ई-ऑफिस पर सुस्ती से डीएम नाराज: कानपुर के कई विभागों में 42 दिन में 10 से भी कम फाइलें चलीं, अधिकारियों को खुद डिजिटल सिग्नेचर करने के निर्देश
Kanpur DM Unhappy With Slow e-Office Progress: Several Departments Processed Fewer Than 10 Files in 42 Days
Kanpur Live News Desk ·

मुख्य बातें:
कानपुर के जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने ई-ऑफिस पर सरकारी फाइलों के धीमे निस्तारण पर नाराजगी जताई।
1 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच कई विभागों में ई-ऑफिस पर 10 से भी कम फाइलें चलीं।
मत्स्य विभाग, जल निगम, डीसी मनरेगा, डीआईओएस, जिला पंचायत राज अधिकारी और जिला उद्योग केंद्र की प्रगति कमजोर पाई गई।
डीएम ने अधिकारियों को ऑपरेटर पर निर्भर रहने की बजाय खुद डिजिटल सिग्नेचर करने के निर्देश दिए।
ई-ऑफिस चलाने में दिक्कत वाले कर्मचारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कराने को कहा गया।
सरकारी दफ्तरों में फाइलों को कागज से हटाकर ऑनलाइन करने की कोशिश कानपुर में अभी रफ्तार नहीं पकड़ पाई है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार कानपुर के जिलाधिकारी (डीएम) महेंद्र सिंह तंवर ने मंगलवार को ई-ऑफिस प्रणाली की समीक्षा की, जिसमें कई विभागों की प्रगति बेहद धीमी पाई गई। इस पर डीएम ने नाराजगी जताते हुए अधिकारियों को कामकाज में तुरंत सुधार लाने के निर्देश दिए।
कहां हुई समीक्षा बैठक?
समीक्षा बैठक सरसैया घाट स्थित नवीन सभागार में हुई। बैठक में अलग-अलग विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। डीएम ने 1 सितंबर से 12 अक्टूबर तक, यानी करीब 42 दिनों में ई-ऑफिस पर चली फाइलों का विभागवार ब्योरा देखा।
इन विभागों की प्रगति रही कमजोर
रिपोर्टों के अनुसार जिन विभागों में इस अवधि के दौरान ई-ऑफिस पर 10 से भी कम फाइलें (पत्रावलियां) चलीं, उनमें प्रमुख हैं:
मत्स्य विभाग
जल निगम
डीसी मनरेगा
जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस)
जिला पंचायत राज अधिकारी
जिला उद्योग केंद्र
इनके अलावा कुछ और विभागों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं पाई गई।
डीएम ने दिए ये निर्देश
डीएम महेंद्र सिंह तंवर ने बैठक में ये निर्देश दिए:
ई-ऑफिस का नियमित संचालन: सभी अधिकारी सुनिश्चित करें कि फाइलें नियमित रूप से ई-ऑफिस पर चलें।
खुद करें डिजिटल सिग्नेचर: अधिकारी ऑपरेटर पर निर्भर रहने की बजाय अपने डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल खुद करें।
विशेष प्रशिक्षण: ई-ऑफिस चलाने में दिक्कत महसूस करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कराया जाए।
तुरंत सुधार: सभी विभाग अपनी कार्यप्रणाली में तुरंत सुधार लाएं।
ई-ऑफिस क्या है?
ई-ऑफिस भारत सरकार की एक डिजिटल व्यवस्था है, जिसे राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) ने विकसित किया है। इसका मकसद सरकारी दफ्तरों को "पेपरलेस" बनाना है। इस व्यवस्था में:
फाइलें कागज की जगह कंप्यूटर पर बनाई और आगे बढ़ाई जाती हैं।
अधिकारी फाइल पर अपनी टिप्पणी और मंजूरी ऑनलाइन देते हैं।
डिजिटल सिग्नेचर से दस्तावेजों पर हस्ताक्षर होते हैं।
फाइल किस अधिकारी के पास कितने दिन से लंबित है, यह आसानी से पता चल जाता है।
ई-ऑफिस के फायदे
तेजी: फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक पहुंचने में दिन नहीं लगते।
पारदर्शिता: हर फाइल की स्थिति ट्रैक की जा सकती है, जिससे देरी की जवाबदेही तय होती है।
फाइल गुम होने का डर नहीं: डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहते हैं।
कागज की बचत: पर्यावरण के लिहाज से भी फायदेमंद।
कहीं से भी काम: अधिकारी दौरे पर रहते हुए भी जरूरी फाइलें निपटा सकते हैं।
भ्रष्टाचार पर रोक: फाइल दबाने या जानबूझकर देरी करने की गुंजाइश कम होती है।
डिजिटल सिग्नेचर का महत्व
डिजिटल सिग्नेचर किसी व्यक्ति के हाथ से किए हस्ताक्षर का इलेक्ट्रॉनिक रूप है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत इसे कानूनी मान्यता प्राप्त है। हर अधिकारी का डिजिटल सिग्नेचर उसकी व्यक्तिगत पहचान होता है। अगर अधिकारी इसका इस्तेमाल ऑपरेटर से कराते हैं, तो इसकी सुरक्षा और जवाबदेही दोनों पर सवाल उठ सकते हैं। इसी वजह से डीएम ने अधिकारियों को खुद डिजिटल सिग्नेचर करने के निर्देश दिए हैं।
आम लोगों को क्या फायदा?
