कानपुर: हैलट अस्पताल में दलालों का सिंडिकेट, मरीजों को बहलाकर निजी अस्पतालों में ले जा रहे, प्राचार्य ने दिए सख्त कार्रवाई के निर्देश
Kanpur Hallet hospital: touts luring patients to private hospitals
Kanpur Live News Desk ·

कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े हैलट (एलएलआर) अस्पताल में दलालों का एक सिंडिकेट मरीजों को बहला-फुसलाकर निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में ले जा रहा है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने दलालों की फोटो और वीडियो के साथ पुलिस को लिखित शिकायत दी है।
कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने अस्पताल का औचक निरीक्षण कर सुरक्षा गार्डों, कर्मचारियों और डॉक्टरों को फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि दलाली में शामिल कर्मचारियों की पहचान की जा रही है और उन पर सख्त कार्रवाई होगी, जरूरत पड़ने पर एफआईआर भी दर्ज कराई जाएगी।
कैसे काम करता है दलालों का खेल
रिपोर्ट के अनुसार:
दलाल हैलट आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को गुमराह करके निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में ले जाते हैं।
कुछ दलाल ई-एंबुलेंस में बैठकर मरीजों को ले जाते हैं।
रोकने पर दलाल डॉक्टरों और कर्मचारियों को धमकाते हैं और कई बार उल्टा उन्हीं पर आरोप लगा देते हैं।
आरोप है कि अस्पताल के कुछ कर्मचारी और वार्ड बॉय आने वाले मरीजों की जानकारी निजी नर्सिंग होम तक पहुंचाते हैं।
45 एंबुलेंस चलाने का आरोप
कॉलेज प्रशासन की शिकायत में एक व्यक्ति पर 45 एंबुलेंस चलाने और उनके जरिए मरीजों को गुमराह कर निजी अस्पतालों में ले जाने का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार शिकायत के 24 घंटे से ज्यादा समय बाद भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई थी और सोमवार को भी अस्पताल में दलाल जमा थे।
इमरजेंसी के बाहर मरीज के लिए झगड़ा
सोमवार 2 नवंबर को हैलट इमरजेंसी के बाहर दो निजी एंबुलेंस चालक एक मरीज को अपने-अपने निजी अस्पताल ले जाने के लिए आपस में भिड़ गए। गार्डों ने बीच-बचाव किया, मरीज से पूछताछ की और उसे इलाज के लिए अस्पताल के अंदर भेजा। यह घटना बताती है कि मरीजों को किस तरह 'ग्राहक' की तरह देखा जा रहा है।
प्राचार्य के निर्देश
अस्पताल परिसर में कोई भी दलाल दिखे, तो सुरक्षा गार्ड तुरंत पुलिस को सूचना दें।
दलाली में शामिल कर्मचारियों की पहचान कर सख्त कार्रवाई होगी।
जरूरत पड़ने पर एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
हैलट: गरीबों का सबसे बड़ा सहारा
हैलट अस्पताल कानपुर और आसपास के कई जिलों के मरीजों के लिए सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। कानपुर देहात, उन्नाव, फतेहपुर, औरैया, कन्नौज और बुंदेलखंड तक से गंभीर मरीज यहां रेफर होकर आते हैं। यहां इलाज सस्ता या मुफ्त है, इसलिए गरीब परिवारों के लिए यह सबसे बड़ा सहारा है। ऐसे में दलालों के जाल में फंसकर निजी अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को भारी खर्च उठाना पड़ता है और कई बार कर्ज तक लेना पड़ता है।
मरीजों को कैसे फंसाते हैं दलाल
दलाल अक्सर इन तरीकों से मरीजों और परिजनों को बहकाते हैं:
"यहां बेड खाली नहीं है" या "यहां डॉक्टर नहीं हैं" कहकर।
