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नवरात्र विशेष: 12 बहनों से जुड़ा है कानपुर के मां बारा देवी मंदिर का इतिहास, 51 किलो जलेबी का भोग और ईंट के नीचे सिक्का रखने की अनोखी परंपरा

Navratri Special: The History of Kanpur's Maa Bara Devi Temple Linked to 12 Sisters, Unique Traditions and Rituals

Kanpur Live News Desk ·

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नवरात्र विशेष: 12 बहनों से जुड़ा है कानपुर के मां बारा देवी मंदिर का इतिहास, 51 किलो जलेबी का भोग और ईंट के नीचे सिक्का रखने की अनोखी परंपरा
मुख्य बातें: जूही स्थित सिद्धपीठ मां बारा देवी मंदिर कानपुर की आस्था का प्राचीन केंद्र है। मान्यता है कि 12 बहनें घर छोड़कर यहां आईं और प्रतिमा के रूप में स्थापित हो गईं। इसी से इस जगह का नाम "बारा देवी" पड़ा। नवरात्र में सुबह 4 बजे मंगला आरती होती है और 51 किलो जलेबी का भोग लगाया जाता है। भक्त प्रतिमा के पीछे ईंट के नीचे सिक्का रखकर मनोकामना मांगते हैं। अष्टमी की रात मां बारा देवी अपनी बहन मां तपेश्वरी से मिलती हैं, ऐसी मान्यता है। शारदीय नवरात्र के दिनों में कानपुर का जूही इलाका भक्ति के रंग में रंगा हुआ है। यहां स्थित सिद्धपीठ मां बारा देवी मंदिर में सुबह से देर रात तक "जय माता दी" के जयकारे गूंज रहे हैं। यह मंदिर केवल कानपुर ही नहीं, आसपास के जिलों के लोगों की भी गहरी आस्था का केंद्र है। इस मंदिर से जुड़ी कथा, परंपराएं और मान्यताएं इसे बाकी देवी मंदिरों से अलग बनाती हैं। 12 बहनों की कथा स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार मंदिर का इतिहास 12 बहनों से जुड़ा है। मान्यता है कि 12 बहनें किसी कारण से अपना घर छोड़कर इस स्थान पर आईं और यहीं प्रतिमा के रूप में स्थापित हो गईं। "बारह" यानी 12 बहनों के कारण ही इस स्थान को "बारा देवी" के नाम से जाना जाने लगा। आज यह मंदिर सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध है और भक्तों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। ईंट के नीचे सिक्का रखने की परंपरा बारा देवी मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा है ईंट के नीचे पैसा रखना। रिपोर्टों के अनुसार भक्त मां की प्रतिमा के पीछे एक ईंट के नीचे पैसे रखते हैं और उसके ऊपर चुनरी, प्रसाद और नारियल चढ़ाते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से मनोकामना जल्द पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर भक्त दोबारा मंदिर आकर मां का धन्यवाद करते हैं। नवरात्र में खास पूजा-विधान नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष आयोजन होते हैं: मंगला आरती: हर दिन सुबह 4 बजे। हवन-पूजन: विधि-विधान से रोजाना। 51 किलो जलेबी का भोग: मां को जलेबी का भोग लगाया जाता है। कन्या भोज: सबसे पहले कन्याओं को भोजन कराया जाता है। प्रसाद वितरण: कन्या भोज के बाद भक्तों में प्रसाद बांटा जाता है और फिर दर्शन शुरू होते हैं। अष्टमी की रात बहनों का मिलन इस मंदिर से जुड़ी एक बेहद भावुक मान्यता है। रिपोर्टों के अनुसार अष्टमी की रात तपेश्वरी देवी मंदिर से पुजारी और भक्त ज्योति और ढोल-नगाड़ों के साथ बारा देवी मंदिर पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस रात मां बारा देवी अपनी बहन मां तपेश्वरी से मिलती हैं। इसी तरह सप्तमी की रात मां के मायके माने जाने वाले बर्रा गांव से परिजन पूजा करने आते हैं। इन दोनों रातों में मंदिर खुला रहता है, लेकिन आम भक्तों के लिए दर्शन नहीं होते। चैत्र नवरात्र की