ई-ऑफिस का सीधा फायदा आम नागरिकों को मिलता है। जब फाइलें तेजी से चलती हैं, तो:
सरकारी योजनाओं के आवेदन जल्दी निपटते हैं।
लाइसेंस, अनुमति और प्रमाण पत्र जैसे काम कम समय में होते हैं।
शिकायतों पर कार्रवाई की रफ्तार बढ़ती है।
दफ्तरों के बार-बार चक्कर काटने की जरूरत कम होती है।
उदाहरण के लिए, जिला उद्योग केंद्र में उद्यमियों के आवेदन, मनरेगा से जुड़े भुगतान और शिक्षा विभाग से जुड़े मामलों में तेजी आने से हजारों लोगों को राहत मिल सकती है।
चुनौतियां भी कम नहीं
ई-ऑफिस अपनाने में कई व्यावहारिक दिक्कतें भी आती हैं:
कई कर्मचारियों को कंप्यूटर चलाने का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं होता।
कुछ दफ्तरों में कंप्यूटर, इंटरनेट और स्कैनर जैसे संसाधनों की कमी होती है।
पुरानी आदतों के कारण लोग कागजी फाइलों पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
तकनीकी खराबी आने पर काम रुक जाता है।
इन्हीं वजहों से डीएम ने विशेष प्रशिक्षण पर जोर दिया है।
प्रदेश स्तर पर भी जोर
उत्तर प्रदेश में शासन स्तर पर सरकारी कामकाज को डिजिटल बनाने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। जिलों में ई-ऑफिस की प्रगति की नियमित समीक्षा होती है, ताकि फाइलों के निस्तारण में तेजी आए और जवाबदेही तय हो। ऐसे में जिन विभागों की प्रगति धीमी है, उन पर ध्यान देना जिला प्रशासन की प्राथमिकता है। आने वाली समीक्षा बैठकों में इन विभागों की प्रगति पर फिर नजर रखी जा सकती है।
कर्मचारियों के लिए आसान सुझाव
ई-ऑफिस पर रोज कुछ फाइलें चलाने की आदत डालें।
डिजिटल सिग्नेचर का पिन और टोकन सुरक्षित रखें, किसी से साझा न करें।
तकनीकी दिक्कत आने पर जिले की एनआईसी टीम से संपर्क करें।
पुरानी कागजी फाइलों को धीरे-धीरे स्कैन कर डिजिटल रूप में सहेजें।
प्रशिक्षण सत्रों में जरूर हिस्सा लें।
kanpur.live की राय
डिजिटल प्रशासन आज की जरूरत है। ई-ऑफिस जैसी व्यवस्था तभी सफल होगी, जब अधिकारी खुद इसे अपनाएंगे और कर्मचारियों को सही प्रशिक्षण और संसाधन मिलेंगे। डीएम की सख्ती से उम्मीद है कि आने वाले दिनों में फाइलों की रफ्तार बढ़ेगी और आम लोगों के काम जल्दी होंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1. समीक्षा बैठक किसने ली? कानपुर के डीएम महेंद्र सिंह तंवर ने।
प्रश्न 2. किस अवधि की समीक्षा हुई? 1 सितंबर से 12 अक्टूबर 2026 तक।
प्रश्न 3. किन विभागों की प्रगति कमजोर रही? मत्स्य विभाग, जल निगम, डीसी मनरेगा, डीआईओएस, जिला पंचायत राज अधिकारी और जिला उद्योग केंद्र समेत कुछ और विभाग।
प्रश्न 4. ई-ऑफिस क्या है? सरकारी फाइलों को ऑनलाइन चलाने की डिजिटल व्यवस्था, जिसे NIC ने विकसित किया है।
प्रश्न 5. डीएम ने डिजिटल सिग्नेचर पर क्या कहा? अधिकारी ऑपरेटर पर निर्भर न रहकर खुद डिजिटल सिग्नेचर करें।
प्रश्न 6. कर्मचारियों के लिए क्या व्यवस्था होगी? ई-ऑफिस चलाने में दिक्कत वालों के लिए विशेष प्रशिक्षण।
प्रश्न 7. समीक्षा बैठक कहां हुई? सरसैया घाट स्थित नवीन सभागार में।
स्रोत: डीएम की समीक्षा बैठक पर आधारित स्थानीय रिपोर्ट, 13 अक्टूबर 2026।
ई-ऑफिस पर सुस्ती से डीएम नाराज: कानपुर के कई विभागों में 42 दिन में 10 से भी कम फाइलें चलीं, अधिकारियों को खुद डिजिटल सिग्नेचर करने के निर्देश
मुख्य बातें:
कानपुर के जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने ई-ऑफिस पर सरकारी फाइलों के धीमे निस्तारण पर नाराजगी जताई।
1 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच कई विभागों में ई-ऑफिस पर 10 से भी कम फाइलें चलीं।
मत्स्य विभाग, जल निगम, डीसी मनरेगा, डीआईओएस, जिला पंचायत राज अधिकारी और जिला उद्योग केंद्र की प्रगति कमजोर पाई गई।
