कानपुर में 8 क्रोमियम हॉटस्पॉट, भूजल पीने लायक नहीं
Kanpur: 8 chromium hotspots including Jajmau, groundwater unfit for drinking, says IIT preliminary report
Kanpur Live News Desk ·

कानपुर के लोगों की सेहत से जुड़ी एक गंभीर खबर सामने आई है। आईआईटी कानपुर की प्रारंभिक वैज्ञानिक रिपोर्ट में शहर के आठ इलाकों को क्रोमियम प्रदूषण का हॉटस्पॉट माना गया है। इन इलाकों के भूजल में क्रोमियम और दूसरी भारी धातुओं की मात्रा तय मानक से कई गुना ज्यादा पाई गई है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि क्रोमियम की वजह से इन जगहों का पानी पीने लायक नहीं रह गया है। जिला प्रशासन ने यह प्रारंभिक रिपोर्ट 3 अक्टूबर को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल कर दी है, जबकि अंतिम वैज्ञानिक रिपोर्ट नवंबर तक आने की उम्मीद है।
ये हैं आठ हॉटस्पॉट
आईआईटी कानपुर की प्रारंभिक रिपोर्ट में जिन इलाकों को हॉटस्पॉट माना गया है, वे हैं:
जाजमऊ औद्योगिक क्षेत्र
जूही बमुरहिया
अफीम कोठी
तेजाब मिल परिसर
गोलाघाट
पनकी औद्योगिक क्षेत्र
नौरैयाखेड़ा-नौबस्ता
रूमा टीएसडीएफ
इनमें से ज्यादातर इलाके औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े हैं या ऐसी जगहें हैं, जहां लंबे समय तक औद्योगिक कचरा जमा होता रहा है। जाजमऊ का नाम खास तौर पर चिंता बढ़ाता है, क्योंकि यह कानपुर के चमड़ा उद्योग का केंद्र है और यहां घनी आबादी भी रहती है।
तीन जिलों में हो रहा अध्ययन
यह अध्ययन केवल कानपुर नगर तक सीमित नहीं है। आईआईटी कानपुर कानपुर नगर, कानपुर देहात और फतेहपुर तीनों जिलों में प्रदूषण का वैज्ञानिक आकलन और मैपिंग कर रहा है। इसके लिए तीनों जिलों के प्रशासन ने जून 2026 में आईआईटी के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे। कानपुर देहात और फतेहपुर की जांच से जुड़ी प्रारंभिक रिपोर्टें भी एनजीटी को सौंपी गई हैं।
121 नमूनों की हुई जांच
अध्ययन के तहत जुलाई से सितंबर के बीच अलग-अलग इलाकों से कुल 121 नमूने लिए गए। इन नमूनों में भूजल के साथ अन्य स्रोतों की भी जांच की गई। जांच में साफ हुआ कि कई जगहों पर क्रोमियम और दूसरी भारी धातुएं सुरक्षित सीमा से काफी ऊपर हैं।
आगे की प्रक्रिया:
अक्टूबर 2026: वायु गुणवत्ता की जांच शुरू होगी।
इसके बाद: प्रदूषित इलाकों की जीआईएस आधारित मैपिंग की जाएगी।
नवंबर 2026: अंतिम वैज्ञानिक रिपोर्ट और तकनीकी सिफारिशें तैयार होंगी।
कानपुर देहात के खानचंद्रपुर का मामला
कानपुर देहात के जिलाधिकारी की ओर से एनजीटी में दाखिल हलफनामे में बताया गया है कि रनियां क्षेत्र के खानचंद्रपुर गांव में पड़े क्रोमियम कचरे को टीएसडीएफ यानी ट्रीटमेंट, स्टोरेज एंड डिस्पोजल फैसिलिटी में भेज दिया गया है। वहां मिट्टी के उपचार और पौधरोपण की योजना है। खानचंद्रपुर का क्रोमियम कचरा कई वर्षों से चर्चा में रहा है और स्थानीय लोग लंबे समय से इसके कारण पानी खराब होने की शिकायत करते रहे हैं।
क्रोमियम क्या है और क्यों खतरनाक है
क्रोमियम एक भारी धातु है, जिसका इस्तेमाल चमड़ा शोधन यानी टैनिंग, इलेक्ट्रोप्लेटिंग, रंग और रसायन उद्योग में बड़े पैमाने पर होता है। यह मुख्य रूप से दो रूपों में पाया जाता है। ट्राइवैलेंट क्रोमियम अपेक्षाकृत कम हानिकारक माना जाता है, जबकि हेक्सावैलेंट क्रोमियम बेहद जहरीला होता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक दूषित पानी पीने से त्वचा, पेट, लिवर और किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है। हेक्सावैलेंट क्रोमियम को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियां कैंसरकारी पदार्थों की श्रेणी में रखती हैं। बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग ऐसे प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