अनोखी आस्था रिपोर्टों के अनुसार चैत्र नवरात्र में मनोकामना पूरी होने पर कई भक्त सड़क पर दंडवत करते हुए या जवारे लेकर मंदिर तक आते हैं। इस दौरान मंदिर के बाहर मेला भी लगता है। कुछ भक्त अपनी आस्था के अनुसार उपवास रखकर पूजा से पहले विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी करते हैं, जिसमें पुजारी देवी के नाम पर उनके गालों में धातु की सांग पिरोते हैं। यह परंपरा आस्था से जुड़ी है और प्रशिक्षित पुजारियों की देखरेख में ही होती है। ऐसी परंपराओं को किसी को देखकर खुद आजमाना खतरनाक हो सकता है। कौन संभालता है मंदिर की व्यवस्था? मंदिर की देखरेख "मां बारा देवी जीर्णोद्धार एवं रखरखाव समिति" करती है। रिपोर्टों के अनुसार इसके अध्यक्ष पूर्व विधायक सतीश निगम हैं। समिति के प्रबंधक रूपम शर्मा के अनुसार समिति मंदिर की देखरेख करती है, जबकि गर्भगृह की जिम्मेदारी चार माली परिवारों के पास है। दान पेटी से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल मंदिर के निर्माण और रखरखाव में किया जाता है। मंदिर परिसर किदवई नगर क्षेत्र में आता है, जबकि मेले का क्षेत्र जूही थाने के अंतर्गत आता है। दर्शन के लिए जरूरी सुझाव नवरात्र में भारी भीड़ को देखते हुए भक्त इन बातों का ध्यान रखें: भीड़ से बचने के लिए सुबह जल्दी या दोपहर बाद दर्शन करें। वाहन तय पार्किंग में ही खड़ा करें। कीमती सामान और ज्यादा नकदी साथ न ले जाएं। बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें। मंदिर समिति और पुलिस के निर्देशों का पालन करें। प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें और परिसर साफ रखें। कैसे पहुंचें? बारा देवी मंदिर कानपुर के जूही इलाके में स्थित है। कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी कुछ ही किलोमीटर है और ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी से आसानी से पहुंचा जा सकता है। नवरात्र के दौरान आसपास की सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव ज्यादा रहता है, इसलिए समय लेकर निकलें। आस्था और परंपरा का संगम बारा देवी मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि कानपुर की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है। यहां पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं, बहनों के मिलन की कथा और मेले का माहौल शहर की लोक संस्कृति को जीवित रखते हैं। हर साल लाखों भक्त यहां आकर अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। kanpur.live की राय कानपुर की धार्मिक विरासत में बारा देवी मंदिर का विशेष स्थान है। इसकी कथाएं और परंपराएं नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। हम सभी पाठकों को शारदीय नवरात्र की शुभकामनाएं देते हैं और अपील करते हैं कि दर्शन के दौरान अनुशासन और स्वच्छता बनाए रखें। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल प्रश्न 1. बारा देवी मंदिर कहां है? कानपुर के जूही इलाके में। प्रश्न 2. मंदिर का नाम बारा देवी क्यों पड़ा? मान्यता है कि 12 बहनें यहां आकर प्रतिमा रूप में स्थापित हुईं, इसलिए यह नाम पड़ा। प्रश्न 3. नवरात्र में मां को क्या भोग लगता है? 51 किलो जलेबी का भोग। प्रश्न 4. मंगला आरती कब होती है? नवरात्र में सुबह 4 बजे। प्रश्न 5. अष्टमी की रात क्या खास होता है? मान्यता है कि इस रात मां बारा देवी अपनी बहन मां तपेश्वरी से मिलती हैं। प्रश्न 6. मंदिर की व्यवस्था कौन देखता है? मां बारा देवी जीर्णोद्धार एवं रखरखाव समिति। प्रश्न 7. सप्तमी की रात कौन पूजा करने आता है? मां के मायके माने जाने वाले बर्रा गांव से परिजन। स्रोत: मंदिर समिति के बयानों पर आधारित स्थानीय रिपोर्ट, 13 अक्टूबर 2026। धार्मिक जानकारी मान्यताओं पर आधारित है।

