"मोनोपोली दवाओं" का खेल: कानपुर में 50 रुपये की दवा 250 रुपये में बिकने का दावा, मरीजों की जेब पर भारी बोझ
The 'Monopoly Drug' Racket: Report Claims ₹50 Medicines Sold for ₹250 in Kanpur, Patients Pay Heavy Price
Kanpur Live News Desk ·

मुख्य बातें:
एक पड़ताल के अनुसार कानपुर के कई निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में "मोनोपोली दवाओं" का चलन बढ़ा है।
आरोप है कि दवाओं के साल्ट में मामूली बदलाव कर नए नाम से बेचा जा रहा है, जो केवल चुनिंदा मेडिकल स्टोर पर मिलती हैं।
रिपोर्ट के अनुसार जो 10 गोलियों की पत्ती करीब 50 रुपये में आनी चाहिए, वह 250 से 270 रुपये में बिक रही है।
ड्रग विभाग के अनुसार एमआरपी से ज्यादा दाम लेना नियमों के खिलाफ है और शासन स्तर पर जांच हो रही है।
दवा व्यापारियों के संगठन ने इसके खिलाफ सख्त कानून और कार्रवाई की मांग की है।
बीमारी के समय इलाज का खर्च वैसे ही परिवारों पर भारी पड़ता है, लेकिन अगर दवा की कीमत ही कई गुना ज्यादा वसूली जाए, तो मरीजों की परेशानी और बढ़ जाती है। कानपुर में "मोनोपोली दवाओं" को लेकर एक पड़ताल सामने आई है, जिसमें दावा किया गया है कि कुछ निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में ऐसी दवाएं लिखी जा रही हैं, जो सिर्फ चुनिंदा दुकानों पर मिलती हैं और जिनकी कीमत सामान्य दवाओं से कई गुना ज्यादा होती है।
क्या होती हैं "मोनोपोली दवाएं"?
बाजार की भाषा में "मोनोपोली दवा" उसे कहा जाता है, जो किसी खास ब्रांड नाम से बनाई जाती है और केवल किसी तय अस्पताल, क्लीनिक या उससे जुड़े मेडिकल स्टोर पर ही मिलती है। बाहर की दुकानों पर वह उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में मरीज के पास वही दवा खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
रिपोर्ट के अनुसार इस काम के पीछे कुछ स्थानीय निर्माता और उनसे जुड़े लोग होते हैं, जो दवा के मूल साल्ट में मामूली बदलाव कर उसे नए नाम से बाजार में उतारते हैं।
कैसे चलता है यह खेल?
पड़ताल में बताए गए तरीके के अनुसार:
मूल साल्ट में अतिरिक्त साल्ट जोड़ना: किसी सामान्य दवा के मुख्य साल्ट में एंजाइम, विटामिन या एंटीहिस्टामिन जैसे गैर-जरूरी साल्ट मिला दिए जाते हैं। इसे "फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन" कहा जाता है।
मूल्य नियंत्रण से बाहर: सरकारी मूल्य नियंत्रण आवश्यक दवाओं की सूची पर लागू होता है। साल्ट बदलने के बाद नई दवा इस दायरे से बाहर हो जाती है।
मनमानी कीमत: इसके बाद दवा की कीमत पांच से दस गुना तक ज्यादा तय की जा सकती है।
सीमित सप्लाई: नए ब्रांड को केवल किसी खास अस्पताल, क्लीनिक या उससे जुड़े स्टोर को सप्लाई किया जाता है।
कहां हुई पड़ताल?