"सरकारी अस्पताल में इलाज ठीक नहीं होता" कहकर डर पैदा करके।
"निजी अस्पताल में आयुष्मान कार्ड से मुफ्त इलाज हो जाएगा" जैसे झूठे वादे करके।
घबराए परिजनों को जल्दबाजी में फैसला लेने पर मजबूर करके।
मरीज और परिजन क्या करें
सीधे इमरजेंसी जाएं: सरकारी अस्पताल पहुंचें तो किसी बाहरी व्यक्ति की बात सुनने की बजाय सीधे इमरजेंसी या पंजीकरण काउंटर पर जाएं।
डॉक्टर से पूछें: इलाज और बेड की जानकारी केवल अस्पताल के डॉक्टर या अधिकृत कर्मचारी से लें।
रेफर का पर्चा लें: अगर डॉक्टर किसी दूसरे अस्पताल रेफर करते हैं, तो लिखित रेफर पर्चा जरूर लें।
दलाल की शिकायत करें: कोई बहकाए तो अस्पताल के सुरक्षा अधिकारी, सीएमएस कार्यालय या पुलिस को 112 पर सूचना दें।
सरकारी एंबुलेंस: 108 और 102 सरकारी एंबुलेंस सेवा मुफ्त है, उसी का इस्तेमाल करें।
आयुष्मान कार्ड: आयुष्मान भारत योजना के तहत सूचीबद्ध अस्पतालों की जानकारी आधिकारिक पोर्टल या हेल्पलाइन से ही लें।
कर्मचारियों की मिलीभगत बड़ा सवाल
अगर अस्पताल के अंदर के कुछ कर्मचारी दलालों को मरीजों की जानकारी दे रहे हैं, तो यह बेहद गंभीर मामला है। ऐसे कर्मचारी उसी संस्थान से धोखा कर रहे हैं, जिसका वे वेतन लेते हैं। प्रशासन को ऐसे कर्मचारियों की पहचान कर उन पर विभागीय और कानूनी, दोनों तरह की कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि दूसरों को सबक मिले।
समाधान के उपाय
सीसीटीवी निगरानी: इमरजेंसी और मुख्य गेट पर कैमरों से दलालों की पहचान।
हेल्प डेस्क: इमरजेंसी के बाहर अस्पताल की हेल्प डेस्क, जहां मरीजों को सही जानकारी मिले।
पुलिस चौकी: अस्पताल परिसर में सक्रिय पुलिस चौकी और नियमित गश्त।
एंबुलेंस पर नियंत्रण: निजी एंबुलेंसों के अस्पताल गेट पर खड़े होने पर रोक।
जागरूकता बोर्ड: परिसर में बड़े बोर्ड लगाए जाएं कि दलालों से सावधान रहें और शिकायत कहां करें।
आगे क्या होगा
कॉलेज प्रशासन की शिकायत पर अब पुलिस की कार्रवाई का इंतजार है। फोटो और वीडियो जैसे सबूत दिए जाने के बाद पुलिस के पास दलालों की पहचान करने का ठोस आधार है। वहीं अस्पताल के भीतर दलालों की मदद करने वाले कर्मचारियों की पहचान का काम कॉलेज प्रशासन के स्तर पर चल रहा है। अगर जांच में किसी कर्मचारी की भूमिका साबित होती है, तो उस पर निलंबन जैसी विभागीय कार्रवाई और कानूनी कार्रवाई दोनों हो सकती हैं। मरीजों और उनके परिजनों को उम्मीद है कि इस बार कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेगी।
सरकारी अस्पतालों पर भरोसा जरूरी
सरकारी अस्पताल आम लोगों के इलाज की रीढ़ हैं। जब दलाल यह भ्रम फैलाते हैं कि सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं मिलेगा, तो इससे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर होता है। हैलट जैसे अस्पताल में अनुभवी डॉक्टर, विशेषज्ञ विभाग और जांच की सुविधाएं मौजूद हैं। जरूरत इस बात की है कि अस्पताल प्रशासन मरीजों को सही समय पर सही जानकारी दे, ताकि कोई भी परिवार दलालों के झांसे में न आए। मरीजों के साथ अच्छा व्यवहार और पारदर्शी व्यवस्था ही दलालों के खेल को खत्म करने का सबसे कारगर तरीका है।
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निष्कर्ष