डीएम ने अधिकारियों को ऑपरेटर पर निर्भर रहने की बजाय खुद डिजिटल सिग्नेचर करने के निर्देश दिए।
ई-ऑफिस चलाने में दिक्कत वाले कर्मचारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कराने को कहा गया।
सरकारी दफ्तरों में फाइलों को कागज से हटाकर ऑनलाइन करने की कोशिश कानपुर में अभी रफ्तार नहीं पकड़ पाई है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार कानपुर के जिलाधिकारी (डीएम) महेंद्र सिंह तंवर ने मंगलवार को ई-ऑफिस प्रणाली की समीक्षा की, जिसमें कई विभागों की प्रगति बेहद धीमी पाई गई। इस पर डीएम ने नाराजगी जताते हुए अधिकारियों को कामकाज में तुरंत सुधार लाने के निर्देश दिए।
कहां हुई समीक्षा बैठक?
समीक्षा बैठक सरसैया घाट स्थित नवीन सभागार में हुई। बैठक में अलग-अलग विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। डीएम ने 1 सितंबर से 12 अक्टूबर तक, यानी करीब 42 दिनों में ई-ऑफिस पर चली फाइलों का विभागवार ब्योरा देखा।
इन विभागों की प्रगति रही कमजोर
रिपोर्टों के अनुसार जिन विभागों में इस अवधि के दौरान ई-ऑफिस पर 10 से भी कम फाइलें (पत्रावलियां) चलीं, उनमें प्रमुख हैं:
मत्स्य विभाग
जल निगम
डीसी मनरेगा
जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस)
जिला पंचायत राज अधिकारी
जिला उद्योग केंद्र
इनके अलावा कुछ और विभागों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं पाई गई।
डीएम ने दिए ये निर्देश
डीएम महेंद्र सिंह तंवर ने बैठक में ये निर्देश दिए:
ई-ऑफिस का नियमित संचालन: सभी अधिकारी सुनिश्चित करें कि फाइलें नियमित रूप से ई-ऑफिस पर चलें।
खुद करें डिजिटल सिग्नेचर: अधिकारी ऑपरेटर पर निर्भर रहने की बजाय अपने डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल खुद करें।
विशेष प्रशिक्षण: ई-ऑफिस चलाने में दिक्कत महसूस करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कराया जाए।
तुरंत सुधार: सभी विभाग अपनी कार्यप्रणाली में तुरंत सुधार लाएं।
ई-ऑफिस क्या है?
ई-ऑफिस भारत सरकार की एक डिजिटल व्यवस्था है, जिसे राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) ने विकसित किया है। इसका मकसद सरकारी दफ्तरों को "पेपरलेस" बनाना है। इस व्यवस्था में:
फाइलें कागज की जगह कंप्यूटर पर बनाई और आगे बढ़ाई जाती हैं।
अधिकारी फाइल पर अपनी टिप्पणी और मंजूरी ऑनलाइन देते हैं।
डिजिटल सिग्नेचर से दस्तावेजों पर हस्ताक्षर होते हैं।
फाइल किस अधिकारी के पास कितने दिन से लंबित है, यह आसानी से पता चल जाता है।
ई-ऑफिस के फायदे
तेजी: फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक पहुंचने में दिन नहीं लगते।
पारदर्शिता: हर फाइल की स्थिति ट्रैक की जा सकती है, जिससे देरी की जवाबदेही तय होती है।
फाइल गुम होने का डर नहीं: डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहते हैं।
कागज की बचत: पर्यावरण के लिहाज से भी फायदेमंद।
कहीं से भी काम: अधिकारी दौरे पर रहते हुए भी जरूरी फाइलें निपटा सकते हैं।
भ्रष्टाचार पर रोक: फाइल दबाने या जानबूझकर देरी करने की गुंजाइश कम होती है।
डिजिटल सिग्नेचर का महत्व
डिजिटल सिग्नेचर किसी व्यक्ति के हाथ से किए हस्ताक्षर का इलेक्ट्रॉनिक रूप है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत इसे कानूनी मान्यता प्राप्त है। हर अधिकारी का डिजिटल सिग्नेचर उसकी व्यक्तिगत पहचान होता है। अगर अधिकारी इसका इस्तेमाल ऑपरेटर से कराते हैं, तो इसकी सुरक्षा और जवाबदेही दोनों पर सवाल उठ सकते हैं। इसी वजह से डीएम ने अधिकारियों को खुद डिजिटल सिग्नेचर करने के निर्देश दिए हैं।
आम लोगों को क्या फायदा?
