विश्व पोलियो दिवस: पोलियो मुक्त भारत की कहानी, फिर भी सतर्कता जरूरी
World Polio Day 2026: India's polio-free journey and why vigilance still matters
Kanpur Live News Desk ·

हर साल 24 अक्टूबर को दुनियाभर में विश्व पोलियो दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य पोलियो जैसी खतरनाक बीमारी के खिलाफ जागरूकता फैलाना और इसे दुनिया से पूरी तरह खत्म करने के प्रयासों को मजबूती देना है। 2026 में विश्व पोलियो दिवस की थीम "एंड पोलियो: फॉर एवरी चाइल्ड, फॉर ऑल टाइम" यानी "पोलियो का अंत: हर बच्चे के लिए, हमेशा के लिए" रखी गई है। भारत के लिए यह दिन खास है, क्योंकि कभी दुनिया में सबसे ज्यादा पोलियो के मामलों वाला देश आज पोलियो मुक्त है।
पोलियो क्या है
पोलियो यानी पोलियोमाइलाइटिस एक संक्रामक बीमारी है, जो पोलियो वायरस से होती है। यह मुख्य रूप से पांच साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। वायरस दूषित पानी, भोजन या संक्रमित व्यक्ति के मल के संपर्क से फैलता है। यह शरीर में प्रवेश कर तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है और कुछ मामलों में स्थायी लकवा पैदा कर सकता है। गंभीर मामलों में सांस लेने वाली मांसपेशियों के लकवाग्रस्त होने से मौत भी हो सकती है।
पोलियो का कोई इलाज नहीं
पोलियो का कोई इलाज नहीं है। इससे बचाव का एकमात्र तरीका टीकाकरण है। पोलियो की दवा की कुछ बूंदें या इंजेक्शन बच्चे को जीवनभर की विकलांगता से बचा सकते हैं। इसीलिए "दो बूंद जिंदगी की" का नारा देशभर में मशहूर हुआ।
विश्व पोलियो दिवस का इतिहास
विश्व पोलियो दिवस की शुरुआत रोटरी इंटरनेशनल ने की थी। यह दिन पोलियो का पहला टीका विकसित करने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. जोनास साल्क की याद से जुड़ा है। उनके बनाए इंजेक्शन वाले टीके (आईपीवी) और बाद में अल्बर्ट सेबिन के बनाए मुंह से दी जाने वाली दवा (ओपीवी) ने दुनियाभर में पोलियो के खिलाफ लड़ाई की दिशा बदल दी। 1988 में वैश्विक पोलियो उन्मूलन पहल (जीपीईआई) शुरू हुई, जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, रोटरी और कई संस्थाएं शामिल हैं।
भारत की ऐतिहासिक जीत
एक समय भारत में हर साल हजारों बच्चे पोलियो की वजह से विकलांग हो जाते थे। लेकिन लगातार प्रयासों से भारत ने इस बीमारी पर जीत हासिल की:
1995: पल्स पोलियो अभियान की शुरुआत
13 जनवरी 2011: भारत में वाइल्ड पोलियो का आखिरी मामला पश्चिम बंगाल के हावड़ा में दर्ज हुआ
2012: विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियो प्रभावित देशों की सूची से हटाया
27 मार्च 2014: भारत समेत दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को आधिकारिक रूप से पोलियो मुक्त प्रमाणित किया गया
विशेषज्ञ भारत की इस सफलता को सार्वजनिक स्वास्थ्य के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनते हैं।
पल्स पोलियो अभियान का कमाल
पल्स पोलियो अभियान के तहत एक ही दिन में देशभर में करोड़ों बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई जाती है। इसके लिए लाखों स्वास्थ्य कर्मी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा बहनें और स्वयंसेवक घर-घर जाते हैं। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, मेलों, ईंट-भट्ठों और निर्माण स्थलों पर भी टीमें तैनात होती हैं, ताकि कोई बच्चा छूट न जाए। बच्चे की उंगली पर लगने वाला नीला निशान इस अभियान की पहचान बन गया।
