इसरो 30 अक्टूबर को लॉन्च करेगा एनवीएस-03, देसी नेविगेशन 'नाविक' को मिलेगी नई जान
ISRO to launch NVS-03 on October 30 to revive NavIC, India's own navigation system
Kanpur Live News Desk ·

भारत की अपनी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली "नाविक" को मजबूत करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक अहम उपग्रह लॉन्च करने जा रहा है। इसरो ने 22 अक्टूबर को घोषणा की कि एनवीएस-03 नेविगेशन उपग्रह को 30 अक्टूबर 2026 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया जाएगा। इसके लिए जीएसएलवी एमके-2 रॉकेट का इस्तेमाल होगा। यह उपग्रह नाविक प्रणाली को फिर से पूरी क्षमता से चालू करने में अहम भूमिका निभाएगा।
नाविक क्या है
नाविक (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) भारत की अपनी क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है। इसे पहले इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (आईआरएनएसएस) कहा जाता था। जिस तरह अमेरिका का जीपीएस, रूस का ग्लोनास, यूरोप का गैलीलियो और चीन का बेईदोउ है, उसी तरह नाविक भारत की अपनी प्रणाली है। यह भारत और उसकी सीमा से करीब 1,500 किलोमीटर आगे तक के क्षेत्र में स्थिति, नेविगेशन और समय की सटीक जानकारी देती है।
दो तरह की सेवाएं
नाविक दो तरह की सेवाएं देता है:
स्टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विस: आम नागरिकों के इस्तेमाल के लिए
रिस्ट्रिक्टेड सर्विस: सेना और अधिकृत रणनीतिक उपयोगकर्ताओं के लिए, जो ज्यादा सुरक्षित होती है
क्यों पड़ी नई जान फूंकने की जरूरत
नाविक प्रणाली को पिछले कुछ वर्षों में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है:
परमाणु घड़ियों की खराबी: नेविगेशन उपग्रह बेहद सटीक परमाणु घड़ियों पर निर्भर होते हैं। नाविक के कुछ उपग्रहों में ये घड़ियां खराब हो गईं। मार्च 2016 में लॉन्च हुए आईआरएनएसएस-1एफ ने अपनी 10 साल की डिजाइन आयु पूरी की, लेकिन बाद में उसकी आखिरी रुबिडियम परमाणु घड़ी भी खराब हो गई।
एनवीएस-02 की विफलता: 29 जनवरी 2025 को लॉन्च हुआ एनवीएस-02 उपग्रह अपनी तय कक्षा तक नहीं पहुंच पाया, जिससे दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों का नेटवर्क बनाने में मुश्किल आई।
कितने उपग्रह काम कर रहे
केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि नाविक के 11 उपग्रह लॉन्च किए गए हैं, जिनमें से आठ काम कर रहे हैं। लेकिन इनमें से केवल तीन ही नेविगेशन सिग्नल भेज रहे हैं, जबकि पांच एकतरफा संदेश सेवा देते हैं। विशेषज्ञ डॉ. एस. पांडियन के अनुसार किसी जगह की त्रि-आयामी (3डी) स्थिति बताने के लिए कम से कम चार उपग्रहों की जरूरत होती है। एनवीएस-03 चौथा जरूरी उपग्रह बनेगा, जिसके बाद प्रणाली को फिर से सक्रिय किया जा सकेगा।
एनवीएस-03 के बारे में
यह दूसरी पीढ़ी की एनवीएस श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है।
यह आईआरएनएसएस यानी नाविक का 12वां उपग्रह होगा।
इसे जीएसएलवी एमके-2 से लॉन्च किया जाएगा, जो तीन चरणों वाला रॉकेट है। इसमें ठोस, तरल और क्रायोजेनिक चरण होते हैं।
पहले इसका लॉन्च 15 से 20 अक्टूबर के बीच प्रस्तावित था। रिपोर्टों के अनुसार हाल की कुछ असफलताओं के बाद इसरो सावधानी के साथ आगे बढ़ रहा है।
जीपीएस से बेहतर सटीकता