कानपुर में पुरानी है समस्या
कानपुर में क्रोमियम प्रदूषण की समस्या नई नहीं है। चमड़ा उद्योग के कारण गंगा किनारे बसे जाजमऊ और आसपास के इलाकों में दशकों से औद्योगिक कचरे और दूषित पानी की शिकायतें आती रही हैं। कई जगहों पर पुराना क्रोमियम युक्त कचरा खुले में पड़ा रहा, जिससे बारिश के पानी के साथ यह जमीन के अंदर तक पहुंचता गया। गंगा की सफाई से जुड़े अभियानों में भी कानपुर के टेनरी क्लस्टर पर बार-बार सवाल उठे हैं।
अब पहली बार तीन जिलों में एक साथ वैज्ञानिक तरीके से मैपिंग हो रही है, जिससे साफ तस्वीर सामने आने की उम्मीद है कि प्रदूषण कहां और कितना है।
एनजीटी की निगरानी में मामला
यह पूरा मामला एनजीटी की निगरानी में है। प्रारंभिक रिपोर्ट एनजीटी में दाखिल होने के बाद अब अंतिम रिपोर्ट पर सबकी नजर है। अंतिम रिपोर्ट में तकनीकी सिफारिशें होंगी कि प्रदूषित जगहों को कैसे साफ किया जाए, लोगों को सुरक्षित पानी कैसे पहुंचाया जाए और आगे प्रदूषण कैसे रोका जाए। इसके आधार पर प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ठोस कदम उठाने होंगे।
प्रभावित इलाकों के लोग क्या करें
जब तक सरकारी स्तर पर स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक इन इलाकों के लोग कुछ सावधानियां बरत सकते हैं:
हैंडपंप या सबमर्सिबल का पानी बिना जांच के पीने और खाना बनाने में इस्तेमाल न करें।
नगर निगम या जल संस्थान की पाइपलाइन से आने वाले पानी को प्राथमिकता दें।
पानी के रंग, गंध या स्वाद में बदलाव दिखे, तो जल संस्थान या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को शिकायत करें।
ध्यान रखें कि साधारण उबालने से भारी धातुएं नहीं हटतीं। ऐसे पानी के लिए उचित तकनीक वाले फिल्टर की जरूरत होती है, इसके लिए विशेषज्ञ की सलाह लें।
त्वचा पर लगातार खुजली, घाव या पेट से जुड़ी लंबी परेशानी हो, तो डॉक्टर को दिखाएं।
बच्चों को खुले में पड़े औद्योगिक कचरे के पास खेलने से रोकें।
उद्योगों की जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण रोकने में उद्योगों की भूमिका सबसे अहम है। टेनरियों और दूसरे उद्योगों को अपने कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निपटान करना चाहिए और कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) को पूरी क्षमता से चलाना जरूरी है। साथ ही पुराने जमा कचरे को हटाने और प्रभावित जमीन के उपचार की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उद्योग और रोजगार जरूरी हैं, लेकिन लोगों की सेहत की कीमत पर नहीं।
आगे क्या होगा
नवंबर में आने वाली अंतिम रिपोर्ट से यह तय होगा कि प्रदूषण का दायरा कितना बड़ा है और किन इलाकों में तुरंत कार्रवाई की जरूरत है। जीआईएस मैपिंग से प्रशासन को यह समझने में मदद मिलेगी कि प्रदूषण किस दिशा में फैल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि रिपोर्ट के बाद प्रभावित इलाकों में सुरक्षित पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था, कचरा हटाने और मिट्टी के उपचार जैसे कदम तेजी से उठाए जाएंगे।
निष्कर्ष
आईआईटी कानपुर की प्रारंभिक रिपोर्ट कानपुर के लिए एक बड़ी चेतावनी है। आठ इलाकों का भूजल पीने लायक न रहना हजारों परिवारों की सेहत से जुड़ा मुद्दा है। अब जरूरत है कि अंतिम रिपोर्ट के बाद प्रशासन, उद्योग और आम लोग मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें। कानपुर लाइव इस मुद्दे पर लगातार नजर बनाए रखेगा।
कानपुर के पर्यावरण और आपकी सेहत से जुड़ी हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
