भौतिकी का नोबेल: अंटार्कटिका की बर्फ में 'भूतिया कण' पकड़ने वाले हाल्जन को सम्मान
Physics Nobel 2026 awarded to Francis Halzen for IceCube and cosmic neutrinos
Kanpur Live News Desk ·

ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने की इंसान की कोशिश में एक बड़ा अध्याय जोड़ने वाले वैज्ञानिक को इस साल भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने 6 अक्टूबर 2026 को घोषणा की कि यह पुरस्कार बेल्जियम में जन्मे और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में प्रोफेसर फ्रांसिस हाल्जन को दिया जाएगा। उन्हें आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में निर्णायक योगदान और अंतरिक्ष से आने वाले उच्च ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज के लिए यह सम्मान मिला है। न्यूट्रिनो को 'भूतिया कण' भी कहा जाता है, क्योंकि ये लगभग बिना किसी से टकराए हर चीज के आर-पार निकल जाते हैं।
अकेले विजेता, खास सम्मान
इस बार भौतिकी का नोबेल किसी एक वैज्ञानिक को दिया गया है, जो हाल के वर्षों में कम ही देखने को मिला है। विज्ञान पत्रिका 'फिजिक्स टुडे' के प्रधान संपादक रिचर्ड फिट्जगेराल्ड ने कहा कि लंबे समय बाद भौतिकी का नोबेल किसी एक व्यक्ति को मिला है, जो हाल्जन की अनोखी दृष्टि को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही इस वेधशाला को सैकड़ों लोगों ने मिलकर बनाया, लेकिन इसकी शुरुआत एक व्यक्ति से हुई थी।
कौन हैं फ्रांसिस हाल्जन
फ्रांसिस हाल्जन का जन्म 1944 में बेल्जियम के टीनेन में हुआ था। उन्होंने 1969 में बेल्जियम की केयू ल्यूवेन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और बाद में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में प्रोफेसर बने। उनका काम कण भौतिकी, खगोल भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान के मिलन बिंदु पर केंद्रित रहा है। बेल्जियम के प्रधानमंत्री के अनुसार वे नोबेल जीतने वाले 11वें बेल्जियाई हैं।
"बड़ा सरप्राइज था"
82 वर्षीय हाल्जन ने इटली से फोन पर नोबेल प्रेस कॉन्फ्रेंस में बात करते हुए कहा कि यह उनके लिए बड़ा सरप्राइज और खुशी का पल है। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि वे इस समय एक नए प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं और उम्मीद है कि यह पुरस्कार उसे मंजूरी दिलाने में मदद करेगा। उनकी इस बात पर वहां मौजूद लोग मुस्कुरा उठे।
न्यूट्रिनो क्या होते हैं
न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के सबसे छोटे और रहस्यमय कणों में से एक हैं। इनका द्रव्यमान बेहद कम होता है और इन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता। यही कारण है कि ये दूसरे पदार्थों से बहुत कम प्रतिक्रिया करते हैं। हर सेकंड अरबों न्यूट्रिनो हमारे शरीर के आर-पार गुजर जाते हैं और हमें इसका पता भी नहीं चलता। ये सूरज, तारों में होने वाले विस्फोटों और ब्रह्मांड की दूसरी शक्तिशाली घटनाओं से पैदा होते हैं। इन्हें पकड़ना बेहद मुश्किल है, इसलिए इन्हें 'भूतिया कण' कहा जाता है।
बर्फ के नीचे बनी अनोखी दूरबीन
आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला दक्षिणी ध्रुव पर अंटार्कटिका की बर्फ के भीतर बनाई गई एक विशाल प्रयोगशाला है। यह सामान्य दूरबीन की तरह आसमान की ओर नहीं देखती, बल्कि बर्फ के भीतर लगाए गए हजारों संवेदनशील उपकरणों के जरिये न्यूट्रिनो के बेहद दुर्लभ टकराव को पकड़ती है।
जब कोई न्यूट्रिनो बर्फ के किसी अणु से टकराता है, तो उससे बेहद हल्की नीली रोशनी पैदा होती है। अंटार्कटिका की बर्फ बेहद साफ और पारदर्शी है, इसलिए यह रोशनी दूर तक जाती है और उपकरण इसे दर्ज कर लेते हैं। इसी रोशनी के विश्लेषण से वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि न्यूट्रिनो कहां से और कितनी ऊर्जा के साथ आया था।