उत्तर प्रदेश की भूमिका
पोलियो के खिलाफ लड़ाई में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ी चुनौती था। एक समय देश के सबसे ज्यादा पोलियो मामले उत्तर प्रदेश और बिहार से आते थे। घनी आबादी, खराब साफ-सफाई और कुछ इलाकों में दवा को लेकर भ्रम जैसी कई मुश्किलें थीं। धर्मगुरुओं, समाजसेवियों और स्थानीय नेताओं की मदद से लोगों का भरोसा जीता गया। कानपुर समेत प्रदेश के हर जिले में स्वास्थ्य कर्मियों की मेहनत से यह लड़ाई जीती गई।
दुनिया में अब भी खतरा
भले ही भारत पोलियो मुक्त है, लेकिन दुनिया से यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अब भी वाइल्ड पोलियो वायरस के मामले सामने आते हैं। जब तक दुनिया के किसी भी कोने में पोलियो है, तब तक हर देश के लिए खतरा बना रहता है, क्योंकि वायरस यात्रियों के जरिये एक देश से दूसरे देश पहुंच सकता है।
इसलिए जरूरी है हर बार दवा
पोलियो मुक्त होने के बावजूद भारत में पल्स पोलियो अभियान और नियमित टीकाकरण जारी है। इसकी वजहें हैं:
पड़ोसी देशों से वायरस आने का खतरा बना हुआ है।
हर साल लाखों नए बच्चे जन्म लेते हैं, जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है।
सभी बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना जरूरी है।
पड़ोसी देशों से आने-जाने वाले बच्चों को सीमा पर पोलियो की दवा पिलाई जाती है।
नियमित टीकाकरण में पोलियो
राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत बच्चों को मुंह से दी जाने वाली पोलियो दवा (ओपीवी) और इंजेक्शन वाला टीका (आईपीवी), दोनों दिए जाते हैं। जन्म के समय, 6, 10 और 14 हफ्ते पर और बाद में बूस्टर खुराक दी जाती है। माता-पिता अपने बच्चे का टीकाकरण कार्ड संभालकर रखें और कोई खुराक न छूटने दें।
माता-पिता क्या करें
पल्स पोलियो अभियान के दिन पांच साल से कम उम्र के हर बच्चे को दवा जरूर पिलाएं, भले ही पहले कितनी बार पिला चुके हों।
नवजात शिशु को भी दवा पिलाएं।
बच्चा बीमार हो, तब भी पोलियो की दवा दी जा सकती है।
नियमित टीकाकरण की सभी खुराकें समय पर लगवाएं।
साफ पानी पिलाएं और साफ-सफाई का ध्यान रखें।
अफवाहों पर ध्यान न दें, पोलियो की दवा पूरी तरह सुरक्षित है।
रोटरी और स्वयंसेवकों का योगदान
रोटरी इंटरनेशनल ने पोलियो उन्मूलन के लिए दुनियाभर में बड़ी रकम जुटाई और लाखों स्वयंसेवकों को इस अभियान से जोड़ा। भारत में भी रोटरी क्लब हर साल विश्व पोलियो दिवस पर जागरूकता रैलियां, कार्यक्रम और सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। कानपुर में भी रोटरी और दूसरी संस्थाएं इस दिन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करती हैं।
स्वास्थ्य कर्मियों को सलाम
पोलियो पर जीत के असली नायक वे स्वास्थ्य कर्मी हैं, जिन्होंने धूप, बारिश और ठंड में घर-घर जाकर बच्चों को दवा पिलाई।
निष्कर्ष
विश्व पोलियो दिवस हमें याद दिलाता है कि सामूहिक प्रयास से कितनी बड़ी बीमारी को हराया जा सकता है। भारत की पोलियो पर जीत स्वास्थ्य कर्मियों, स्वयंसेवकों और जागरूक माता-पिताओं की मेहनत का नतीजा है। लेकिन जब तक दुनिया पूरी तरह पोलियो मुक्त नहीं हो जाती, तब तक सतर्कता जरूरी है। हर बच्चे को "दो बूंद जिंदगी की" जरूर पिलाएं।