डॉ. पांडियन के अनुसार नाविक करीब 5 मीटर तक की सटीकता दे सकता है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में जीपीएस की सटीकता करीब 20 मीटर तक होती है। यानी भारत और आसपास के क्षेत्र में नाविक ज्यादा सटीक जानकारी दे सकता है।
आम लोगों के लिए क्या फायदा
नाविक का इस्तेमाल रोजमर्रा की जिंदगी में कई कामों में होता है:
ट्रेनों की ट्रैकिंग: रेलगाड़ियों की वास्तविक समय में लोकेशन की जानकारी
मछुआरों की मदद: समुद्र में मछुआरों की नावों से संपर्क और उन्हें चेतावनी भेजना
वाहन ट्रैकिंग: सार्वजनिक वाहनों और ट्रकों में लोकेशन सिस्टम
आपदा प्रबंधन: बाढ़, चक्रवात और भूकंप के समय राहत कार्यों में मदद
भारतीय मानक समय: देशभर में सटीक समय की जानकारी पहुंचाना
समुद्री संचालन: जहाजों का नेविगेशन
कई आधुनिक स्मार्टफोन में भी अब नाविक सपोर्ट वाले चिप आने लगे हैं।
सेना के लिए क्यों अहम
नाविक का सबसे बड़ा महत्व देश की सुरक्षा से जुड़ा है। सटीक निशाना लगाने वाले हथियार, संचार, निगरानी और रसद पहुंचाने जैसे कामों में सैटेलाइट नेविगेशन बेहद जरूरी है। विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भरता रणनीतिक रूप से कमजोरी बन सकती है, क्योंकि संकट के समय कोई दूसरा देश अपनी सेवा सीमित कर सकता है। नाविक पूरी तरह चालू होने से भारत को रणनीतिक जरूरतों के लिए अपनी स्वतंत्र नेविगेशन व्यवस्था मिलेगी। इसीलिए सेना इस उपग्रह का बेसब्री से इंतजार कर रही है।
परमाणु घड़ी क्यों जरूरी
नेविगेशन उपग्रह लगातार अपने समय और स्थिति के संकेत भेजते हैं। धरती पर लगा रिसीवर अलग-अलग उपग्रहों से आए संकेतों के समय के अंतर से अपनी स्थिति की गणना करता है। अगर समय में एक सेकंड के अरबवें हिस्से की भी गलती हो, तो स्थिति में कई मीटर का फर्क आ सकता है। इसलिए इन उपग्रहों में बेहद सटीक परमाणु घड़ियां लगाई जाती हैं। घड़ी खराब होते ही उपग्रह नेविगेशन के लिए बेकार हो जाता है।
इसरो के आने वाले मिशन
इसरो आने वाले महीनों में कई उपग्रह लॉन्च करने की तैयारी में है। साथ ही गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम पर भी काम चल रहा है। एनवीएस-03 की सफलता इसरो के लिए इसलिए भी अहम है, क्योंकि इससे संगठन का भरोसा बढ़ेगा और नाविक प्रणाली को फिर से मजबूती मिलेगी।
छात्रों के लिए जानकारी
अंतरिक्ष विज्ञान में रुचि रखने वाले छात्र इसरो के लॉन्च को श्रीहरिकोटा के लॉन्च व्यू गैलरी से देखने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण भी कर सकते हैं। इसरो अपने यूट्यूब चैनल और वेबसाइट पर लॉन्च का सीधा प्रसारण भी करता है। कानपुर के छात्र आईआईटी कानपुर समेत कई संस्थानों में एयरोस्पेस और उपग्रह तकनीक से जुड़ी पढ़ाई कर इस क्षेत्र में करियर बना सकते हैं।
आत्मनिर्भरता की ओर कदम
नाविक जैसी अपनी नेविगेशन प्रणाली होना किसी भी देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। दुनिया के गिने-चुने देशों के पास ही अपनी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है। भारत ने अपने दम पर यह प्रणाली विकसित की है। एनवीएस-03 के सफल लॉन्च से इस प्रणाली को फिर से मजबूती मिलेगी।
निष्कर्ष
एनवीएस-03 का लॉन्च भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली नाविक के लिए नई शुरुआत साबित हो सकता है। इससे आम लोगों को बेहतर नेविगेशन सेवाएं मिलेंगी और देश की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी। 30 अक्टूबर को पूरे देश की नजर श्रीहरिकोटा पर रहेगी।