नवरात्र विशेष: 12 बहनों से जुड़ा है कानपुर के मां बारा देवी मंदिर का इतिहास, 51 किलो जलेबी का भोग और ईंट के नीचे सिक्का रखने की अनोखी परंपरा

मुख्य बातें: जूही स्थित सिद्धपीठ मां बारा देवी मंदिर कानपुर की आस्था का प्राचीन केंद्र है। मान्यता है कि 12 बहनें घर छोड़कर यहां आईं और प्रतिमा के रूप में स्थापित हो गईं। इसी से इस जगह का नाम "बारा देवी" पड़ा। नवरात्र में सुबह 4 बजे मंगला आरती होती है और 51 किलो जलेबी का भोग लगाया जाता है। भक्त प्रतिमा के पीछे ईंट के नीचे सिक्का रखकर मनोकामना मांगते हैं। अष्टमी की रात मां बारा देवी अपनी बहन मां तपेश्वरी से मिलती हैं, ऐसी मान्यता है। शारदीय नवरात्र के दिनों में कानपुर का जूही इलाका भक्ति के रंग में रंगा हुआ है। यहां स्थित सिद्धपीठ मां बारा देवी मंदिर में सुबह से देर रात तक "जय माता दी" के जयकारे गूंज रहे हैं। यह मंदिर केवल कानपुर ही नहीं, आसपास के जिलों के लोगों की भी गहरी आस्था का केंद्र है। इस मंदिर से जुड़ी कथा, परंपराएं और मान्यताएं इसे बाकी देवी मंदिरों से अलग बनाती हैं। 12 बहनों की कथा स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार मंदिर का इतिहास 12 बहनों से जुड़ा है। मान्यता है कि 12 बहनें किसी कारण से अपना घर छोड़कर इस स्थान पर आईं और यहीं प्रतिमा के रूप में स्थापित हो गईं। "बारह" यानी 12 बहनों के कारण ही इस स्थान को "बारा देवी" के नाम से जाना जाने लगा। आज यह मंदिर सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध है और भक्तों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। ईंट के नीचे सिक्का रखने की परंपरा बारा देवी मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा है ईंट के नीचे पैसा रखना। रिपोर्टों के अनुसार भक्त मां की प्रतिमा के पीछे एक ईंट के नीचे पैसे रखते हैं और उसके ऊपर चुनरी, प्रसाद और नारियल चढ़ाते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से मनोकामना जल्द पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर भक्त दोबारा मंदिर आकर मां का धन्यवाद करते हैं। नवरात्र में खास पूजा-विधान नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष आयोजन होते हैं: मंगला आरती: हर दिन सुबह 4 बजे। हवन-पूजन: विधि-विधान से रोजाना। 51 किलो जलेबी का भोग: मां को जलेबी का भोग लगाया जाता है। कन्या भोज: सबसे पहले कन्याओं को भोजन कराया जाता है। प्रसाद वितरण: कन्या भोज के बाद भक्तों में प्रसाद बांटा जाता है और फिर दर्शन शुरू होते हैं। अष्टमी की रात बहनों का मिलन इस मंदिर से जुड़ी एक बेहद भावुक मान्यता है। रिपोर्टों के अनुसार अष्टमी की रात तपेश्वरी देवी मंदिर से पुजारी और भक्त ज्योति और ढोल-नगाड़ों के साथ बारा देवी मंदिर पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस रात मां बारा देवी अपनी बहन मां तपेश्वरी से मिलती हैं। इसी तरह सप्तमी की रात मां के मायके माने जाने वाले बर्रा गांव से परिजन पूजा करने आते हैं। इन दोनों रातों में मंदिर खुला रहता है, लेकिन आम भक्तों के लिए दर्शन नहीं होते। चैत्र नवरात्र की अनोखी आस्था रिपोर्टों के अनुसार चैत्र नवरात्र में मनोकामना पूरी होने पर कई भक्त सड़क पर दंडवत करते हुए या जवारे लेकर मंदिर तक आते हैं। इस दौरान मंदिर के बाहर मेला भी लगता है। कुछ भक्त अपनी आस्था के अनुसार उपवास रखकर पूजा