रिपोर्ट के अनुसार पड़ताल टीम ने शहर के स्वरूप नगर, काकादेव और सर्वोदय नगर जैसे इलाकों में बड़े मेडिकल कॉलेजों, निजी क्लीनिकों, अस्पतालों और उनके आसपास के मेडिकल स्टोरों की स्थिति देखी।
दाम में कितना अंतर? (रिपोर्ट में बताए गए उदाहरण)
दवा सामान्य दाम बदले साल्ट वाली दवा का दाम
एजिथ्रोमाइसिन 500 मिग्रा (5 गोली) ₹60–70 ₹220–250
पैंटोप्राजोल 40 मिग्रा (10 गोली) ₹30–50 ₹180–250
एसिक्लोफेनाक + पैरासिटामोल (10 गोली) ₹30–40 ₹160–220
एटोरवास्टेटिन + एम्लोडिपिन (10 गोली) ₹40–60 ₹250–350
लिवोसेट्रिजिन + एम्ब्रॉक्सोल सिरप (100 मिली) ₹60–80 ₹220–280
प्रीगैबलिन + मिथाइलकोबालामिन (10 कैप्सूल) ₹90–120 ₹350–480
उर्सोडिऑक्सीकोलिक एसिड (10 गोली) ₹150–180 ₹450–600
कैल्शियम + विटामिन डी3 (15 गोली) ₹80–110 ₹280–380
ये आंकड़े पड़ताल रिपोर्ट में बताए गए अनुमानित दाम हैं। अलग-अलग ब्रांड और दुकानों पर कीमत में अंतर हो सकता है।
आईसीयू मरीजों पर सबसे ज्यादा बोझ
रिपोर्ट के अनुसार आईसीयू में भर्ती मरीजों को 10 से 15 हजार रुपये तक की दवाएं लिखी जा रही हैं, जबकि यही दवाएं बाहर करीब 4 से 5 हजार रुपये में मिल सकती हैं। वायरल बुखार या पेट दर्द जैसी सामान्य बीमारी का इलाज, जो जेनेरिक या प्रचलित ब्रांड की दवाओं से 200 से 300 रुपये में हो सकता है, उसका खर्च 1,200 से 1,500 रुपये तक पहुंच जाता है।
ग्रामीण इलाकों से आने वाले और निम्न व मध्यम आय वर्ग के परिवार इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
दूसरी दुकान पर "साल्ट नहीं मिलता"
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जब मरीज के परिजन पर्चा लेकर दूसरी दुकानों पर जाते हैं, तो उन्हें बताया जाता है कि यह साल्ट उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ मामलों में जब परिजनों ने जेनेरिक साल्ट की दवा लाने की बात कही, तो अस्पताल स्टाफ ने सादे कागज पर लिखवाने को कहा कि अगर मरीज को कुछ हुआ तो जिम्मेदारी परिवार की होगी।
ड्रग विभाग का पक्ष
ड्रग विभाग के सहायक निदेशक गोविंद गुप्ता के अनुसार एमआरपी से ज्यादा कीमत पर दवा बेचना नियमों का उल्लंघन है। उन्होंने बताया कि विभाग इस मामले में अपने स्तर से स्वतंत्र कार्रवाई नहीं कर सकता। शासन स्तर पर दवाओं की एमआरपी और लागत के अंतर की जांच चल रही है और मिलने वाले निर्देशों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
दवा व्यापारियों की मांग
दवा व्यापार मंडल के महामंत्री राजेंद्र सैनी के अनुसार मोनोपोली दवाओं के कारण आम दवा कारोबार करीब आधा रह गया है। उनका कहना है कि मरीजों को मजबूरी में महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। संगठन ने इसके खिलाफ कानून बनाने और सख्त कार्रवाई की मांग की है।
नियम क्या कहते हैं?
जेनेरिक नाम लिखने की सलाह: राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की आचार संहिता के अनुसार डॉक्टरों से दवाओं के जेनेरिक नाम साफ और पढ़ने योग्य अक्षरों में लिखने की अपेक्षा की जाती है।
खास दुकान से खरीदने का दबाव गलत: किसी मरीज को किसी एक खास दुकान से ही दवा खरीदने के लिए मजबूर करना नियमों के खिलाफ माना जाता है।
एमआरपी से ज्यादा नहीं: कोई भी दुकान दवा पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) से ज्यादा पैसा नहीं ले सकती।
मूल्य नियंत्रण: राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) आवश्यक दवाओं की कीमतें तय करता है।
मरीज और परिजन क्या करें?