कानपुर में 8 क्रोमियम हॉटस्पॉट, भूजल पीने लायक नहीं
कानपुर के लोगों की सेहत से जुड़ी एक गंभीर खबर सामने आई है। आईआईटी कानपुर की प्रारंभिक वैज्ञानिक रिपोर्ट में शहर के आठ इलाकों को क्रोमियम प्रदूषण का हॉटस्पॉट माना गया है। इन इलाकों के भूजल में क्रोमियम और दूसरी भारी धातुओं की मात्रा तय मानक से कई गुना ज्यादा पाई गई है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि क्रोमियम की वजह से इन जगहों का पानी पीने लायक नहीं रह गया है। जिला प्रशासन ने यह प्रारंभिक रिपोर्ट 3 अक्टूबर को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल कर दी है, जबकि अंतिम वैज्ञानिक रिपोर्ट नवंबर तक आने की उम्मीद है।
ये हैं आठ हॉटस्पॉट
आईआईटी कानपुर की प्रारंभिक रिपोर्ट में जिन इलाकों को हॉटस्पॉट माना गया है, वे हैं:
जाजमऊ औद्योगिक क्षेत्र
जूही बमुरहिया
अफीम कोठी
तेजाब मिल परिसर
गोलाघाट
पनकी औद्योगिक क्षेत्र
नौरैयाखेड़ा-नौबस्ता
रूमा टीएसडीएफ
इनमें से ज्यादातर इलाके औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े हैं या ऐसी जगहें हैं, जहां लंबे समय तक औद्योगिक कचरा जमा होता रहा है। जाजमऊ का नाम खास तौर पर चिंता बढ़ाता है, क्योंकि यह कानपुर के चमड़ा उद्योग का केंद्र है और यहां घनी आबादी भी रहती है।
तीन जिलों में हो रहा अध्ययन
यह अध्ययन केवल कानपुर नगर तक सीमित नहीं है। आईआईटी कानपुर कानपुर नगर, कानपुर देहात और फतेहपुर तीनों जिलों में प्रदूषण का वैज्ञानिक आकलन और मैपिंग कर रहा है। इसके लिए तीनों जिलों के प्रशासन ने जून 2026 में आईआईटी के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे। कानपुर देहात और फतेहपुर की जांच से जुड़ी प्रारंभिक रिपोर्टें भी एनजीटी को सौंपी गई हैं।
121 नमूनों की हुई जांच
अध्ययन के तहत जुलाई से सितंबर के बीच अलग-अलग इलाकों से कुल 121 नमूने लिए गए। इन नमूनों में भूजल के साथ अन्य स्रोतों की भी जांच की गई। जांच में साफ हुआ कि कई जगहों पर क्रोमियम और दूसरी भारी धातुएं सुरक्षित सीमा से काफी ऊपर हैं।
आगे की प्रक्रिया:
अक्टूबर 2026: वायु गुणवत्ता की जांच शुरू होगी।
इसके बाद: प्रदूषित इलाकों की जीआईएस आधारित मैपिंग की जाएगी।
नवंबर 2026: अंतिम वैज्ञानिक रिपोर्ट और तकनीकी सिफारिशें तैयार होंगी।
कानपुर देहात के खानचंद्रपुर का मामला
कानपुर देहात के जिलाधिकारी की ओर से एनजीटी में दाखिल हलफनामे में बताया गया है कि रनियां क्षेत्र के खानचंद्रपुर गांव में पड़े क्रोमियम कचरे को टीएसडीएफ यानी ट्रीटमेंट, स्टोरेज एंड डिस्पोजल फैसिलिटी में भेज दिया गया है। वहां मिट्टी के उपचार और पौधरोपण की योजना है। खानचंद्रपुर का क्रोमियम कचरा कई वर्षों से चर्चा में रहा है और स्थानीय लोग लंबे समय से इसके कारण पानी खराब होने की शिकायत करते रहे हैं।
क्रोमियम क्या है और क्यों खतरनाक है
क्रोमियम एक भारी धातु है, जिसका इस्तेमाल चमड़ा शोधन यानी टैनिंग, इलेक्ट्रोप्लेटिंग, रंग और रसायन उद्योग में बड़े पैमाने पर होता है। यह मुख्य रूप से दो रूपों में पाया जाता है। ट्राइवैलेंट क्रोमियम अपेक्षाकृत कम हानिकारक माना जाता है, जबकि हेक्सावैलेंट क्रोमियम बेहद जहरीला होता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक दूषित पानी पीने से त्वचा, पेट, लिवर और किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है। हेक्सावैलेंट क्रोमियम को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियां कैंसरकारी पदार्थों की श्रेणी में रखती हैं। बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग ऐसे प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