हैलट जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में दलालों का सिंडिकेट गरीब मरीजों की मजबूरी का फायदा उठा रहा है। प्राचार्य की सख्ती और पुलिस शिकायत अच्छा कदम है, लेकिन असली जरूरत लगातार निगरानी और अंदर के मददगारों पर कड़ी कार्रवाई की है। मरीज और परिजन भी जागरूक रहें और किसी बाहरी के बहकावे में न आएं।
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कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने अस्पताल का औचक निरीक्षण कर सुरक्षा गार्डों, कर्मचारियों और डॉक्टरों को फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि दलाली में शामिल कर्मचारियों की पहचान की जा रही है और उन पर सख्त कार्रवाई होगी, जरूरत पड़ने पर एफआईआर भी दर्ज कराई जाएगी।
कैसे काम करता है दलालों का खेल
रिपोर्ट के अनुसार:
दलाल हैलट आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को गुमराह करके निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में ले जाते हैं।
कुछ दलाल ई-एंबुलेंस में बैठकर मरीजों को ले जाते हैं।
रोकने पर दलाल डॉक्टरों और कर्मचारियों को धमकाते हैं और कई बार उल्टा उन्हीं पर आरोप लगा देते हैं।
आरोप है कि अस्पताल के कुछ कर्मचारी और वार्ड बॉय आने वाले मरीजों की जानकारी निजी नर्सिंग होम तक पहुंचाते हैं।
45 एंबुलेंस चलाने का आरोप
कॉलेज प्रशासन की शिकायत में एक व्यक्ति पर 45 एंबुलेंस चलाने और उनके जरिए मरीजों को गुमराह कर निजी अस्पतालों में ले जाने का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार शिकायत के 24 घंटे से ज्यादा समय बाद भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई थी और सोमवार को भी अस्पताल में दलाल जमा थे।
इमरजेंसी के बाहर मरीज के लिए झगड़ा
सोमवार 2 नवंबर को हैलट इमरजेंसी के बाहर दो निजी एंबुलेंस चालक एक मरीज को अपने-अपने निजी अस्पताल ले जाने के लिए आपस में भिड़ गए। गार्डों ने बीच-बचाव किया, मरीज से पूछताछ की और उसे इलाज के लिए अस्पताल के अंदर भेजा। यह घटना बताती है कि मरीजों को किस तरह 'ग्राहक' की तरह देखा जा रहा है।
प्राचार्य के निर्देश
अस्पताल परिसर में कोई भी दलाल दिखे, तो सुरक्षा गार्ड तुरंत पुलिस को सूचना दें।
दलाली में शामिल कर्मचारियों की पहचान कर सख्त कार्रवाई होगी।
जरूरत पड़ने पर एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
हैलट: गरीबों का सबसे बड़ा सहारा
हैलट अस्पताल कानपुर और आसपास के कई जिलों के मरीजों के लिए सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। कानपुर देहात, उन्नाव, फतेहपुर, औरैया, कन्नौज और बुंदेलखंड तक से गंभीर मरीज यहां रेफर होकर आते हैं। यहां इलाज सस्ता या मुफ्त है, इसलिए गरीब परिवारों के लिए यह सबसे बड़ा सहारा है। ऐसे में दलालों के जाल में फंसकर निजी अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को भारी खर्च उठाना पड़ता है और कई बार कर्ज तक लेना पड़ता है।
मरीजों को कैसे फंसाते हैं दलाल
दलाल अक्सर इन तरीकों से मरीजों और परिजनों को बहकाते हैं:
"यहां बेड खाली नहीं है" या "यहां डॉक्टर नहीं हैं" कहकर।
"सरकारी अस्पताल में इलाज ठीक नहीं होता" कहकर डर पैदा करके।
"निजी अस्पताल में आयुष्मान कार्ड से मुफ्त इलाज हो जाएगा" जैसे झूठे वादे करके।
घबराए परिजनों को जल्दबाजी में फैसला लेने पर मजबूर करके।
मरीज और परिजन क्या करें