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इसरो 30 अक्टूबर को लॉन्च करेगा एनवीएस-03, देसी नेविगेशन 'नाविक' को मिलेगी नई जान
भारत की अपनी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली "नाविक" को मजबूत करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक अहम उपग्रह लॉन्च करने जा रहा है। इसरो ने 22 अक्टूबर को घोषणा की कि एनवीएस-03 नेविगेशन उपग्रह को 30 अक्टूबर 2026 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया जाएगा। इसके लिए जीएसएलवी एमके-2 रॉकेट का इस्तेमाल होगा। यह उपग्रह नाविक प्रणाली को फिर से पूरी क्षमता से चालू करने में अहम भूमिका निभाएगा।
नाविक क्या है
नाविक (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) भारत की अपनी क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है। इसे पहले इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (आईआरएनएसएस) कहा जाता था। जिस तरह अमेरिका का जीपीएस, रूस का ग्लोनास, यूरोप का गैलीलियो और चीन का बेईदोउ है, उसी तरह नाविक भारत की अपनी प्रणाली है। यह भारत और उसकी सीमा से करीब 1,500 किलोमीटर आगे तक के क्षेत्र में स्थिति, नेविगेशन और समय की सटीक जानकारी देती है।
दो तरह की सेवाएं
नाविक दो तरह की सेवाएं देता है:
स्टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विस: आम नागरिकों के इस्तेमाल के लिए
रिस्ट्रिक्टेड सर्विस: सेना और अधिकृत रणनीतिक उपयोगकर्ताओं के लिए, जो ज्यादा सुरक्षित होती है
क्यों पड़ी नई जान फूंकने की जरूरत
नाविक प्रणाली को पिछले कुछ वर्षों में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है:
परमाणु घड़ियों की खराबी: नेविगेशन उपग्रह बेहद सटीक परमाणु घड़ियों पर निर्भर होते हैं। नाविक के कुछ उपग्रहों में ये घड़ियां खराब हो गईं। मार्च 2016 में लॉन्च हुए आईआरएनएसएस-1एफ ने अपनी 10 साल की डिजाइन आयु पूरी की, लेकिन बाद में उसकी आखिरी रुबिडियम परमाणु घड़ी भी खराब हो गई।
एनवीएस-02 की विफलता: 29 जनवरी 2025 को लॉन्च हुआ एनवीएस-02 उपग्रह अपनी तय कक्षा तक नहीं पहुंच पाया, जिससे दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों का नेटवर्क बनाने में मुश्किल आई।
कितने उपग्रह काम कर रहे
केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि नाविक के 11 उपग्रह लॉन्च किए गए हैं, जिनमें से आठ काम कर रहे हैं। लेकिन इनमें से केवल तीन ही नेविगेशन सिग्नल भेज रहे हैं, जबकि पांच एकतरफा संदेश सेवा देते हैं। विशेषज्ञ डॉ. एस. पांडियन के अनुसार किसी जगह की त्रि-आयामी (3डी) स्थिति बताने के लिए कम से कम चार उपग्रहों की जरूरत होती है। एनवीएस-03 चौथा जरूरी उपग्रह बनेगा, जिसके बाद प्रणाली को फिर से सक्रिय किया जा सकेगा।
एनवीएस-03 के बारे में
यह दूसरी पीढ़ी की एनवीएस श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है।
यह आईआरएनएसएस यानी नाविक का 12वां उपग्रह होगा।
इसे जीएसएलवी एमके-2 से लॉन्च किया जाएगा, जो तीन चरणों वाला रॉकेट है। इसमें ठोस, तरल और क्रायोजेनिक चरण होते हैं।
पहले इसका लॉन्च 15 से 20 अक्टूबर के बीच प्रस्तावित था। रिपोर्टों के अनुसार हाल की कुछ असफलताओं के बाद इसरो सावधानी के साथ आगे बढ़ रहा है।
जीपीएस से बेहतर सटीकता
डॉ. पांडियन के अनुसार नाविक करीब 5 मीटर तक की सटीकता दे सकता है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में जीपीएस की सटीकता करीब 20 मीटर तक होती है। यानी भारत और आसपास के क्षेत्र में नाविक ज्यादा सटीक जानकारी दे सकता है।