नई तरह की खगोल विज्ञान
नोबेल समिति के अध्यक्ष मार्क पीयर्स ने कहा कि हाल्जन ने शोधकर्ताओं और इंजीनियरों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम का नेतृत्व किया, जिसने एक शानदार उपकरण दिया। उनके अनुसार हाल्जन की दृढ़ता और वैज्ञानिक दृष्टि ने एक नई तरह की खगोल विज्ञान का रास्ता खोला है।
अब तक खगोल विज्ञान मुख्य रूप से प्रकाश और दूसरी विद्युत चुंबकीय तरंगों पर आधारित था। लेकिन न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान ब्रह्मांड को देखने की एक नई खिड़की खोलता है। न्यूट्रिनो रास्ते में आने वाली गैस, धूल या चुंबकीय क्षेत्रों से लगभग प्रभावित नहीं होते, इसलिए वे अपने स्रोत की सीधी जानकारी लेकर आते हैं। इससे वैज्ञानिक ब्लैक होल के आसपास होने वाली गतिविधियों और ब्रह्मांड के प्राकृतिक कण त्वरकों को बेहतर समझ सकते हैं।
ब्रह्मांड के विकास की कुंजी
वैज्ञानिकों का मानना है कि न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के विकास से जुड़े कई सवालों के जवाब दे सकते हैं। अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल मोलोनी ने कहा कि अंटार्कटिका का यह प्रयोग ब्रह्मांड को समझने का एक क्रांतिकारी तरीका है, जो पहले हमारे पास नहीं था।
पिछले साल किसे मिला था
2025 में भौतिकी का नोबेल जॉन क्लार्क, मिशेल डेवोरे और जॉन मार्टिनिस को क्वांटम भौतिकी से जुड़े प्रयोगों के लिए दिया गया था। भौतिकी का नोबेल अब तक 120 बार 231 विजेताओं को दिया जा चुका है। पुरस्कार राशि करीब 12 लाख अमेरिकी डॉलर के बराबर होती है।
भारत और न्यूट्रिनो शोध
भारत भी न्यूट्रिनो शोध में रुचि रखता रहा है। देश में भूमिगत न्यूट्रिनो प्रयोगशाला की योजना पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। भारतीय वैज्ञानिक दुनिया भर की कई बड़ी कण भौतिकी परियोजनाओं में भी योगदान देते हैं। इस नोबेल से भारत समेत दुनिया भर के युवा वैज्ञानिकों को इस क्षेत्र में शोध के लिए प्रेरणा मिलेगी।
आगे के नोबेल
भौतिकी के बाद अब रसायन विज्ञान का नोबेल बुधवार को, साहित्य का गुरुवार को और शांति का नोबेल शुक्रवार को घोषित किया जाना है। इससे पहले सोमवार को चिकित्सा का नोबेल ऑप्टोजेनेटिक्स पर काम करने वाले तीन वैज्ञानिकों को दिया गया।
युवाओं के लिए संदेश
हाल्जन की कहानी बताती है कि बड़े वैज्ञानिक सपने पूरे करने के लिए धैर्य और लगन जरूरी है। दक्षिणी ध्रुव की बर्फ के नीचे विशाल प्रयोगशाला बनाना आसान काम नहीं था। इसमें कई दशक, हजारों लोगों की मेहनत और अंतरराष्ट्रीय सहयोग लगा। विज्ञान के छात्रों के लिए यह सीख है कि मुश्किल सवालों से घबराने के बजाय उनका जवाब खोजने की कोशिश लगातार जारी रखनी चाहिए।
निष्कर्ष
फ्रांसिस हाल्जन को मिला भौतिकी का नोबेल केवल एक वैज्ञानिक का सम्मान नहीं, बल्कि उस मानवीय जिज्ञासा का सम्मान है, जो ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्यों को समझना चाहती है। अंटार्कटिका की बर्फ में छिपी यह अनोखी वेधशाला आने वाले वर्षों में भी ब्रह्मांड के कई और राज खोल सकती है।
विज्ञान और अंतरिक्ष से जुड़ी हर बड़ी खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
भौतिकी का नोबेल: अंटार्कटिका की बर्फ में 'भूतिया कण' पकड़ने वाले हाल्जन को सम्मान
ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने की इंसान की कोशिश में एक बड़ा अध्याय जोड़ने वाले वैज्ञानिक को इस साल भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने 6 अक्टूबर 2026 को घोषणा की कि यह पुरस्कार बेल्जियम में जन्मे और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में प्रोफेसर फ्रांसिस हाल्जन को दिया जाएगा। उन्हें आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में निर्णायक योगदान और अंतरिक्ष से आने वाले उच्च ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज के लिए यह सम्मान मिला है। न्यूट्रिनो को 'भूतिया कण' भी कहा जाता है, क्योंकि ये लगभग बिना किसी से टकराए हर चीज के आर-पार निकल जाते हैं।