स्वास्थ्य से जुड़ी हर जरूरी खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
विश्व पोलियो दिवस: पोलियो मुक्त भारत की कहानी, फिर भी सतर्कता जरूरी
हर साल 24 अक्टूबर को दुनियाभर में विश्व पोलियो दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य पोलियो जैसी खतरनाक बीमारी के खिलाफ जागरूकता फैलाना और इसे दुनिया से पूरी तरह खत्म करने के प्रयासों को मजबूती देना है। 2026 में विश्व पोलियो दिवस की थीम "एंड पोलियो: फॉर एवरी चाइल्ड, फॉर ऑल टाइम" यानी "पोलियो का अंत: हर बच्चे के लिए, हमेशा के लिए" रखी गई है। भारत के लिए यह दिन खास है, क्योंकि कभी दुनिया में सबसे ज्यादा पोलियो के मामलों वाला देश आज पोलियो मुक्त है।
पोलियो क्या है
पोलियो यानी पोलियोमाइलाइटिस एक संक्रामक बीमारी है, जो पोलियो वायरस से होती है। यह मुख्य रूप से पांच साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। वायरस दूषित पानी, भोजन या संक्रमित व्यक्ति के मल के संपर्क से फैलता है। यह शरीर में प्रवेश कर तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है और कुछ मामलों में स्थायी लकवा पैदा कर सकता है। गंभीर मामलों में सांस लेने वाली मांसपेशियों के लकवाग्रस्त होने से मौत भी हो सकती है।
पोलियो का कोई इलाज नहीं
पोलियो का कोई इलाज नहीं है। इससे बचाव का एकमात्र तरीका टीकाकरण है। पोलियो की दवा की कुछ बूंदें या इंजेक्शन बच्चे को जीवनभर की विकलांगता से बचा सकते हैं। इसीलिए "दो बूंद जिंदगी की" का नारा देशभर में मशहूर हुआ।
विश्व पोलियो दिवस का इतिहास
विश्व पोलियो दिवस की शुरुआत रोटरी इंटरनेशनल ने की थी। यह दिन पोलियो का पहला टीका विकसित करने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. जोनास साल्क की याद से जुड़ा है। उनके बनाए इंजेक्शन वाले टीके (आईपीवी) और बाद में अल्बर्ट सेबिन के बनाए मुंह से दी जाने वाली दवा (ओपीवी) ने दुनियाभर में पोलियो के खिलाफ लड़ाई की दिशा बदल दी। 1988 में वैश्विक पोलियो उन्मूलन पहल (जीपीईआई) शुरू हुई, जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, रोटरी और कई संस्थाएं शामिल हैं।
भारत की ऐतिहासिक जीत
एक समय भारत में हर साल हजारों बच्चे पोलियो की वजह से विकलांग हो जाते थे। लेकिन लगातार प्रयासों से भारत ने इस बीमारी पर जीत हासिल की:
1995: पल्स पोलियो अभियान की शुरुआत
13 जनवरी 2011: भारत में वाइल्ड पोलियो का आखिरी मामला पश्चिम बंगाल के हावड़ा में दर्ज हुआ
2012: विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियो प्रभावित देशों की सूची से हटाया
27 मार्च 2014: भारत समेत दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को आधिकारिक रूप से पोलियो मुक्त प्रमाणित किया गया
विशेषज्ञ भारत की इस सफलता को सार्वजनिक स्वास्थ्य के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनते हैं।
पल्स पोलियो अभियान का कमाल
पल्स पोलियो अभियान के तहत एक ही दिन में देशभर में करोड़ों बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई जाती है। इसके लिए लाखों स्वास्थ्य कर्मी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा बहनें और स्वयंसेवक घर-घर जाते हैं। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, मेलों, ईंट-भट्ठों और निर्माण स्थलों पर भी टीमें तैनात होती हैं, ताकि कोई बच्चा छूट न जाए। बच्चे की उंगली पर लगने वाला नीला निशान इस अभियान की पहचान बन गया।