कानपुर में पुरानी है समस्या
कानपुर में क्रोमियम प्रदूषण की समस्या नई नहीं है। चमड़ा उद्योग के कारण गंगा किनारे बसे जाजमऊ और आसपास के इलाकों में दशकों से औद्योगिक कचरे और दूषित पानी की शिकायतें आती रही हैं। कई जगहों पर पुराना क्रोमियम युक्त कचरा खुले में पड़ा रहा, जिससे बारिश के पानी के साथ यह जमीन के अंदर तक पहुंचता गया। गंगा की सफाई से जुड़े अभियानों में भी कानपुर के टेनरी क्लस्टर पर बार-बार सवाल उठे हैं।
अब पहली बार तीन जिलों में एक साथ वैज्ञानिक तरीके से मैपिंग हो रही है, जिससे साफ तस्वीर सामने आने की उम्मीद है कि प्रदूषण कहां और कितना है।
एनजीटी की निगरानी में मामला
यह पूरा मामला एनजीटी की निगरानी में है। प्रारंभिक रिपोर्ट एनजीटी में दाखिल होने के बाद अब अंतिम रिपोर्ट पर सबकी नजर है। अंतिम रिपोर्ट में तकनीकी सिफारिशें होंगी कि प्रदूषित जगहों को कैसे साफ किया जाए, लोगों को सुरक्षित पानी कैसे पहुंचाया जाए और आगे प्रदूषण कैसे रोका जाए। इसके आधार पर प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ठोस कदम उठाने होंगे।
प्रभावित इलाकों के लोग क्या करें
जब तक सरकारी स्तर पर स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक इन इलाकों के लोग कुछ सावधानियां बरत सकते हैं:
हैंडपंप या सबमर्सिबल का पानी बिना जांच के पीने और खाना बनाने में इस्तेमाल न करें।
नगर निगम या जल संस्थान की पाइपलाइन से आने वाले पानी को प्राथमिकता दें।
पानी के रंग, गंध या स्वाद में बदलाव दिखे, तो जल संस्थान या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को शिकायत करें।
ध्यान रखें कि साधारण उबालने से भारी धातुएं नहीं हटतीं। ऐसे पानी के लिए उचित तकनीक वाले फिल्टर की जरूरत होती है, इसके लिए विशेषज्ञ की सलाह लें।
त्वचा पर लगातार खुजली, घाव या पेट से जुड़ी लंबी परेशानी हो, तो डॉक्टर को दिखाएं।
बच्चों को खुले में पड़े औद्योगिक कचरे के पास खेलने से रोकें।
उद्योगों की जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण रोकने में उद्योगों की भूमिका सबसे अहम है। टेनरियों और दूसरे उद्योगों को अपने कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निपटान करना चाहिए और कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) को पूरी क्षमता से चलाना जरूरी है। साथ ही पुराने जमा कचरे को हटाने और प्रभावित जमीन के उपचार की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उद्योग और रोजगार जरूरी हैं, लेकिन लोगों की सेहत की कीमत पर नहीं।
आगे क्या होगा
नवंबर में आने वाली अंतिम रिपोर्ट से यह तय होगा कि प्रदूषण का दायरा कितना बड़ा है और किन इलाकों में तुरंत कार्रवाई की जरूरत है। जीआईएस मैपिंग से प्रशासन को यह समझने में मदद मिलेगी कि प्रदूषण किस दिशा में फैल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि रिपोर्ट के बाद प्रभावित इलाकों में सुरक्षित पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था, कचरा हटाने और मिट्टी के उपचार जैसे कदम तेजी से उठाए जाएंगे।
निष्कर्ष
आईआईटी कानपुर की प्रारंभिक रिपोर्ट कानपुर के लिए एक बड़ी चेतावनी है। आठ इलाकों का भूजल पीने लायक न रहना हजारों परिवारों की सेहत से जुड़ा मुद्दा है। अब जरूरत है कि अंतिम रिपोर्ट के बाद प्रशासन, उद्योग और आम लोग मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें। कानपुर लाइव इस मुद्दे पर लगातार नजर बनाए रखेगा।
कानपुर के पर्यावरण और आपकी सेहत से जुड़ी हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
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