अकेले विजेता, खास सम्मान
इस बार भौतिकी का नोबेल किसी एक वैज्ञानिक को दिया गया है, जो हाल के वर्षों में कम ही देखने को मिला है। विज्ञान पत्रिका 'फिजिक्स टुडे' के प्रधान संपादक रिचर्ड फिट्जगेराल्ड ने कहा कि लंबे समय बाद भौतिकी का नोबेल किसी एक व्यक्ति को मिला है, जो हाल्जन की अनोखी दृष्टि को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही इस वेधशाला को सैकड़ों लोगों ने मिलकर बनाया, लेकिन इसकी शुरुआत एक व्यक्ति से हुई थी।
कौन हैं फ्रांसिस हाल्जन
फ्रांसिस हाल्जन का जन्म 1944 में बेल्जियम के टीनेन में हुआ था। उन्होंने 1969 में बेल्जियम की केयू ल्यूवेन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और बाद में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में प्रोफेसर बने। उनका काम कण भौतिकी, खगोल भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान के मिलन बिंदु पर केंद्रित रहा है। बेल्जियम के प्रधानमंत्री के अनुसार वे नोबेल जीतने वाले 11वें बेल्जियाई हैं।
"बड़ा सरप्राइज था"
82 वर्षीय हाल्जन ने इटली से फोन पर नोबेल प्रेस कॉन्फ्रेंस में बात करते हुए कहा कि यह उनके लिए बड़ा सरप्राइज और खुशी का पल है। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि वे इस समय एक नए प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं और उम्मीद है कि यह पुरस्कार उसे मंजूरी दिलाने में मदद करेगा। उनकी इस बात पर वहां मौजूद लोग मुस्कुरा उठे।
न्यूट्रिनो क्या होते हैं
न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के सबसे छोटे और रहस्यमय कणों में से एक हैं। इनका द्रव्यमान बेहद कम होता है और इन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता। यही कारण है कि ये दूसरे पदार्थों से बहुत कम प्रतिक्रिया करते हैं। हर सेकंड अरबों न्यूट्रिनो हमारे शरीर के आर-पार गुजर जाते हैं और हमें इसका पता भी नहीं चलता। ये सूरज, तारों में होने वाले विस्फोटों और ब्रह्मांड की दूसरी शक्तिशाली घटनाओं से पैदा होते हैं। इन्हें पकड़ना बेहद मुश्किल है, इसलिए इन्हें 'भूतिया कण' कहा जाता है।
बर्फ के नीचे बनी अनोखी दूरबीन
आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला दक्षिणी ध्रुव पर अंटार्कटिका की बर्फ के भीतर बनाई गई एक विशाल प्रयोगशाला है। यह सामान्य दूरबीन की तरह आसमान की ओर नहीं देखती, बल्कि बर्फ के भीतर लगाए गए हजारों संवेदनशील उपकरणों के जरिये न्यूट्रिनो के बेहद दुर्लभ टकराव को पकड़ती है।
जब कोई न्यूट्रिनो बर्फ के किसी अणु से टकराता है, तो उससे बेहद हल्की नीली रोशनी पैदा होती है। अंटार्कटिका की बर्फ बेहद साफ और पारदर्शी है, इसलिए यह रोशनी दूर तक जाती है और उपकरण इसे दर्ज कर लेते हैं। इसी रोशनी के विश्लेषण से वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि न्यूट्रिनो कहां से और कितनी ऊर्जा के साथ आया था।
नई तरह की खगोल विज्ञान
नोबेल समिति के अध्यक्ष मार्क पीयर्स ने कहा कि हाल्जन ने शोधकर्ताओं और इंजीनियरों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम का नेतृत्व किया, जिसने एक शानदार उपकरण दिया। उनके अनुसार हाल्जन की दृढ़ता और वैज्ञानिक दृष्टि ने एक नई तरह की खगोल विज्ञान का रास्ता खोला है।
अब तक खगोल विज्ञान मुख्य रूप से प्रकाश और दूसरी विद्युत चुंबकीय तरंगों पर आधारित था। लेकिन न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान ब्रह्मांड को देखने की एक नई खिड़की खोलता है। न्यूट्रिनो रास्ते में आने वाली गैस, धूल या चुंबकीय क्षेत्रों से लगभग प्रभावित नहीं होते, इसलिए वे अपने स्रोत की सीधी जानकारी लेकर आते हैं। इससे वैज्ञानिक ब्लैक होल के आसपास होने वाली गतिविधियों और ब्रह्मांड के प्राकृतिक कण त्वरकों को बेहतर समझ सकते हैं।
