अशफाक उल्ला खां जयंती: काकोरी के नायक, जिनकी दोस्ती आज भी एकता की मिसाल
Ashfaqullah Khan birth anniversary: remembering the Kakori hero and his bond with Ram Prasad Bismil
Kanpur Live News Desk ·

भारत की आजादी की लड़ाई में अपना जीवन कुर्बान करने वाले महान क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खां की जयंती 22 अक्टूबर को देशभर में मनाई गई। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्ला खां काकोरी कांड के प्रमुख नायकों में से एक थे। राम प्रसाद बिस्मिल के साथ उनकी गहरी दोस्ती आज भी हिंदू-मुस्लिम एकता की सबसे खूबसूरत मिसाल मानी जाती है। सिर्फ 27 साल की उम्र में उन्होंने देश के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया।
शाहजहांपुर में जन्म
अशफाक उल्ला खां का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक पठान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में देश के लिए कुछ करने की भावना थी। वे शायरी के भी शौकीन थे और "हसरत" उपनाम से उर्दू में शायरी लिखते थे। उनकी कविताओं में देशभक्ति और आजादी की तड़प साफ झलकती थी।
बिस्मिल से दोस्ती
अशफाक उल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल दोनों शाहजहांपुर के रहने वाले थे। बिस्मिल उस समय क्रांतिकारी आंदोलन के बड़े नेता थे। शुरुआत में बिस्मिल को अशफाक पर भरोसा करने में समय लगा, लेकिन अशफाक की लगन और देशभक्ति ने जल्द ही बिस्मिल का दिल जीत लिया। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि वे एक-दूसरे के लिए जान देने को तैयार रहते थे। एक कट्टर आर्य समाजी और एक धर्मनिष्ठ मुसलमान की यह दोस्ती उस दौर में बांटने की राजनीति को करारा जवाब थी।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
अशफाक उल्ला खां हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के सक्रिय सदस्य थे। यह संगठन अंग्रेजी हुकूमत को सशस्त्र क्रांति के जरिये उखाड़ फेंकना चाहता था। 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बाद कई युवा क्रांतिकारी रास्ते की ओर मुड़ गए। एचआरए को अपनी गतिविधियों के लिए हथियारों और पैसों की जरूरत थी।
काकोरी कांड: 9 अगस्त 1925
क्रांतिकारियों ने तय किया कि वे अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटकर अपने संगठन के लिए धन जुटाएंगे। 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के पास काकोरी में क्रांतिकारियों ने सहारनपुर से लखनऊ जा रही ट्रेन को रोककर उसमें रखा सरकारी खजाना लूट लिया। इस घटना को काकोरी कांड या काकोरी ट्रेन एक्शन के नाम से जाना जाता है। इसमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद समेत कई क्रांतिकारी शामिल थे।
इस घटना ने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया। यह सीधे सरकार को चुनौती थी, क्योंकि लूटा गया पैसा सरकार का था, किसी आम आदमी का नहीं।
गिरफ्तारी और मुकदमा
काकोरी कांड के बाद अंग्रेज सरकार ने बड़े पैमाने पर धरपकड़ शुरू की। कई क्रांतिकारी पकड़े गए। अशफाक उल्ला खां काफी समय तक पुलिस से बचते रहे और अलग-अलग जगहों पर छिपकर रहे। बाद में दिल्ली में उन्हें पकड़ लिया गया। अंग्रेजों ने उन्हें सरकारी गवाह बनाने के लिए हर तरह का लालच दिया और धर्म के नाम पर बिस्मिल के खिलाफ भड़काने की कोशिश भी की, लेकिन अशफाक अपने साथियों के साथ अडिग खड़े रहे।
फांसी: 19 दिसंबर 1927
लंबे मुकदमे के बाद अदालत ने राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई। अशफाक उल्ला खां को 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद (अब अयोध्या) जेल में फांसी दी गई। उसी दिन राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की नैनी जेल में फांसी दी गई। राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को दो दिन पहले 17 दिसंबर को गोंडा जेल में फांसी दे दी गई थी।
कहा जाता है कि फांसी से पहले अशफाक पूरी तरह शांत थे। उन्होंने फांसी के फंदे को चूमा और देश की आजादी की कामना करते हुए शहीद हो गए।
अमर शायरी
अशफाक उल्ला खां की लिखी पंक्तियां आज भी देशभक्तों के दिलों में जोश भरती हैं। जेल में रहते हुए भी उन्होंने शायरी लिखना नहीं छोड़ा। उनकी रचनाओं में मातृभूमि के प्रति प्रेम, कुर्बानी का जज्बा और आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश झलकता है।
उत्तर प्रदेश से गहरा नाता