से पहले विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी करते हैं, जिसमें पुजारी देवी के नाम पर उनके गालों में धातु की सांग पिरोते हैं। यह परंपरा आस्था से जुड़ी है और प्रशिक्षित पुजारियों की देखरेख में ही होती है। ऐसी परंपराओं को किसी को देखकर खुद आजमाना खतरनाक हो सकता है। कौन संभालता है मंदिर की व्यवस्था? मंदिर की देखरेख "मां बारा देवी जीर्णोद्धार एवं रखरखाव समिति" करती है। रिपोर्टों के अनुसार इसके अध्यक्ष पूर्व विधायक सतीश निगम हैं। समिति के प्रबंधक रूपम शर्मा के अनुसार समिति मंदिर की देखरेख करती है, जबकि गर्भगृह की जिम्मेदारी चार माली परिवारों के पास है। दान पेटी से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल मंदिर के निर्माण और रखरखाव में किया जाता है। मंदिर परिसर किदवई नगर क्षेत्र में आता है, जबकि मेले का क्षेत्र जूही थाने के अंतर्गत आता है। दर्शन के लिए जरूरी सुझाव नवरात्र में भारी भीड़ को देखते हुए भक्त इन बातों का ध्यान रखें: भीड़ से बचने के लिए सुबह जल्दी या दोपहर बाद दर्शन करें। वाहन तय पार्किंग में ही खड़ा करें। कीमती सामान और ज्यादा नकदी साथ न ले जाएं। बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें। मंदिर समिति और पुलिस के निर्देशों का पालन करें। प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें और परिसर साफ रखें। कैसे पहुंचें? बारा देवी मंदिर कानपुर के जूही इलाके में स्थित है। कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी कुछ ही किलोमीटर है और ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी से आसानी से पहुंचा जा सकता है। नवरात्र के दौरान आसपास की सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव ज्यादा रहता है, इसलिए समय लेकर निकलें। आस्था और परंपरा का संगम बारा देवी मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि कानपुर की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है। यहां पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं, बहनों के मिलन की कथा और मेले का माहौल शहर की लोक संस्कृति को जीवित रखते हैं। हर साल लाखों भक्त यहां आकर अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। kanpur.live की राय कानपुर की धार्मिक विरासत में बारा देवी मंदिर का विशेष स्थान है। इसकी कथाएं और परंपराएं नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। हम सभी पाठकों को शारदीय नवरात्र की शुभकामनाएं देते हैं और अपील करते हैं कि दर्शन के दौरान अनुशासन और स्वच्छता बनाए रखें। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल प्रश्न 1. बारा देवी मंदिर कहां है? कानपुर के जूही इलाके में। प्रश्न 2. मंदिर का नाम बारा देवी क्यों पड़ा? मान्यता है कि 12 बहनें यहां आकर प्रतिमा रूप में स्थापित हुईं, इसलिए यह नाम पड़ा। प्रश्न 3. नवरात्र में मां को क्या भोग लगता है? 51 किलो जलेबी का भोग। प्रश्न 4. मंगला आरती कब होती है? नवरात्र में सुबह 4 बजे। प्रश्न 5. अष्टमी की रात क्या खास होता है? मान्यता है कि इस रात मां बारा देवी अपनी बहन मां तपेश्वरी से मिलती हैं। प्रश्न 6. मंदिर की व्यवस्था कौन देखता है? मां बारा देवी जीर्णोद्धार एवं रखरखाव समिति। प्रश्न 7. सप्तमी की रात कौन पूजा करने आता है? मां के मायके माने जाने वाले बर्रा गांव से परिजन। स्रोत: मंदिर समिति के बयानों पर आधारित स्थानीय रिपोर्ट, 13 अक्टूबर 2026। धार्मिक जानकारी मान्यताओं पर आधारित है।

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