डॉक्टर से पूछें: दवा का जेनेरिक नाम और साल्ट जरूर पूछें। डॉक्टर से अनुरोध करें कि पर्चे पर जेनेरिक नाम लिखें।
साल्ट मिलाएं: दवा खरीदने से पहले पैकेट पर लिखे साल्ट को पर्चे से मिलाएं।
जन औषधि केंद्र: प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्रों पर कई दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में काफी कम कीमत पर मिलती हैं। कानपुर में कई जगह ये केंद्र मौजूद हैं।
बिल जरूर लें: हर खरीदारी का पक्का बिल लें, जिसमें दवा का नाम, बैच नंबर और कीमत लिखी हो।
एमआरपी जांचें: पैकेट पर छपी एमआरपी से ज्यादा पैसा मांगा जाए, तो उसका विरोध करें।
दूसरी राय: महंगे इलाज की स्थिति में दूसरे डॉक्टर की राय लेने में संकोच न करें।
शिकायत कहां करें?
ड्रग विभाग: जिले के औषधि निरीक्षक कार्यालय में लिखित शिकायत दें।
NPPA की हेल्पलाइन और "फार्मा जन समाधान" पोर्टल: दवाओं के अधिक दाम या उपलब्धता की शिकायत के लिए।
राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915: उपभोक्ता अधिकारों से जुड़ी शिकायतों के लिए।
जनसुनवाई पोर्टल (IGRS): उत्तर प्रदेश सरकार का ऑनलाइन शिकायत पोर्टल।
क्या हर कॉम्बिनेशन दवा गलत है?
यह समझना जरूरी है कि हर फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन दवा गलत या बेकार नहीं होती। कई कॉम्बिनेशन दवाएं वैज्ञानिक रूप से उपयोगी होती हैं और डॉक्टर मरीज की जरूरत के हिसाब से उन्हें लिखते हैं। सवाल तब उठता है, जब बिना जरूरत के साल्ट जोड़कर केवल कीमत बढ़ाने के लिए नई दवा बनाई जाए और मरीज को उसे किसी खास दुकान से ही खरीदने के लिए मजबूर किया जाए। अपनी दवा के बारे में कोई भी फैसला डॉक्टर की सलाह के बिना न लें।
kanpur.live की राय
इलाज हर नागरिक का अधिकार है और दवाओं की कीमत इतनी नहीं होनी चाहिए कि बीमारी के साथ-साथ आर्थिक बोझ भी परिवार को तोड़ दे। अधिकतर डॉक्टर ईमानदारी से मरीजों की सेवा करते हैं, लेकिन कुछ लोगों के कारण पूरे पेशे पर सवाल उठते हैं। उम्मीद है कि शासन स्तर पर चल रही जांच जल्द पूरी होगी और मरीजों को राहत मिलेगी। हम इस विषय पर आगे की जानकारी देते रहेंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1. मोनोपोली दवा क्या होती है? ऐसी दवा, जो खास ब्रांड नाम से बनाकर केवल चुनिंदा अस्पताल या दुकान पर बेची जाती है।
प्रश्न 2. इनकी कीमत ज्यादा क्यों होती है? रिपोर्ट के अनुसार साल्ट बदलने से ये मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर हो जाती हैं।
प्रश्न 3. क्या दुकानदार एमआरपी से ज्यादा पैसा ले सकता है? नहीं, एमआरपी से ज्यादा लेना नियमों के खिलाफ है।
प्रश्न 4. सस्ती दवा कहां मिल सकती है? प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्रों पर कई दवाएं कम कीमत पर मिलती हैं।
प्रश्न 5. डॉक्टर से क्या पूछें? दवा का जेनेरिक नाम और साल्ट।
प्रश्न 6. दवाओं के अधिक दाम की शिकायत कहां करें? ड्रग विभाग, NPPA के फार्मा जन समाधान पोर्टल या उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 पर।
