कि दुनिया में इस समय रॉकेट लॉन्च की क्षमता की असली कमी है, इसलिए कंपनी नए लॉन्च प्रदाताओं को जोड़ रही है। वहीं स्काईरूट के सह-संस्थापक और सीईओ पवन कुमार चंदना ने कहा कि यह साझेदारी तय समय पर लॉन्च की निश्चितता और मिशन में लचीलापन देती है। विक्रम-1: भारत का पहला निजी कक्षीय रॉकेट स्काईरूट का विक्रम-1 रॉकेट जुलाई 2026 में सफलतापूर्वक कक्षा में पहुंचा था। यह भारत से किसी निजी कंपनी का पहला कक्षीय प्रक्षेपण था। विक्रम-1 को पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में 350 किलोग्राम तक के उपग्रह ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है। इससे पहले नवंबर 2022 में स्काईरूट ने विक्रम-एस रॉकेट लॉन्च किया था, जो भारत का पहला निजी रॉकेट था। विक्रम-एस एक उप-कक्षीय (सब-ऑर्बिटल) उड़ान थी। विक्रम साराभाई के नाम पर स्काईरूट के रॉकेटों का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में "विक्रम" रखा गया है। स्काईरूट की स्थापना इसरो के पूर्व वैज्ञानिकों ने की थी। कंपनी 3डी प्रिंटेड इंजन और कार्बन कंपोजिट ढांचे जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करती है, जिससे रॉकेट हल्के और सस्ते बनते हैं। निजी अंतरिक्ष क्षेत्र का उदय कुछ साल पहले तक भारत में रॉकेट और उपग्रह बनाना और लॉन्च करना पूरी तरह इसरो का काम था। 2020 में सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला और निजी कंपनियों को मंजूरी और सहायता देने के लिए इन-स्पेस (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र) बनाया। इसके बाद देश में सैकड़ों स्पेस स्टार्टअप शुरू हुए हैं। स्काईरूट और अग्निकुल कॉसमॉस जैसी कंपनियां रॉकेट बना रही हैं, जबकि कई कंपनियां उपग्रह, अंतरिक्ष डेटा और ग्राउंड स्टेशन सेवाओं पर काम कर रही हैं। छोटे उपग्रहों का बड़ा बाजार दुनिया में छोटे उपग्रहों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इंटरनेट, पृथ्वी अवलोकन, मौसम, कृषि और संचार जैसे कामों के लिए कंपनियां हजारों छोटे उपग्रह भेज रही हैं। इन्हें समय पर और कम लागत में लॉन्च करने के लिए छोटे रॉकेटों की जरूरत होती है। भारत कम लागत में भरोसेमंद लॉन्च सेवा देने के लिए जाना जाता है, इसलिए स्काईरूट जैसी कंपनियों के लिए यह बड़ा अवसर है। युवाओं के लिए करियर अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों के आने से युवाओं के लिए नए करियर अवसर खुले हैं। एयरोस्पेस, मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर साइंस और मटीरियल साइंस के छात्र इस क्षेत्र में काम कर सकते हैं। आईआईटी कानपुर में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग देश के प्रमुख विभागों में गिना जाता है और यहां के छात्र अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। कानपुर और उत्तर प्रदेश के छात्र भी इस उभरते क्षेत्र में अपना भविष्य बना सकते हैं। भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था भारत सरकार ने अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए निजी कंपनियों को लॉन्च पैड, परीक्षण सुविधाएं और तकनीकी मदद दी जा रही है। विदेशी निवेश के नियम भी आसान किए गए हैं। विदेशी ग्राहकों से मिलने वाले ऐसे कॉन्ट्रैक्ट देश में विदेशी मुद्रा लाते हैं और उच्च तकनीक वाले रोजगार पैदा करते हैं। स्काईरूट को मिला यह ऑर्डर इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। रॉकेट लॉन्च कैसे होता है किसी उपग्रह को कक्षा में पहुंचाने के लिए रॉकेट को बहुत तेज गति हासिल करनी होती है। पृथ्वी की निचली कक्षा में बने रहने के लिए उपग्रह को करीब 7.8 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार चाहिए। रॉकेट कई चरणों में बना होता है। हर चरण का ईंधन खत्म होने पर वह अलग हो जाता है, जिससे बाकी रॉकेट हल्का होकर और तेज रफ्तार पकड़ता है। आखिर में उपग्रह को तय कक्षा में छोड़ दिया जाता है। निष्कर्ष स्काईरूट एयरोस्पेस को अमेरिकी कंपनी से दो लॉन्च का कॉन्ट्रैक्ट मिलना भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए गर्व का क्षण है। विक्रम-1 की सफलता के कुछ ही महीनों में अंतरराष्ट्रीय ग्राहक मिलना बताता है कि दुनिया भारतीय तकनीक पर भरोसा कर रही है। आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में बड़ी भूमिका निभा सकता है। विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष की हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।