आम लोगों के लिए क्या फायदा
नाविक का इस्तेमाल रोजमर्रा की जिंदगी में कई कामों में होता है:
ट्रेनों की ट्रैकिंग: रेलगाड़ियों की वास्तविक समय में लोकेशन की जानकारी
मछुआरों की मदद: समुद्र में मछुआरों की नावों से संपर्क और उन्हें चेतावनी भेजना
वाहन ट्रैकिंग: सार्वजनिक वाहनों और ट्रकों में लोकेशन सिस्टम
आपदा प्रबंधन: बाढ़, चक्रवात और भूकंप के समय राहत कार्यों में मदद
भारतीय मानक समय: देशभर में सटीक समय की जानकारी पहुंचाना
समुद्री संचालन: जहाजों का नेविगेशन
कई आधुनिक स्मार्टफोन में भी अब नाविक सपोर्ट वाले चिप आने लगे हैं।
सेना के लिए क्यों अहम
नाविक का सबसे बड़ा महत्व देश की सुरक्षा से जुड़ा है। सटीक निशाना लगाने वाले हथियार, संचार, निगरानी और रसद पहुंचाने जैसे कामों में सैटेलाइट नेविगेशन बेहद जरूरी है। विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भरता रणनीतिक रूप से कमजोरी बन सकती है, क्योंकि संकट के समय कोई दूसरा देश अपनी सेवा सीमित कर सकता है। नाविक पूरी तरह चालू होने से भारत को रणनीतिक जरूरतों के लिए अपनी स्वतंत्र नेविगेशन व्यवस्था मिलेगी। इसीलिए सेना इस उपग्रह का बेसब्री से इंतजार कर रही है।
परमाणु घड़ी क्यों जरूरी
नेविगेशन उपग्रह लगातार अपने समय और स्थिति के संकेत भेजते हैं। धरती पर लगा रिसीवर अलग-अलग उपग्रहों से आए संकेतों के समय के अंतर से अपनी स्थिति की गणना करता है। अगर समय में एक सेकंड के अरबवें हिस्से की भी गलती हो, तो स्थिति में कई मीटर का फर्क आ सकता है। इसलिए इन उपग्रहों में बेहद सटीक परमाणु घड़ियां लगाई जाती हैं। घड़ी खराब होते ही उपग्रह नेविगेशन के लिए बेकार हो जाता है।
इसरो के आने वाले मिशन
इसरो आने वाले महीनों में कई उपग्रह लॉन्च करने की तैयारी में है। साथ ही गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम पर भी काम चल रहा है। एनवीएस-03 की सफलता इसरो के लिए इसलिए भी अहम है, क्योंकि इससे संगठन का भरोसा बढ़ेगा और नाविक प्रणाली को फिर से मजबूती मिलेगी।
छात्रों के लिए जानकारी
अंतरिक्ष विज्ञान में रुचि रखने वाले छात्र इसरो के लॉन्च को श्रीहरिकोटा के लॉन्च व्यू गैलरी से देखने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण भी कर सकते हैं। इसरो अपने यूट्यूब चैनल और वेबसाइट पर लॉन्च का सीधा प्रसारण भी करता है। कानपुर के छात्र आईआईटी कानपुर समेत कई संस्थानों में एयरोस्पेस और उपग्रह तकनीक से जुड़ी पढ़ाई कर इस क्षेत्र में करियर बना सकते हैं।
आत्मनिर्भरता की ओर कदम
नाविक जैसी अपनी नेविगेशन प्रणाली होना किसी भी देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। दुनिया के गिने-चुने देशों के पास ही अपनी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है। भारत ने अपने दम पर यह प्रणाली विकसित की है। एनवीएस-03 के सफल लॉन्च से इस प्रणाली को फिर से मजबूती मिलेगी।
निष्कर्ष
एनवीएस-03 का लॉन्च भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली नाविक के लिए नई शुरुआत साबित हो सकता है। इससे आम लोगों को बेहतर नेविगेशन सेवाएं मिलेंगी और देश की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी। 30 अक्टूबर को पूरे देश की नजर श्रीहरिकोटा पर रहेगी।
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