उत्तर प्रदेश की भूमिका
पोलियो के खिलाफ लड़ाई में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ी चुनौती था। एक समय देश के सबसे ज्यादा पोलियो मामले उत्तर प्रदेश और बिहार से आते थे। घनी आबादी, खराब साफ-सफाई और कुछ इलाकों में दवा को लेकर भ्रम जैसी कई मुश्किलें थीं। धर्मगुरुओं, समाजसेवियों और स्थानीय नेताओं की मदद से लोगों का भरोसा जीता गया। कानपुर समेत प्रदेश के हर जिले में स्वास्थ्य कर्मियों की मेहनत से यह लड़ाई जीती गई।
दुनिया में अब भी खतरा
भले ही भारत पोलियो मुक्त है, लेकिन दुनिया से यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अब भी वाइल्ड पोलियो वायरस के मामले सामने आते हैं। जब तक दुनिया के किसी भी कोने में पोलियो है, तब तक हर देश के लिए खतरा बना रहता है, क्योंकि वायरस यात्रियों के जरिये एक देश से दूसरे देश पहुंच सकता है।
इसलिए जरूरी है हर बार दवा
पोलियो मुक्त होने के बावजूद भारत में पल्स पोलियो अभियान और नियमित टीकाकरण जारी है। इसकी वजहें हैं:
पड़ोसी देशों से वायरस आने का खतरा बना हुआ है।
हर साल लाखों नए बच्चे जन्म लेते हैं, जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है।
सभी बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना जरूरी है।
पड़ोसी देशों से आने-जाने वाले बच्चों को सीमा पर पोलियो की दवा पिलाई जाती है।
नियमित टीकाकरण में पोलियो
राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत बच्चों को मुंह से दी जाने वाली पोलियो दवा (ओपीवी) और इंजेक्शन वाला टीका (आईपीवी), दोनों दिए जाते हैं। जन्म के समय, 6, 10 और 14 हफ्ते पर और बाद में बूस्टर खुराक दी जाती है। माता-पिता अपने बच्चे का टीकाकरण कार्ड संभालकर रखें और कोई खुराक न छूटने दें।
माता-पिता क्या करें
पल्स पोलियो अभियान के दिन पांच साल से कम उम्र के हर बच्चे को दवा जरूर पिलाएं, भले ही पहले कितनी बार पिला चुके हों।
नवजात शिशु को भी दवा पिलाएं।
बच्चा बीमार हो, तब भी पोलियो की दवा दी जा सकती है।
नियमित टीकाकरण की सभी खुराकें समय पर लगवाएं।
साफ पानी पिलाएं और साफ-सफाई का ध्यान रखें।
अफवाहों पर ध्यान न दें, पोलियो की दवा पूरी तरह सुरक्षित है।
रोटरी और स्वयंसेवकों का योगदान
रोटरी इंटरनेशनल ने पोलियो उन्मूलन के लिए दुनियाभर में बड़ी रकम जुटाई और लाखों स्वयंसेवकों को इस अभियान से जोड़ा। भारत में भी रोटरी क्लब हर साल विश्व पोलियो दिवस पर जागरूकता रैलियां, कार्यक्रम और सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। कानपुर में भी रोटरी और दूसरी संस्थाएं इस दिन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करती हैं।
स्वास्थ्य कर्मियों को सलाम
पोलियो पर जीत के असली नायक वे स्वास्थ्य कर्मी हैं, जिन्होंने धूप, बारिश और ठंड में घर-घर जाकर बच्चों को दवा पिलाई।
निष्कर्ष
विश्व पोलियो दिवस हमें याद दिलाता है कि सामूहिक प्रयास से कितनी बड़ी बीमारी को हराया जा सकता है। भारत की पोलियो पर जीत स्वास्थ्य कर्मियों, स्वयंसेवकों और जागरूक माता-पिताओं की मेहनत का नतीजा है। लेकिन जब तक दुनिया पूरी तरह पोलियो मुक्त नहीं हो जाती, तब तक सतर्कता जरूरी है। हर बच्चे को "दो बूंद जिंदगी की" जरूर पिलाएं।
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