प्रश्न 7. क्या डॉक्टर की लिखी दवा खुद बदल सकते हैं? नहीं, कोई भी बदलाव डॉक्टर की सलाह से ही करें।
स्रोत: पड़ताल रिपोर्ट और ड्रग विभाग व दवा व्यापार मंडल के बयानों पर आधारित स्थानीय रिपोर्ट, 12 अक्टूबर 2026। स्वास्थ्य जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है।
"मोनोपोली दवाओं" का खेल: कानपुर में 50 रुपये की दवा 250 रुपये में बिकने का दावा, मरीजों की जेब पर भारी बोझ
मुख्य बातें:
एक पड़ताल के अनुसार कानपुर के कई निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में "मोनोपोली दवाओं" का चलन बढ़ा है।
आरोप है कि दवाओं के साल्ट में मामूली बदलाव कर नए नाम से बेचा जा रहा है, जो केवल चुनिंदा मेडिकल स्टोर पर मिलती हैं।
रिपोर्ट के अनुसार जो 10 गोलियों की पत्ती करीब 50 रुपये में आनी चाहिए, वह 250 से 270 रुपये में बिक रही है।
ड्रग विभाग के अनुसार एमआरपी से ज्यादा दाम लेना नियमों के खिलाफ है और शासन स्तर पर जांच हो रही है।
दवा व्यापारियों के संगठन ने इसके खिलाफ सख्त कानून और कार्रवाई की मांग की है।
बीमारी के समय इलाज का खर्च वैसे ही परिवारों पर भारी पड़ता है, लेकिन अगर दवा की कीमत ही कई गुना ज्यादा वसूली जाए, तो मरीजों की परेशानी और बढ़ जाती है। कानपुर में "मोनोपोली दवाओं" को लेकर एक पड़ताल सामने आई है, जिसमें दावा किया गया है कि कुछ निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में ऐसी दवाएं लिखी जा रही हैं, जो सिर्फ चुनिंदा दुकानों पर मिलती हैं और जिनकी कीमत सामान्य दवाओं से कई गुना ज्यादा होती है।
क्या होती हैं "मोनोपोली दवाएं"?
बाजार की भाषा में "मोनोपोली दवा" उसे कहा जाता है, जो किसी खास ब्रांड नाम से बनाई जाती है और केवल किसी तय अस्पताल, क्लीनिक या उससे जुड़े मेडिकल स्टोर पर ही मिलती है। बाहर की दुकानों पर वह उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में मरीज के पास वही दवा खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
रिपोर्ट के अनुसार इस काम के पीछे कुछ स्थानीय निर्माता और उनसे जुड़े लोग होते हैं, जो दवा के मूल साल्ट में मामूली बदलाव कर उसे नए नाम से बाजार में उतारते हैं।
कैसे चलता है यह खेल?
पड़ताल में बताए गए तरीके के अनुसार:
मूल साल्ट में अतिरिक्त साल्ट जोड़ना: किसी सामान्य दवा के मुख्य साल्ट में एंजाइम, विटामिन या एंटीहिस्टामिन जैसे गैर-जरूरी साल्ट मिला दिए जाते हैं। इसे "फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन" कहा जाता है।
मूल्य नियंत्रण से बाहर: सरकारी मूल्य नियंत्रण आवश्यक दवाओं की सूची पर लागू होता है। साल्ट बदलने के बाद नई दवा इस दायरे से बाहर हो जाती है।
मनमानी कीमत: इसके बाद दवा की कीमत पांच से दस गुना तक ज्यादा तय की जा सकती है।
सीमित सप्लाई: नए ब्रांड को केवल किसी खास अस्पताल, क्लीनिक या उससे जुड़े स्टोर को सप्लाई किया जाता है।
कहां हुई पड़ताल?