भारतीय स्टार्टअप स्काईरूट को अमेरिकी कंपनी से दो लॉन्च का ऑर्डर

भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक बड़ी खबर आई है। हैदराबाद की स्पेस स्टार्टअप कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस को अमेरिका की कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल से दो समर्पित रॉकेट लॉन्च का कॉन्ट्रैक्ट मिला है। पहला लॉन्च स्काईरूट के विक्रम-1 रॉकेट से होगा, जबकि दूसरा लॉन्च विक्रम-1यू से किया जाएगा, जो अभी विकास के चरण में है। जुलाई 2026 में विक्रम-1 की पहली सफल कक्षीय उड़ान के कुछ ही महीनों बाद यह अंतरराष्ट्रीय कॉन्ट्रैक्ट मिलना भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग की बढ़ती साख का सबूत है। रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल क्या करती है रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल एक अनोखी तकनीक पर काम कर रही है। कंपनी ऐसे अंतरिक्ष यान बना रही है, जो अंतरिक्ष से सूरज की रोशनी को धरती पर तय जगहों तक भेज सकेंगे। यानी रात के समय भी किसी खास इलाके को सूरज की रोशनी से रोशन किया जा सकेगा। रिपोर्टों के अनुसार यह प्रणाली करीब 5 किलोमीटर चौड़े इलाके में नियंत्रित रोशनी देने के लिए बनाई जा रही है, जिसे जरूरत के हिसाब से चालू और बंद किया जा सकेगा। कंपनी का कहना है कि इस तकनीक का इस्तेमाल दूर-दराज के इलाकों में काम के लिए रोशनी, रक्षा, नागरिक बुनियादी ढांचे और सौर ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सोलर पावर प्लांट को सूरज ढलने के बाद भी कुछ देर रोशनी मिल सके, तो बिजली उत्पादन बढ़ सकता है। बड़ी योजना रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल का लक्ष्य इस साल दो उपग्रह कक्षा में भेजने, 2028 तक एक हजार से ज्यादा उपग्रह और आगे चलकर 50 हजार से ज्यादा उपग्रह तैनात करने का है। अमेरिका के संघीय संचार आयोग (एफसीसी) ने जुलाई में कंपनी के प्रदर्शन अंतरिक्ष यान "एरेंडिल-1" को मंजूरी दी थी। तकनीक पर सवाल भी यह तकनीक जितनी अनोखी है, उतनी ही विवादों में भी है। एफसीसी के पास कंपनी के आवेदन पर दो हजार से ज्यादा टिप्पणियां आई थीं, जिनमें कई लोगों ने संभावित नुकसान को लेकर चिंता जताई। खगोलविदों को आशंका है कि रात के आसमान में कृत्रिम रोशनी से तारों और अंतरिक्ष के अध्ययन में बाधा आ सकती है। पर्यावरण विशेषज्ञ रात में रोशनी से जीव-जंतुओं, पक्षियों और इंसानों की प्राकृतिक दिनचर्या पर पड़ने वाले असर को लेकर भी सवाल उठाते हैं। कंपनियों ने क्या कहा रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के सीईओ बेन नोवैक ने कहा कि दुनिया में इस समय रॉकेट लॉन्च की क्षमता की असली कमी है, इसलिए कंपनी नए लॉन्च प्रदाताओं को जोड़ रही है। वहीं स्काईरूट के सह-संस्थापक और सीईओ पवन कुमार चंदना ने कहा कि यह साझेदारी तय समय पर लॉन्च की निश्चितता और मिशन में लचीलापन देती है। विक्रम-1: भारत का पहला निजी कक्षीय रॉकेट स्काईरूट का विक्रम-1 रॉकेट जुलाई 2026 में सफलतापूर्वक कक्षा में पहुंचा था। यह भारत से किसी निजी कंपनी का पहला कक्षीय प्रक्षेपण था। विक्रम-1 को पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में 350 किलोग्राम तक के उपग्रह ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है। इससे पहले नवंबर 2022 में स्काईरूट ने विक्रम-एस रॉकेट लॉन्च किया था, जो भारत का पहला निजी रॉकेट था। विक्रम-एस एक उप-कक्षीय (सब-ऑर्बिटल) उड़ान थी। विक्रम साराभाई के नाम पर स्काईरूट के रॉकेटों का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में "विक्रम" रखा गया है। स्काईरूट की स्थापना इसरो के पूर्व वैज्ञानिकों ने की थी। कंपनी 3डी प्रिंटेड इंजन और कार्बन कंपोजिट ढांचे जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करती है, जिससे रॉकेट हल्के और सस्ते बनते हैं। निजी अंतरिक्ष क्षेत्र का उदय कुछ साल पहले तक भारत में रॉकेट और उपग्रह बनाना और लॉन्च करना पूरी तरह इसरो का काम था। 