ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2026: 122 देशों में भारत 100वें स्थान पर
Global Hunger Index 2026: India ranks 100th of 122 countries, child wasting a concern
Kanpur Live News Desk ·

भूख और कुपोषण से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2026 जारी हो गई है। इस रिपोर्ट में भारत 122 देशों में 100वें स्थान पर है। भारत का स्कोर 24.1 है, जिसे "गंभीर" श्रेणी में रखा गया है। पिछले साल भारत 123 देशों में 102वें स्थान पर था, यानी रैंकिंग में मामूली सुधार हुआ है। हालांकि रिपोर्ट में बच्चों में वेस्टिंग यानी लंबाई के हिसाब से कम वजन की बढ़ती दर पर चिंता जताई गई है। यह रिपोर्ट 14 अक्टूबर को "खाद्य सुरक्षा के बिना कोई सुरक्षा नहीं" थीम के साथ जारी की गई।
भारत के आंकड़े
रिपोर्ट के अनुसार भारत के चार प्रमुख संकेतक इस प्रकार हैं:
अल्पपोषण (अंडरन्यूरिशमेंट): 9.8 प्रतिशत, जो पहले 10.5 प्रतिशत था
बच्चों में वेस्टिंग: 19.0 प्रतिशत, जो पहले 16.9 प्रतिशत था
बच्चों में स्टंटिंग: 29.3 प्रतिशत
बाल मृत्यु दर: 2.7 प्रतिशत
रिपोर्ट के अनुसार बच्चों में स्टंटिंग का स्तर पहली बार "बहुत ऊंचे" से घटकर "ऊंचे" स्तर पर आया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है। लेकिन वेस्टिंग की दर बढ़कर 19 प्रतिशत हो गई है, जिसे रिपोर्ट में दक्षिण एशिया में सबसे ऊंचा बताया गया है।
स्कोर में धीरे-धीरे सुधार
भारत का जीएचआई स्कोर 2018 में 25.8 था, जो अब घटकर 24.1 पर आ गया है। जीएचआई में स्कोर जितना कम होता है, स्थिति उतनी बेहतर मानी जाती है। यानी पिछले कुछ वर्षों में धीमा सुधार हुआ है, लेकिन भारत अब भी "गंभीर" श्रेणी (20.0 से 34.9) में बना हुआ है।
पड़ोसी देशों से तुलना
पाकिस्तान: स्कोर 25.5, भारत से पीछे
बांग्लादेश: भारत से बेहतर स्थिति में
दक्षिण एशिया का औसत: 23.4
दुनिया का औसत: 18.1
दक्षिण एशिया के औसत से भारत का स्कोर थोड़ा ज्यादा है, यानी क्षेत्रीय औसत से स्थिति थोड़ी कमजोर है।
दुनिया की तस्वीर
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में भूख की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। वैश्विक स्कोर 2018 के 17.6 से बढ़कर 18.1 हो गया है, यानी स्थिति बिगड़ी है। 32 देशों में भूख बढ़ी है और 57 देश 2030 तक भूख खत्म करने के लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं। सोमालिया का स्कोर सबसे ज्यादा 47.0 रहा। कांगो, चाड, मेडागास्कर और हैती भी सबसे निचले पायदानों पर हैं। 24 देशों का स्कोर 5 से कम है, यानी वहां भूख का स्तर बहुत कम है।
वेस्टिंग और स्टंटिंग क्या है
वेस्टिंग: जब किसी बच्चे का वजन उसकी लंबाई के हिसाब से कम होता है, तो इसे वेस्टिंग कहते हैं। यह आम तौर पर हाल में हुई तेज कुपोषण या बीमारी का संकेत होता है।
स्टंटिंग: जब बच्चे की लंबाई उसकी उम्र के हिसाब से कम होती है, तो इसे स्टंटिंग कहते हैं। यह लंबे समय तक कुपोषण का संकेत है और इसका असर बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर जीवनभर रह सकता है।
अल्पपोषण: आबादी का वह हिस्सा, जिसे पर्याप्त कैलोरी नहीं मिलती।
बाल मृत्यु दर: पांच वर्ष से कम उम्र में मरने वाले बच्चों का अनुपात।
रिपोर्ट पर सवाल भी