रिपोर्ट के अनुसार पड़ताल टीम ने शहर के स्वरूप नगर, काकादेव और सर्वोदय नगर जैसे इलाकों में बड़े मेडिकल कॉलेजों, निजी क्लीनिकों, अस्पतालों और उनके आसपास के मेडिकल स्टोरों की स्थिति देखी।
दाम में कितना अंतर? (रिपोर्ट में बताए गए उदाहरण)
दवा सामान्य दाम बदले साल्ट वाली दवा का दाम
एजिथ्रोमाइसिन 500 मिग्रा (5 गोली) ₹60–70 ₹220–250
पैंटोप्राजोल 40 मिग्रा (10 गोली) ₹30–50 ₹180–250
एसिक्लोफेनाक + पैरासिटामोल (10 गोली) ₹30–40 ₹160–220
एटोरवास्टेटिन + एम्लोडिपिन (10 गोली) ₹40–60 ₹250–350
लिवोसेट्रिजिन + एम्ब्रॉक्सोल सिरप (100 मिली) ₹60–80 ₹220–280
प्रीगैबलिन + मिथाइलकोबालामिन (10 कैप्सूल) ₹90–120 ₹350–480
उर्सोडिऑक्सीकोलिक एसिड (10 गोली) ₹150–180 ₹450–600
कैल्शियम + विटामिन डी3 (15 गोली) ₹80–110 ₹280–380
ये आंकड़े पड़ताल रिपोर्ट में बताए गए अनुमानित दाम हैं। अलग-अलग ब्रांड और दुकानों पर कीमत में अंतर हो सकता है।
आईसीयू मरीजों पर सबसे ज्यादा बोझ
रिपोर्ट के अनुसार आईसीयू में भर्ती मरीजों को 10 से 15 हजार रुपये तक की दवाएं लिखी जा रही हैं, जबकि यही दवाएं बाहर करीब 4 से 5 हजार रुपये में मिल सकती हैं। वायरल बुखार या पेट दर्द जैसी सामान्य बीमारी का इलाज, जो जेनेरिक या प्रचलित ब्रांड की दवाओं से 200 से 300 रुपये में हो सकता है, उसका खर्च 1,200 से 1,500 रुपये तक पहुंच जाता है।
ग्रामीण इलाकों से आने वाले और निम्न व मध्यम आय वर्ग के परिवार इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
दूसरी दुकान पर "साल्ट नहीं मिलता"
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जब मरीज के परिजन पर्चा लेकर दूसरी दुकानों पर जाते हैं, तो उन्हें बताया जाता है कि यह साल्ट उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ मामलों में जब परिजनों ने जेनेरिक साल्ट की दवा लाने की बात कही, तो अस्पताल स्टाफ ने सादे कागज पर लिखवाने को कहा कि अगर मरीज को कुछ हुआ तो जिम्मेदारी परिवार की होगी।
ड्रग विभाग का पक्ष
ड्रग विभाग के सहायक निदेशक गोविंद गुप्ता के अनुसार एमआरपी से ज्यादा कीमत पर दवा बेचना नियमों का उल्लंघन है। उन्होंने बताया कि विभाग इस मामले में अपने स्तर से स्वतंत्र कार्रवाई नहीं कर सकता। शासन स्तर पर दवाओं की एमआरपी और लागत के अंतर की जांच चल रही है और मिलने वाले निर्देशों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
दवा व्यापारियों की मांग
दवा व्यापार मंडल के महामंत्री राजेंद्र सैनी के अनुसार मोनोपोली दवाओं के कारण आम दवा कारोबार करीब आधा रह गया है। उनका कहना है कि मरीजों को मजबूरी में महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। संगठन ने इसके खिलाफ कानून बनाने और सख्त कार्रवाई की मांग की है।
नियम क्या कहते हैं?
जेनेरिक नाम लिखने की सलाह: राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की आचार संहिता के अनुसार डॉक्टरों से दवाओं के जेनेरिक नाम साफ और पढ़ने योग्य अक्षरों में लिखने की अपेक्षा की जाती है।
खास दुकान से खरीदने का दबाव गलत: किसी मरीज को किसी एक खास दुकान से ही दवा खरीदने के लिए मजबूर करना नियमों के खिलाफ माना जाता है।
एमआरपी से ज्यादा नहीं: कोई भी दुकान दवा पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) से ज्यादा पैसा नहीं ले सकती।
मूल्य नियंत्रण: राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) आवश्यक दवाओं की कीमतें तय करता है।
मरीज और परिजन क्या करें?