ई-ऑफिस का सीधा फायदा आम नागरिकों को मिलता है। जब फाइलें तेजी से चलती हैं, तो:
सरकारी योजनाओं के आवेदन जल्दी निपटते हैं।
लाइसेंस, अनुमति और प्रमाण पत्र जैसे काम कम समय में होते हैं।
शिकायतों पर कार्रवाई की रफ्तार बढ़ती है।
दफ्तरों के बार-बार चक्कर काटने की जरूरत कम होती है।
उदाहरण के लिए, जिला उद्योग केंद्र में उद्यमियों के आवेदन, मनरेगा से जुड़े भुगतान और शिक्षा विभाग से जुड़े मामलों में तेजी आने से हजारों लोगों को राहत मिल सकती है।
चुनौतियां भी कम नहीं
ई-ऑफिस अपनाने में कई व्यावहारिक दिक्कतें भी आती हैं:
कई कर्मचारियों को कंप्यूटर चलाने का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं होता।
कुछ दफ्तरों में कंप्यूटर, इंटरनेट और स्कैनर जैसे संसाधनों की कमी होती है।
पुरानी आदतों के कारण लोग कागजी फाइलों पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
तकनीकी खराबी आने पर काम रुक जाता है।
इन्हीं वजहों से डीएम ने विशेष प्रशिक्षण पर जोर दिया है।
प्रदेश स्तर पर भी जोर
उत्तर प्रदेश में शासन स्तर पर सरकारी कामकाज को डिजिटल बनाने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। जिलों में ई-ऑफिस की प्रगति की नियमित समीक्षा होती है, ताकि फाइलों के निस्तारण में तेजी आए और जवाबदेही तय हो। ऐसे में जिन विभागों की प्रगति धीमी है, उन पर ध्यान देना जिला प्रशासन की प्राथमिकता है। आने वाली समीक्षा बैठकों में इन विभागों की प्रगति पर फिर नजर रखी जा सकती है।
कर्मचारियों के लिए आसान सुझाव
ई-ऑफिस पर रोज कुछ फाइलें चलाने की आदत डालें।
डिजिटल सिग्नेचर का पिन और टोकन सुरक्षित रखें, किसी से साझा न करें।
तकनीकी दिक्कत आने पर जिले की एनआईसी टीम से संपर्क करें।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1. समीक्षा बैठक किसने ली? कानपुर के डीएम महेंद्र सिंह तंवर ने।
प्रश्न 2. किस अवधि की समीक्षा हुई? 1 सितंबर से 12 अक्टूबर 2026 तक।
प्रश्न 3. किन विभागों की प्रगति कमजोर रही? मत्स्य विभाग, जल निगम, डीसी मनरेगा, डीआईओएस, जिला पंचायत राज अधिकारी और जिला उद्योग केंद्र समेत कुछ और विभाग।
प्रश्न 4. ई-ऑफिस क्या है? सरकारी फाइलों को ऑनलाइन चलाने की डिजिटल व्यवस्था, जिसे NIC ने विकसित किया है।
प्रश्न 5. डीएम ने डिजिटल सिग्नेचर पर क्या कहा? अधिकारी ऑपरेटर पर निर्भर न रहकर खुद डिजिटल सिग्नेचर करें।
प्रश्न 6. कर्मचारियों के लिए क्या व्यवस्था होगी? ई-ऑफिस चलाने में दिक्कत वालों के लिए विशेष प्रशिक्षण।
प्रश्न 7. समीक्षा बैठक कहां हुई? सरसैया घाट स्थित नवीन सभागार में।
स्रोत: डीएम की समीक्षा बैठक पर आधारित स्थानीय रिपोर्ट, 13 अक्टूबर 2026।
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