पिछले वर्षों में भारत सरकार ग्लोबल हंगर इंडेक्स की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती रही है। सरकार का तर्क रहा है कि चार में से तीन संकेतक केवल बच्चों से जुड़े हैं, जो पूरी आबादी की भूख की सही तस्वीर नहीं दिखाते। साथ ही अल्पपोषण का आंकड़ा छोटे नमूने वाले सर्वे पर आधारित होता है। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों में कुपोषण के आंकड़े, खासकर वेस्टिंग और स्टंटिंग, गंभीर ध्यान देने लायक हैं।
मानसून से जुड़ी चिंता
रिपोर्ट में अल नीनो से जुड़े उस पूर्वानुमान का भी जिक्र है, जिसमें 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने की आशंका जताई गई थी। कमजोर मानसून से फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर असर पड़ता है, जिसका सीधा असर गरीब परिवारों के पोषण पर होता है।
सरकार की प्रमुख योजनाएं
कुपोषण से लड़ने के लिए देश में कई योजनाएं चल रही हैं:
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना: करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन
पोषण अभियान: बच्चों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के पोषण में सुधार
पीएम पोषण (मिड-डे मील): स्कूलों में बच्चों को गर्म पका भोजन
आंगनबाड़ी सेवाएं: छोटे बच्चों और माताओं को पूरक पोषण
फोर्टिफाइड चावल: आयरन और विटामिन मिले चावल का वितरण
घर पर कैसे रखें बच्चों के पोषण का ध्यान
जन्म के पहले छह महीने केवल मां का दूध दें।
छह महीने के बाद दाल, सब्जी, फल और अनाज से बना घर का पूरक आहार शुरू करें।
बच्चे का वजन और लंबाई नियमित रूप से आंगनबाड़ी केंद्र पर नपवाएं।
सभी टीके समय पर लगवाएं।
साफ पानी और साफ-सफाई का ध्यान रखें, क्योंकि बार-बार दस्त होने से भी बच्चे कुपोषित हो जाते हैं।
गर्भवती महिलाएं आयरन, फोलिक एसिड की गोलियां और पौष्टिक भोजन जरूर लें।
बाजार के जंक फूड और ज्यादा चीनी वाले पेय से बच्चों को दूर रखें।
उत्तर प्रदेश के लिए अहमियत
उत्तर प्रदेश देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य है और यहां बच्चों की संख्या भी सबसे ज्यादा है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर कुपोषण के आंकड़ों में सुधार के लिए उत्तर प्रदेश की भूमिका बेहद अहम है। आंगनबाड़ी केंद्रों को मजबूत करना, गर्भवती महिलाओं की देखभाल और स्कूलों में पोषण योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन प्रदेश में बच्चों की सेहत सुधारने के लिए जरूरी है।
आंगनबाड़ी केंद्र का लाभ लें
हर गांव और शहरी बस्ती में आंगनबाड़ी केंद्र होते हैं, जहां छह साल तक के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को पूरक पोषण, टीकाकरण और स्वास्थ्य जांच की सुविधा मिलती है। कई परिवार इन सेवाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते। अपने नजदीकी आंगनबाड़ी केंद्र पर पंजीकरण कराएं, ताकि बच्चे के विकास पर नियमित नजर रखी जा सके और कुपोषण का खतरा समय रहते पहचाना जा सके।
निष्कर्ष
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2026 में भारत की रैंकिंग में मामूली सुधार और स्टंटिंग में कमी अच्छे संकेत हैं। लेकिन बच्चों में वेस्टिंग की बढ़ती दर चिंता का विषय है। कुपोषण से लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि हर परिवार की जिम्मेदारी है। सही पोषण, साफ-सफाई और जागरूकता से ही आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ बनाया जा सकता है।