2020 में सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला और निजी कंपनियों को मंजूरी और सहायता देने के लिए इन-स्पेस (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र) बनाया। इसके बाद देश में सैकड़ों स्पेस स्टार्टअप शुरू हुए हैं। स्काईरूट और अग्निकुल कॉसमॉस जैसी कंपनियां रॉकेट बना रही हैं, जबकि कई कंपनियां उपग्रह, अंतरिक्ष डेटा और ग्राउंड स्टेशन सेवाओं पर काम कर रही हैं। छोटे उपग्रहों का बड़ा बाजार दुनिया में छोटे उपग्रहों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इंटरनेट, पृथ्वी अवलोकन, मौसम, कृषि और संचार जैसे कामों के लिए कंपनियां हजारों छोटे उपग्रह भेज रही हैं। इन्हें समय पर और कम लागत में लॉन्च करने के लिए छोटे रॉकेटों की जरूरत होती है। भारत कम लागत में भरोसेमंद लॉन्च सेवा देने के लिए जाना जाता है, इसलिए स्काईरूट जैसी कंपनियों के लिए यह बड़ा अवसर है। युवाओं के लिए करियर अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों के आने से युवाओं के लिए नए करियर अवसर खुले हैं। एयरोस्पेस, मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर साइंस और मटीरियल साइंस के छात्र इस क्षेत्र में काम कर सकते हैं। आईआईटी कानपुर में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग देश के प्रमुख विभागों में गिना जाता है और यहां के छात्र अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। कानपुर और उत्तर प्रदेश के छात्र भी इस उभरते क्षेत्र में अपना भविष्य बना सकते हैं। भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था भारत सरकार ने अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए निजी कंपनियों को लॉन्च पैड, परीक्षण सुविधाएं और तकनीकी मदद दी जा रही है। विदेशी निवेश के नियम भी आसान किए गए हैं। विदेशी ग्राहकों से मिलने वाले ऐसे कॉन्ट्रैक्ट देश में विदेशी मुद्रा लाते हैं और उच्च तकनीक वाले रोजगार पैदा करते हैं। स्काईरूट को मिला यह ऑर्डर इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। रॉकेट लॉन्च कैसे होता है किसी उपग्रह को कक्षा में पहुंचाने के लिए रॉकेट को बहुत तेज गति हासिल करनी होती है। पृथ्वी की निचली कक्षा में बने रहने के लिए उपग्रह को करीब 7.8 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार चाहिए। रॉकेट कई चरणों में बना होता है। हर चरण का ईंधन खत्म होने पर वह अलग हो जाता है, जिससे बाकी रॉकेट हल्का होकर और तेज रफ्तार पकड़ता है। आखिर में उपग्रह को तय कक्षा में छोड़ दिया जाता है। निष्कर्ष स्काईरूट एयरोस्पेस को अमेरिकी कंपनी से दो लॉन्च का कॉन्ट्रैक्ट मिलना भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए गर्व का क्षण है। विक्रम-1 की सफलता के कुछ ही महीनों में अंतरराष्ट्रीय ग्राहक मिलना बताता है कि दुनिया भारतीय तकनीक पर भरोसा कर रही है। आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में बड़ी भूमिका निभा सकता है। विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष की हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।

यह खबर अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें:

WhatsApp पर भेजेंFacebookX

किसी तथ्य में गलती दिखे तो हमें बताएं — हमारी संपादकीय नीति पढ़ें।

और पढ़ें | Related News

सबसे ज़्यादा पढ़ी गई | Most Read

  1. 1वृद्धावस्था-विधवा-दिव्यांग पेंशन योजनाओं के नाम बदले, दिव्यांगों को बड़ी राहत
  2. 2कानपुर के बादशाहीनाका थाने में मॉडल मिशन शक्ति केंद्र शुरू
  3. 3भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता लागू, भारतीय सामान को 100% शुल्क मुक्त पहुंच
  4. 4सितंबर में बेरोजगारी दर घटकर 5%, शहरों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी
  5. 5एशियाई पैरा खेल: भारत के 30 पदक, दीप्ति और सिमरन ने बनाए खेलों के रिकॉर्ड