अशफाक उल्ला खां की पूरी कहानी उत्तर प्रदेश की धरती से जुड़ी है। शाहजहांपुर में जन्म, लखनऊ के पास काकोरी में ऐतिहासिक कार्रवाई और फैजाबाद में शहादत। कानपुर भी उस दौर में क्रांतिकारी गतिविधियों का बड़ा केंद्र था, जहां गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकार और क्रांतिकारियों के कई साथी सक्रिय थे। आज शाहजहांपुर में शहीदों की स्मृति में स्मारक हैं और काकोरी में भी शहीद स्मारक बना हुआ है।
काकोरी ट्रेन एक्शन नाम क्यों
2021 में उत्तर प्रदेश सरकार ने "काकोरी कांड" का नाम बदलकर "काकोरी ट्रेन एक्शन" कर दिया। सरकार का तर्क था कि "कांड" शब्द नकारात्मक अर्थ देता है, जबकि यह आजादी की लड़ाई की एक गौरवपूर्ण घटना थी। हर साल 9 अगस्त को इस घटना की वर्षगांठ पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
आज के दौर में अशफाक की सीख
अशफाक उल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती आज के समय में और भी प्रासंगिक है। उन्होंने दिखाया कि देश के लिए सबसे बड़ी ताकत एकता है। धर्म, जाति या भाषा के नाम पर बंटने के बजाय मिलकर देश के लिए काम करना ही सच्ची देशभक्ति है। युवाओं के लिए उनकी जिंदगी साहस, त्याग और ईमानदारी की प्रेरणा है।
युवाओं से अपील
आजादी हमें इन क्रांतिकारियों के बलिदान से मिली है। युवाओं को उनकी जीवनियां पढ़नी चाहिए और उनके आदर्शों को अपनाना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में ऐसे महान क्रांतिकारियों की जयंती और बलिदान दिवस पर कार्यक्रम आयोजित कर नई पीढ़ी को उनके योगदान से परिचित कराना चाहिए।
काकोरी के दूसरे नायक
काकोरी ट्रेन एक्शन में शामिल राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह और चंद्रशेखर आजाद भी आजादी के अमर नायक हैं। चंद्रशेखर आजाद इस मामले में कभी पुलिस के हाथ नहीं आए।
शहीदों की स्मृति
शाहजहांपुर में अशफाक उल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल की याद में हर साल कार्यक्रम होते हैं। लोग उनके स्मारकों पर जाकर श्रद्धांजलि देते हैं।
निष्कर्ष
अशफाक उल्ला खां सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एकता, दोस्ती और देशप्रेम के प्रतीक थे। 27 साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने जो बलिदान दिया, वह हमेशा याद रखा जाएगा। उनकी जयंती पर पूरा देश उन्हें नमन करता है।
कानपुर लाइव परिवार की ओर से अमर शहीद अशफाक उल्ला खां को विनम्र श्रद्धांजलि। इतिहास और उत्तर प्रदेश की हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
अशफाक उल्ला खां जयंती: काकोरी के नायक, जिनकी दोस्ती आज भी एकता की मिसाल
भारत की आजादी की लड़ाई में अपना जीवन कुर्बान करने वाले महान क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खां की जयंती 22 अक्टूबर को देशभर में मनाई गई। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्ला खां काकोरी कांड के प्रमुख नायकों में से एक थे। राम प्रसाद बिस्मिल के साथ उनकी गहरी दोस्ती आज भी हिंदू-मुस्लिम एकता की सबसे खूबसूरत मिसाल मानी जाती है। सिर्फ 27 साल की उम्र में उन्होंने देश के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया।
शाहजहांपुर में जन्म
अशफाक उल्ला खां का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक पठान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में देश के लिए कुछ करने की भावना थी। वे शायरी के भी शौकीन थे और "हसरत" उपनाम से उर्दू में शायरी लिखते थे। उनकी कविताओं में देशभक्ति और आजादी की तड़प साफ झलकती थी।
बिस्मिल से दोस्ती
अशफाक उल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल दोनों शाहजहांपुर के रहने वाले थे। बिस्मिल उस समय क्रांतिकारी आंदोलन के बड़े नेता थे। शुरुआत में बिस्मिल को अशफाक पर भरोसा करने में समय लगा, लेकिन अशफाक की लगन और देशभक्ति ने जल्द ही बिस्मिल का दिल जीत लिया। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि वे एक-दूसरे के लिए जान देने को तैयार रहते थे। एक कट्टर आर्य समाजी और एक धर्मनिष्ठ मुसलमान की यह दोस्ती उस दौर में बांटने की राजनीति को करारा जवाब थी।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
अशफाक उल्ला खां हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के सक्रिय सदस्य थे। यह संगठन अंग्रेजी हुकूमत को सशस्त्र क्रांति के जरिये उखाड़ फेंकना चाहता था। 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बाद कई युवा क्रांतिकारी रास्ते की ओर मुड़ गए। एचआरए को अपनी गतिविधियों के लिए हथियारों और पैसों की जरूरत थी।
काकोरी कांड: 9 अगस्त 1925