स्वास्थ्य और समाज से जुड़ी हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2026: 122 देशों में भारत 100वें स्थान पर
भूख और कुपोषण से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2026 जारी हो गई है। इस रिपोर्ट में भारत 122 देशों में 100वें स्थान पर है। भारत का स्कोर 24.1 है, जिसे "गंभीर" श्रेणी में रखा गया है। पिछले साल भारत 123 देशों में 102वें स्थान पर था, यानी रैंकिंग में मामूली सुधार हुआ है। हालांकि रिपोर्ट में बच्चों में वेस्टिंग यानी लंबाई के हिसाब से कम वजन की बढ़ती दर पर चिंता जताई गई है। यह रिपोर्ट 14 अक्टूबर को "खाद्य सुरक्षा के बिना कोई सुरक्षा नहीं" थीम के साथ जारी की गई।
भारत के आंकड़े
रिपोर्ट के अनुसार भारत के चार प्रमुख संकेतक इस प्रकार हैं:
अल्पपोषण (अंडरन्यूरिशमेंट): 9.8 प्रतिशत, जो पहले 10.5 प्रतिशत था
बच्चों में वेस्टिंग: 19.0 प्रतिशत, जो पहले 16.9 प्रतिशत था
बच्चों में स्टंटिंग: 29.3 प्रतिशत
बाल मृत्यु दर: 2.7 प्रतिशत
रिपोर्ट के अनुसार बच्चों में स्टंटिंग का स्तर पहली बार "बहुत ऊंचे" से घटकर "ऊंचे" स्तर पर आया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है। लेकिन वेस्टिंग की दर बढ़कर 19 प्रतिशत हो गई है, जिसे रिपोर्ट में दक्षिण एशिया में सबसे ऊंचा बताया गया है।
स्कोर में धीरे-धीरे सुधार
भारत का जीएचआई स्कोर 2018 में 25.8 था, जो अब घटकर 24.1 पर आ गया है। जीएचआई में स्कोर जितना कम होता है, स्थिति उतनी बेहतर मानी जाती है। यानी पिछले कुछ वर्षों में धीमा सुधार हुआ है, लेकिन भारत अब भी "गंभीर" श्रेणी (20.0 से 34.9) में बना हुआ है।
पड़ोसी देशों से तुलना
पाकिस्तान: स्कोर 25.5, भारत से पीछे
बांग्लादेश: भारत से बेहतर स्थिति में
दक्षिण एशिया का औसत: 23.4
दुनिया का औसत: 18.1
दक्षिण एशिया के औसत से भारत का स्कोर थोड़ा ज्यादा है, यानी क्षेत्रीय औसत से स्थिति थोड़ी कमजोर है।
दुनिया की तस्वीर
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में भूख की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। वैश्विक स्कोर 2018 के 17.6 से बढ़कर 18.1 हो गया है, यानी स्थिति बिगड़ी है। 32 देशों में भूख बढ़ी है और 57 देश 2030 तक भूख खत्म करने के लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं। सोमालिया का स्कोर सबसे ज्यादा 47.0 रहा। कांगो, चाड, मेडागास्कर और हैती भी सबसे निचले पायदानों पर हैं। 24 देशों का स्कोर 5 से कम है, यानी वहां भूख का स्तर बहुत कम है।
वेस्टिंग और स्टंटिंग क्या है
वेस्टिंग: जब किसी बच्चे का वजन उसकी लंबाई के हिसाब से कम होता है, तो इसे वेस्टिंग कहते हैं। यह आम तौर पर हाल में हुई तेज कुपोषण या बीमारी का संकेत होता है।
स्टंटिंग: जब बच्चे की लंबाई उसकी उम्र के हिसाब से कम होती है, तो इसे स्टंटिंग कहते हैं। यह लंबे समय तक कुपोषण का संकेत है और इसका असर बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर जीवनभर रह सकता है।
अल्पपोषण: आबादी का वह हिस्सा, जिसे पर्याप्त कैलोरी नहीं मिलती।
बाल मृत्यु दर: पांच वर्ष से कम उम्र में मरने वाले बच्चों का अनुपात।
रिपोर्ट पर सवाल भी