डॉक्टर से पूछें: दवा का जेनेरिक नाम और साल्ट जरूर पूछें। डॉक्टर से अनुरोध करें कि पर्चे पर जेनेरिक नाम लिखें।
साल्ट मिलाएं: दवा खरीदने से पहले पैकेट पर लिखे साल्ट को पर्चे से मिलाएं।
जन औषधि केंद्र: प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्रों पर कई दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में काफी कम कीमत पर मिलती हैं। कानपुर में कई जगह ये केंद्र मौजूद हैं।
बिल जरूर लें: हर खरीदारी का पक्का बिल लें, जिसमें दवा का नाम, बैच नंबर और कीमत लिखी हो।
एमआरपी जांचें: पैकेट पर छपी एमआरपी से ज्यादा पैसा मांगा जाए, तो उसका विरोध करें।
दूसरी राय: महंगे इलाज की स्थिति में दूसरे डॉक्टर की राय लेने में संकोच न करें।
शिकायत कहां करें?
ड्रग विभाग: जिले के औषधि निरीक्षक कार्यालय में लिखित शिकायत दें।
NPPA की हेल्पलाइन और "फार्मा जन समाधान" पोर्टल: दवाओं के अधिक दाम या उपलब्धता की शिकायत के लिए।
राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915: उपभोक्ता अधिकारों से जुड़ी शिकायतों के लिए।
जनसुनवाई पोर्टल (IGRS): उत्तर प्रदेश सरकार का ऑनलाइन शिकायत पोर्टल।
क्या हर कॉम्बिनेशन दवा गलत है?
यह समझना जरूरी है कि हर फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन दवा गलत या बेकार नहीं होती। कई कॉम्बिनेशन दवाएं वैज्ञानिक रूप से उपयोगी होती हैं और डॉक्टर मरीज की जरूरत के हिसाब से उन्हें लिखते हैं। सवाल तब उठता है, जब बिना जरूरत के साल्ट जोड़कर केवल कीमत बढ़ाने के लिए नई दवा बनाई जाए और मरीज को उसे किसी खास दुकान से ही खरीदने के लिए मजबूर किया जाए। अपनी दवा के बारे में कोई भी फैसला डॉक्टर की सलाह के बिना न लें।
kanpur.live की राय
इलाज हर नागरिक का अधिकार है और दवाओं की कीमत इतनी नहीं होनी चाहिए कि बीमारी के साथ-साथ आर्थिक बोझ भी परिवार को तोड़ दे। अधिकतर डॉक्टर ईमानदारी से मरीजों की सेवा करते हैं, लेकिन कुछ लोगों के कारण पूरे पेशे पर सवाल उठते हैं। उम्मीद है कि शासन स्तर पर चल रही जांच जल्द पूरी होगी और मरीजों को राहत मिलेगी। हम इस विषय पर आगे की जानकारी देते रहेंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1. मोनोपोली दवा क्या होती है? ऐसी दवा, जो खास ब्रांड नाम से बनाकर केवल चुनिंदा अस्पताल या दुकान पर बेची जाती है।
प्रश्न 2. इनकी कीमत ज्यादा क्यों होती है? रिपोर्ट के अनुसार साल्ट बदलने से ये मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर हो जाती हैं।
प्रश्न 3. क्या दुकानदार एमआरपी से ज्यादा पैसा ले सकता है? नहीं, एमआरपी से ज्यादा लेना नियमों के खिलाफ है।
प्रश्न 4. सस्ती दवा कहां मिल सकती है? प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्रों पर कई दवाएं कम कीमत पर मिलती हैं।
प्रश्न 5. डॉक्टर से क्या पूछें? दवा का जेनेरिक नाम और साल्ट।
प्रश्न 6. दवाओं के अधिक दाम की शिकायत कहां करें? ड्रग विभाग, NPPA के फार्मा जन समाधान पोर्टल या उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 पर।
प्रश्न 7. क्या डॉक्टर की लिखी दवा खुद बदल सकते हैं? नहीं, कोई भी बदलाव डॉक्टर की सलाह से ही करें।
स्रोत: पड़ताल रिपोर्ट और ड्रग विभाग व दवा व्यापार मंडल के बयानों पर आधारित स्थानीय रिपोर्ट, 12 अक्टूबर 2026। स्वास्थ्य जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है।
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