सीधे इमरजेंसी जाएं: सरकारी अस्पताल पहुंचें तो किसी बाहरी व्यक्ति की बात सुनने की बजाय सीधे इमरजेंसी या पंजीकरण काउंटर पर जाएं।
डॉक्टर से पूछें: इलाज और बेड की जानकारी केवल अस्पताल के डॉक्टर या अधिकृत कर्मचारी से लें।
रेफर का पर्चा लें: अगर डॉक्टर किसी दूसरे अस्पताल रेफर करते हैं, तो लिखित रेफर पर्चा जरूर लें।
दलाल की शिकायत करें: कोई बहकाए तो अस्पताल के सुरक्षा अधिकारी, सीएमएस कार्यालय या पुलिस को 112 पर सूचना दें।
सरकारी एंबुलेंस: 108 और 102 सरकारी एंबुलेंस सेवा मुफ्त है, उसी का इस्तेमाल करें।
आयुष्मान कार्ड: आयुष्मान भारत योजना के तहत सूचीबद्ध अस्पतालों की जानकारी आधिकारिक पोर्टल या हेल्पलाइन से ही लें।
कर्मचारियों की मिलीभगत बड़ा सवाल
अगर अस्पताल के अंदर के कुछ कर्मचारी दलालों को मरीजों की जानकारी दे रहे हैं, तो यह बेहद गंभीर मामला है। ऐसे कर्मचारी उसी संस्थान से धोखा कर रहे हैं, जिसका वे वेतन लेते हैं। प्रशासन को ऐसे कर्मचारियों की पहचान कर उन पर विभागीय और कानूनी, दोनों तरह की कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि दूसरों को सबक मिले।
समाधान के उपाय
सीसीटीवी निगरानी: इमरजेंसी और मुख्य गेट पर कैमरों से दलालों की पहचान।
हेल्प डेस्क: इमरजेंसी के बाहर अस्पताल की हेल्प डेस्क, जहां मरीजों को सही जानकारी मिले।
पुलिस चौकी: अस्पताल परिसर में सक्रिय पुलिस चौकी और नियमित गश्त।
एंबुलेंस पर नियंत्रण: निजी एंबुलेंसों के अस्पताल गेट पर खड़े होने पर रोक।
जागरूकता बोर्ड: परिसर में बड़े बोर्ड लगाए जाएं कि दलालों से सावधान रहें और शिकायत कहां करें।
आगे क्या होगा
कॉलेज प्रशासन की शिकायत पर अब पुलिस की कार्रवाई का इंतजार है। फोटो और वीडियो जैसे सबूत दिए जाने के बाद पुलिस के पास दलालों की पहचान करने का ठोस आधार है। वहीं अस्पताल के भीतर दलालों की मदद करने वाले कर्मचारियों की पहचान का काम कॉलेज प्रशासन के स्तर पर चल रहा है। अगर जांच में किसी कर्मचारी की भूमिका साबित होती है, तो उस पर निलंबन जैसी विभागीय कार्रवाई और कानूनी कार्रवाई दोनों हो सकती हैं। मरीजों और उनके परिजनों को उम्मीद है कि इस बार कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेगी।
सरकारी अस्पतालों पर भरोसा जरूरी
सरकारी अस्पताल आम लोगों के इलाज की रीढ़ हैं। जब दलाल यह भ्रम फैलाते हैं कि सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं मिलेगा, तो इससे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर होता है। हैलट जैसे अस्पताल में अनुभवी डॉक्टर, विशेषज्ञ विभाग और जांच की सुविधाएं मौजूद हैं। जरूरत इस बात की है कि अस्पताल प्रशासन मरीजों को सही समय पर सही जानकारी दे, ताकि कोई भी परिवार दलालों के झांसे में न आए। मरीजों के साथ अच्छा व्यवहार और पारदर्शी व्यवस्था ही दलालों के खेल को खत्म करने का सबसे कारगर तरीका है।
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निष्कर्ष
हैलट जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में दलालों का सिंडिकेट गरीब मरीजों की मजबूरी का फायदा उठा रहा है। प्राचार्य की सख्ती और पुलिस शिकायत अच्छा कदम है, लेकिन असली जरूरत लगातार निगरानी और अंदर के मददगारों पर कड़ी कार्रवाई की है। मरीज और परिजन भी जागरूक रहें और किसी बाहरी के बहकावे में न आएं।
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