पिछले वर्षों में भारत सरकार ग्लोबल हंगर इंडेक्स की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती रही है। सरकार का तर्क रहा है कि चार में से तीन संकेतक केवल बच्चों से जुड़े हैं, जो पूरी आबादी की भूख की सही तस्वीर नहीं दिखाते। साथ ही अल्पपोषण का आंकड़ा छोटे नमूने वाले सर्वे पर आधारित होता है। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों में कुपोषण के आंकड़े, खासकर वेस्टिंग और स्टंटिंग, गंभीर ध्यान देने लायक हैं।
मानसून से जुड़ी चिंता
रिपोर्ट में अल नीनो से जुड़े उस पूर्वानुमान का भी जिक्र है, जिसमें 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने की आशंका जताई गई थी। कमजोर मानसून से फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर असर पड़ता है, जिसका सीधा असर गरीब परिवारों के पोषण पर होता है।
सरकार की प्रमुख योजनाएं
कुपोषण से लड़ने के लिए देश में कई योजनाएं चल रही हैं:
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना: करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन
पोषण अभियान: बच्चों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के पोषण में सुधार
पीएम पोषण (मिड-डे मील): स्कूलों में बच्चों को गर्म पका भोजन
आंगनबाड़ी सेवाएं: छोटे बच्चों और माताओं को पूरक पोषण
फोर्टिफाइड चावल: आयरन और विटामिन मिले चावल का वितरण
घर पर कैसे रखें बच्चों के पोषण का ध्यान
जन्म के पहले छह महीने केवल मां का दूध दें।
छह महीने के बाद दाल, सब्जी, फल और अनाज से बना घर का पूरक आहार शुरू करें।
बच्चे का वजन और लंबाई नियमित रूप से आंगनबाड़ी केंद्र पर नपवाएं।
सभी टीके समय पर लगवाएं।
साफ पानी और साफ-सफाई का ध्यान रखें, क्योंकि बार-बार दस्त होने से भी बच्चे कुपोषित हो जाते हैं।
गर्भवती महिलाएं आयरन, फोलिक एसिड की गोलियां और पौष्टिक भोजन जरूर लें।
बाजार के जंक फूड और ज्यादा चीनी वाले पेय से बच्चों को दूर रखें।
उत्तर प्रदेश के लिए अहमियत
उत्तर प्रदेश देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य है और यहां बच्चों की संख्या भी सबसे ज्यादा है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर कुपोषण के आंकड़ों में सुधार के लिए उत्तर प्रदेश की भूमिका बेहद अहम है। आंगनबाड़ी केंद्रों को मजबूत करना, गर्भवती महिलाओं की देखभाल और स्कूलों में पोषण योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन प्रदेश में बच्चों की सेहत सुधारने के लिए जरूरी है।
आंगनबाड़ी केंद्र का लाभ लें
हर गांव और शहरी बस्ती में आंगनबाड़ी केंद्र होते हैं, जहां छह साल तक के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को पूरक पोषण, टीकाकरण और स्वास्थ्य जांच की सुविधा मिलती है। कई परिवार इन सेवाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते। अपने नजदीकी आंगनबाड़ी केंद्र पर पंजीकरण कराएं, ताकि बच्चे के विकास पर नियमित नजर रखी जा सके और कुपोषण का खतरा समय रहते पहचाना जा सके।
निष्कर्ष
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2026 में भारत की रैंकिंग में मामूली सुधार और स्टंटिंग में कमी अच्छे संकेत हैं। लेकिन बच्चों में वेस्टिंग की बढ़ती दर चिंता का विषय है। कुपोषण से लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि हर परिवार की जिम्मेदारी है। सही पोषण, साफ-सफाई और जागरूकता से ही आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ बनाया जा सकता है।
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