क्रांतिकारियों ने तय किया कि वे अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटकर अपने संगठन के लिए धन जुटाएंगे। 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के पास काकोरी में क्रांतिकारियों ने सहारनपुर से लखनऊ जा रही ट्रेन को रोककर उसमें रखा सरकारी खजाना लूट लिया। इस घटना को काकोरी कांड या काकोरी ट्रेन एक्शन के नाम से जाना जाता है। इसमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद समेत कई क्रांतिकारी शामिल थे।
इस घटना ने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया। यह सीधे सरकार को चुनौती थी, क्योंकि लूटा गया पैसा सरकार का था, किसी आम आदमी का नहीं।
गिरफ्तारी और मुकदमा
काकोरी कांड के बाद अंग्रेज सरकार ने बड़े पैमाने पर धरपकड़ शुरू की। कई क्रांतिकारी पकड़े गए। अशफाक उल्ला खां काफी समय तक पुलिस से बचते रहे और अलग-अलग जगहों पर छिपकर रहे। बाद में दिल्ली में उन्हें पकड़ लिया गया। अंग्रेजों ने उन्हें सरकारी गवाह बनाने के लिए हर तरह का लालच दिया और धर्म के नाम पर बिस्मिल के खिलाफ भड़काने की कोशिश भी की, लेकिन अशफाक अपने साथियों के साथ अडिग खड़े रहे।
फांसी: 19 दिसंबर 1927
लंबे मुकदमे के बाद अदालत ने राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई। अशफाक उल्ला खां को 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद (अब अयोध्या) जेल में फांसी दी गई। उसी दिन राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की नैनी जेल में फांसी दी गई। राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को दो दिन पहले 17 दिसंबर को गोंडा जेल में फांसी दे दी गई थी।
कहा जाता है कि फांसी से पहले अशफाक पूरी तरह शांत थे। उन्होंने फांसी के फंदे को चूमा और देश की आजादी की कामना करते हुए शहीद हो गए।
अमर शायरी
अशफाक उल्ला खां की लिखी पंक्तियां आज भी देशभक्तों के दिलों में जोश भरती हैं। जेल में रहते हुए भी उन्होंने शायरी लिखना नहीं छोड़ा। उनकी रचनाओं में मातृभूमि के प्रति प्रेम, कुर्बानी का जज्बा और आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश झलकता है।
उत्तर प्रदेश से गहरा नाता
अशफाक उल्ला खां की पूरी कहानी उत्तर प्रदेश की धरती से जुड़ी है। शाहजहांपुर में जन्म, लखनऊ के पास काकोरी में ऐतिहासिक कार्रवाई और फैजाबाद में शहादत। कानपुर भी उस दौर में क्रांतिकारी गतिविधियों का बड़ा केंद्र था, जहां गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकार और क्रांतिकारियों के कई साथी सक्रिय थे। आज शाहजहांपुर में शहीदों की स्मृति में स्मारक हैं और काकोरी में भी शहीद स्मारक बना हुआ है।
काकोरी ट्रेन एक्शन नाम क्यों
2021 में उत्तर प्रदेश सरकार ने "काकोरी कांड" का नाम बदलकर "काकोरी ट्रेन एक्शन" कर दिया। सरकार का तर्क था कि "कांड" शब्द नकारात्मक अर्थ देता है, जबकि यह आजादी की लड़ाई की एक गौरवपूर्ण घटना थी। हर साल 9 अगस्त को इस घटना की वर्षगांठ पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
आज के दौर में अशफाक की सीख
अशफाक उल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती आज के समय में और भी प्रासंगिक है। उन्होंने दिखाया कि देश के लिए सबसे बड़ी ताकत एकता है। धर्म, जाति या भाषा के नाम पर बंटने के बजाय मिलकर देश के लिए काम करना ही सच्ची देशभक्ति है। युवाओं के लिए उनकी जिंदगी साहस, त्याग और ईमानदारी की प्रेरणा है।
युवाओं से अपील
आजादी हमें इन क्रांतिकारियों के बलिदान से मिली है। युवाओं को उनकी जीवनियां पढ़नी चाहिए और उनके आदर्शों को अपनाना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में ऐसे महान क्रांतिकारियों की जयंती और बलिदान दिवस पर कार्यक्रम आयोजित कर नई पीढ़ी को उनके योगदान से परिचित कराना चाहिए।
काकोरी के दूसरे नायक
काकोरी ट्रेन एक्शन में शामिल राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह और चंद्रशेखर आजाद भी आजादी के अमर नायक हैं। चंद्रशेखर आजाद इस मामले में कभी पुलिस के हाथ नहीं आए।
शहीदों की स्मृति
शाहजहांपुर में अशफाक उल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल की याद में हर साल कार्यक्रम होते हैं। लोग उनके स्मारकों पर जाकर श्रद्धांजलि देते हैं।
निष्कर्ष
अशफाक उल्ला खां सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एकता, दोस्ती और देशप्रेम के प्रतीक थे। 27 साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने जो बलिदान दिया, वह हमेशा याद रखा जाएगा। उनकी जयंती पर पूरा देश उन्हें नमन करता है।
कानपुर लाइव परिवार की ओर से अमर शहीद अशफाक उल्ला खां को विनम्र श्रद्धांजलि। इतिहास और उत्तर प्रदेश की हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
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