ब्रह्मांड के विकास की कुंजी
वैज्ञानिकों का मानना है कि न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के विकास से जुड़े कई सवालों के जवाब दे सकते हैं। अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल मोलोनी ने कहा कि अंटार्कटिका का यह प्रयोग ब्रह्मांड को समझने का एक क्रांतिकारी तरीका है, जो पहले हमारे पास नहीं था।
पिछले साल किसे मिला था
2025 में भौतिकी का नोबेल जॉन क्लार्क, मिशेल डेवोरे और जॉन मार्टिनिस को क्वांटम भौतिकी से जुड़े प्रयोगों के लिए दिया गया था। भौतिकी का नोबेल अब तक 120 बार 231 विजेताओं को दिया जा चुका है। पुरस्कार राशि करीब 12 लाख अमेरिकी डॉलर के बराबर होती है।
भारत और न्यूट्रिनो शोध
भारत भी न्यूट्रिनो शोध में रुचि रखता रहा है। देश में भूमिगत न्यूट्रिनो प्रयोगशाला की योजना पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। भारतीय वैज्ञानिक दुनिया भर की कई बड़ी कण भौतिकी परियोजनाओं में भी योगदान देते हैं। इस नोबेल से भारत समेत दुनिया भर के युवा वैज्ञानिकों को इस क्षेत्र में शोध के लिए प्रेरणा मिलेगी।
आगे के नोबेल
भौतिकी के बाद अब रसायन विज्ञान का नोबेल बुधवार को, साहित्य का गुरुवार को और शांति का नोबेल शुक्रवार को घोषित किया जाना है। इससे पहले सोमवार को चिकित्सा का नोबेल ऑप्टोजेनेटिक्स पर काम करने वाले तीन वैज्ञानिकों को दिया गया।
युवाओं के लिए संदेश
हाल्जन की कहानी बताती है कि बड़े वैज्ञानिक सपने पूरे करने के लिए धैर्य और लगन जरूरी है। दक्षिणी ध्रुव की बर्फ के नीचे विशाल प्रयोगशाला बनाना आसान काम नहीं था। इसमें कई दशक, हजारों लोगों की मेहनत और अंतरराष्ट्रीय सहयोग लगा। विज्ञान के छात्रों के लिए यह सीख है कि मुश्किल सवालों से घबराने के बजाय उनका जवाब खोजने की कोशिश लगातार जारी रखनी चाहिए।
निष्कर्ष
फ्रांसिस हाल्जन को मिला भौतिकी का नोबेल केवल एक वैज्ञानिक का सम्मान नहीं, बल्कि उस मानवीय जिज्ञासा का सम्मान है, जो ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्यों को समझना चाहती है। अंटार्कटिका की बर्फ में छिपी यह अनोखी वेधशाला आने वाले वर्षों में भी ब्रह्मांड के कई और राज खोल सकती है।
विज्ञान और अंतरिक्ष से जुड़ी हर बड़ी खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
यह खबर अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें:
किसी तथ्य में गलती दिखे तो हमें बताएं — हमारी संपादकीय नीति पढ़ें।
और पढ़ें | Related News
कानपुर के बादशाहीनाका थाने में मॉडल मिशन शक्ति केंद्र शुरू
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2026: 122 देशों में भारत 100वें स्थान पर
होर्मुज में टैंकर पर ड्रोन हमला: पहले 21 साथियों को बचाया, फिर खुद कूदे कानपुर के नितिन
वृद्धावस्था-विधवा-दिव्यांग पेंशन योजनाओं के नाम बदले, दिव्यांगों को बड़ी राहत
वीबीजी-रामजी रोजगार दिवस: कानपुर की 195 ग्राम पंचायतों में एक भी श्रमिक नहीं पहुंचा, 29,500 के लक्ष्य में से 3,713 को ही मिला काम; पोर्टल की खराबी बनी वजह
नवरात्र विशेष: 12 बहनों से जुड़ा है कानपुर के मां बारा देवी मंदिर का इतिहास, 51 किलो जलेबी का भोग और ईंट के नीचे सिक्का रखने की अनोखी परंपरा
सबसे ज़्यादा पढ़ी गई | Most Read
- 1वृद्धावस्था-विधवा-दिव्यांग पेंशन योजनाओं के नाम बदले, दिव्यांगों को बड़ी राहत
- 2भारतीय स्टार्टअप स्काईरूट को अमेरिकी कंपनी से दो लॉन्च का ऑर्डर
- 3कानपुर के बादशाहीनाका थाने में मॉडल मिशन शक्ति केंद्र शुरू
- 4भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता लागू, भारतीय सामान को 100% शुल्क मुक्त पहुंच
- 5सितंबर में बेरोजगारी दर घटकर 5%, शहरों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी