करोड़ों साल पुरानी चट्टान पर खड़ा मेहरानगढ़ किला बनेगा देश का पहला यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क? तैयारी तेज, 6 अक्टूबर को जागरूकता अभियान
Jodhpur's Mehrangarh Fort in race to become India's first UNESCO Global Geopark
Kanpur Live News Desk ·

राजस्थान की शान और जोधपुर की पहचान मेहरानगढ़ किला अब एक नई अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि की ओर बढ़ रहा है। इस ऐतिहासिक किले को देश का पहला यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क बनाने की तैयारी तेज हो गई है। खास बात यह है कि यह किला जितना ऐतिहासिक है, उससे कहीं ज्यादा पुरानी है वह पहाड़ी, जिस पर यह खड़ा है। करीब साढ़े पांच सौ साल पुराना यह किला लगभग 75 करोड़ वर्ष पुरानी चट्टान पर बना है। अगर यह प्रयास सफल होता है, तो भारत भी उन देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनके पास यूनेस्को से मान्यता प्राप्त ग्लोबल जियोपार्क है। इससे देश में भू-पर्यटन यानी जियो टूरिज्म को भी नई दिशा मिल सकती है।
कौन कर रहा है यह काम
मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट और भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक धरोहर न्यास यानी इंटेक मिलकर इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रहे हैं। परियोजना से जुड़ा अकादमिक और शोध कार्य पूरा हो चुका है और अब इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आगे बढ़ाने की तैयारी है। इसके लिए जन-जागरूकता बढ़ाने और स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
इंटेक देश में कला, संस्कृति और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के लिए काम करने वाली प्रमुख संस्था है। भूवैज्ञानिक विरासत के संरक्षण की दिशा में भी यह संस्था लंबे समय से सक्रिय है।
किला 565 साल पुराना, चट्टान 75 करोड़ साल
ऐतिहासिक रूप से मेहरानगढ़ किला करीब 565 साल पुराना है, लेकिन जिस पहाड़ी पर यह बना है, उसकी भूवैज्ञानिक आयु लगभग 75 करोड़ वर्ष बताई जाती है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी जीएसआई ने भी इस क्षेत्र को आधिकारिक रूप से चिह्नित किया है। यहां की अनोखी भूवैज्ञानिक संरचना किले के भीतर और आसपास साफ दिखाई देती है।
इस समय अवधि को समझना आसान नहीं है। 75 करोड़ साल पहले धरती पर न डायनासोर थे, न पेड़-पौधे और न ही जमीन पर कोई बड़ा जीव। उस समय जीवन मुख्य रूप से समुद्र में सूक्ष्म रूपों में मौजूद था। यानी मेहरानगढ़ की चट्टानें धरती के उस बेहद प्राचीन दौर की गवाह हैं।
मालानी आग्नेय सुइट: ज्वालामुखी का प्रमाण
विशेषज्ञों के अनुसार यहां पाया जाने वाला मालानी आग्नेय सुइट भारतीय उपमहाद्वीप में प्रीकैम्ब्रियन युग के अंतिम दौर की अम्लीय ज्वालामुखीय गतिविधि का महत्वपूर्ण प्रमाण है। बड़े पैमाने पर हुए ज्वालामुखीय विस्फोटों से इन आग्नेय चट्टानों का निर्माण हुआ था। इन खास चट्टानों को वेल्डेड टफ भी कहा जाता है।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने मेहरानगढ़ की चट्टानों वाले क्षेत्र में दो राष्ट्रीय स्तर के भूवैज्ञानिक स्मारक भी स्थापित किए हैं। यही विशेषताएं मेहरानगढ़ को ग्लोबल जियोपार्क के लिए मजबूत दावेदार बनाती हैं।
आग्नेय चट्टान क्या होती है: जब धरती के भीतर का पिघला हुआ पदार्थ यानी मैग्मा ज्वालामुखी के जरिये बाहर आता है या भीतर ही ठंडा होकर जम जाता है, तो उससे बनी चट्टानों को आग्नेय चट्टान कहा जाता है। ग्रेनाइट और बेसाल्ट इसके आम उदाहरण हैं। वेल्डेड टफ ऐसी चट्टान है, जो ज्वालामुखी विस्फोट से निकली गर्म राख और कणों के आपस में जुड़कर ठोस हो जाने से बनती है।
6 अक्टूबर को भू-विविधता दिवस पर विशेष अभियान
मेहरानगढ़ केवल ऐतिहासिक धरोहर ही नहीं, बल्कि भू-विरासत, प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक विविधता का भी अहम केंद्र है। इसी पहाड़ी क्षेत्र में स्थित राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क अपनी प्राकृतिक और जैविक विविधता के लिए जाना जाता है।
यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क के दावे को मजबूत करने के लिए 6 अक्टूबर को भू-विविधता दिवस के मौके पर विशेष जन-जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, जिसमें भारत सरकार, राजस्थान सरकार और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी की योजना है। परियोजना से जुड़े प्रतिनिधि अंतरराष्ट्रीय मानकों को समझने के लिए यूनेस्को हाउस में आयोजित एक कार्यशाला में भी हिस्सा ले चुके हैं।
दुनिया में 241 जियोपार्क, भारत में एक भी नहीं
यूनेस्को भूवैज्ञानिक महत्व वाले क्षेत्रों को उनकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ संरक्षित करने के उद्देश्य से ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा देता है। इसके लिए संबंधित क्षेत्र की ओर से तय प्रक्रिया के तहत आवेदन किया जाता है, जिसके बाद यूनेस्को उसका मूल्यांकन करता है।
वर्तमान में दुनिया के 51 देशों में 241 ग्लोबल जियोपार्क हैं, लेकिन भारत में अभी तक किसी भी स्थल को यह दर्जा नहीं मिला है। यूनेस्को ने 2015 में इंटरनेशनल जियोसाइंस एंड जियोपार्क प्रोग्राम के तहत इस वैश्विक पहल की शुरुआत की थी। 2025 में इस कार्यक्रम के 10 साल पूरे होने पर 11 देशों के 16 नए स्थलों को ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा दिया गया था।
जियोपार्क और विश्व धरोहर में फर्क
बहुत से लोग यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल को एक ही समझते हैं, लेकिन दोनों अलग हैं। विश्व धरोहर स्थल का दर्जा किसी स्थान के असाधारण सार्वभौमिक महत्व वाली सांस्कृतिक या प्राकृतिक विरासत के लिए दिया जाता है। भारत में ताजमहल, कुतुब मीनार, अजंता-एलोरा जैसे कई विश्व धरोहर स्थल हैं। राजस्थान के कई पहाड़ी किले भी विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।
वहीं ग्लोबल जियोपार्क एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र होता है, जिसकी भूवैज्ञानिक विरासत अंतरराष्ट्रीय महत्व की हो और जिसका प्रबंधन संरक्षण, शिक्षा और सतत विकास की समग्र सोच के साथ किया जाए। इसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी और भू-पर्यटन के जरिये उनकी आजीविका को बढ़ावा देना भी अहम हिस्सा होता है।
सिर्फ चट्टानों का संरक्षण नहीं
यूनेस्को के मानकों के अनुसार ग्लोबल जियोपार्क केवल भूवैज्ञानिक विरासत के संरक्षण तक सीमित नहीं होता। इसमें प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को साथ लेकर स्थानीय संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है। ऐसे क्षेत्र जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के खतरों को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
आंध्र प्रदेश के स्थलों के लिए भी प्रयास
इंटेक मेहरानगढ़ के अलावा देश के दूसरे भूवैज्ञानिक स्थलों को भी यह पहचान दिलाने के लिए काम कर रहा है। आंध्र प्रदेश में एर्रा मट्टी डिब्बालु यानी लाल रेत के टीलों और प्रसिद्ध बोरा गुफाओं समेत अन्य अहम भूवैज्ञानिक स्थलों को भी यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क के तहत मान्यता दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
मेहरानगढ़: इतिहास की एक झलक
मेहरानगढ़ किले की नींव 15वीं शताब्दी में राठौड़ वंश के शासक राव जोधा ने रखी थी, जिनके नाम पर जोधपुर शहर बसा। करीब 400 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना यह किला भारत के सबसे विशाल और भव्य किलों में गिना जाता है। इसकी ऊंची और मजबूत दीवारें, बारीक नक्काशी वाले महल, खूबसूरत झरोखे और विशाल प्रांगण पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। किले के भीतर स्थित संग्रहालय में राजसी वस्तुएं, अस्त्र-शस्त्र, पालकियां, चित्रकलाएं और वस्त्रों का शानदार संग्रह है।
किले से नीचे बसे जोधपुर शहर का नजारा बेहद खूबसूरत दिखता है, जहां बड़ी संख्या में नीले रंग के मकान हैं। इसी वजह से जोधपुर को 'ब्लू सिटी' यानी नीला शहर भी कहा जाता है। मेहरानगढ़ किला कई चर्चित फिल्मों की शूटिंग का गवाह भी रहा है।
राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क
मेहरानगढ़ किले के पास स्थित राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क उसी चट्टानी पहाड़ी क्षेत्र में विकसित किया गया है। यहां रेगिस्तानी और चट्टानी इलाकों में पाई जाने वाली देसी वनस्पतियों को फिर से बसाया गया है। पार्क में पैदल घूमने के रास्ते बनाए गए हैं, जहां पर्यटक ज्वालामुखीय चट्टानों की संरचना को करीब से देख सकते हैं। यह पार्क प्रकृति प्रेमियों और भूविज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए खास आकर्षण है।
भू-पर्यटन से क्या फायदा
भू-पर्यटन यानी जियो टूरिज्म पर्यटन का वह रूप है, जिसमें लोग किसी स्थान की भूवैज्ञानिक विशेषताओं जैसे चट्टानों, गुफाओं, पहाड़ों, ज्वालामुखियों और जीवाश्मों को देखने और समझने के लिए जाते हैं। दुनिया के कई देशों में जियोपार्क पर्यटन का बड़ा केंद्र बन चुके हैं।
अगर मेहरानगढ़ को यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा मिलता है, तो इसके कई फायदे हो सकते हैं:
अंतरराष्ट्रीय पहचान: जोधपुर की ऐतिहासिक पहचान के साथ उसकी भूवैज्ञानिक विरासत को भी वैश्विक मान्यता मिलेगी।
पर्यटन में बढ़ोतरी: देश-विदेश से भूविज्ञान में रुचि रखने वाले पर्यटक, शोधार्थी और छात्र यहां आएंगे।
स्थानीय रोजगार: गाइड, होटल, परिवहन और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर बनेंगे।
शिक्षा और शोध: विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों के लिए यह जीवंत प्रयोगशाला की तरह काम करेगा।
संरक्षण को बढ़ावा: भूवैज्ञानिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
भारत में भू-विरासत की अपार संपदा
भारत भूवैज्ञानिक दृष्टि से बेहद समृद्ध देश है। हिमालय दुनिया की सबसे नई पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जबकि अरावली सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाती है। दक्कन का पठार विशाल ज्वालामुखीय लावा प्रवाह से बना है। देश के अलग-अलग हिस्सों में जीवाश्म, गुफाएं, प्राकृतिक चट्टानी संरचनाएं और अनोखी भू-आकृतियां मौजूद हैं। इसके बावजूद अब तक भारत का कोई स्थल यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क नेटवर्क में शामिल नहीं है। मेहरानगढ़ की यह पहल इस दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।
यूपी के पर्यटकों के लिए भी खास
कानपुर और उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक हर साल राजस्थान घूमने जाते हैं। अक्टूबर से मार्च तक का समय राजस्थान घूमने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि इस दौरान मौसम सुहावना रहता है। जोधपुर रेल और हवाई मार्ग से देश के बड़े शहरों से जुड़ा है। मेहरानगढ़ किला, उम्मेद भवन पैलेस, जसवंत थड़ा और मंडोर उद्यान जैसे स्थल जोधपुर यात्रा को यादगार बना देते हैं।
निष्कर्ष
मेहरानगढ़ किला इतिहास और भूविज्ञान का अनोखा संगम है। एक ओर इसकी दीवारों में राजपूत शौर्य की गाथाएं दर्ज हैं, तो दूसरी ओर इसकी नींव में धरती के करोड़ों साल पुराने इतिहास के निशान मौजूद हैं। अगर इसे यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा मिलता है, तो यह न केवल राजस्थान, बल्कि पूरे भारत के लिए गौरव की बात होगी।
पर्यटन, विरासत और संस्कृति से जुड़ी हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
करोड़ों साल पुरानी चट्टान पर खड़ा मेहरानगढ़ किला बनेगा देश का पहला यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क? तैयारी तेज, 6 अक्टूबर को जागरूकता अभियान
राजस्थान की शान और जोधपुर की पहचान मेहरानगढ़ किला अब एक नई अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि की ओर बढ़ रहा है। इस ऐतिहासिक किले को देश का पहला यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क बनाने की तैयारी तेज हो गई है। खास बात यह है कि यह किला जितना ऐतिहासिक है, उससे कहीं ज्यादा पुरानी है वह पहाड़ी, जिस पर यह खड़ा है। करीब साढ़े पांच सौ साल पुराना यह किला लगभग 75 करोड़ वर्ष पुरानी चट्टान पर बना है। अगर यह प्रयास सफल होता है, तो भारत भी उन देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनके पास यूनेस्को से मान्यता प्राप्त ग्लोबल जियोपार्क है। इससे देश में भू-पर्यटन यानी जियो टूरिज्म को भी नई दिशा मिल सकती है।
कौन कर रहा है यह काम
मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट और भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक धरोहर न्यास यानी इंटेक मिलकर इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रहे हैं। परियोजना से जुड़ा अकादमिक और शोध कार्य पूरा हो चुका है और अब इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आगे बढ़ाने की तैयारी है। इसके लिए जन-जागरूकता बढ़ाने और स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
इंटेक देश में कला, संस्कृति और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के लिए काम करने वाली प्रमुख संस्था है। भूवैज्ञानिक विरासत के संरक्षण की दिशा में भी यह संस्था लंबे समय से सक्रिय है।
किला 565 साल पुराना, चट्टान 75 करोड़ साल
ऐतिहासिक रूप से मेहरानगढ़ किला करीब 565 साल पुराना है, लेकिन जिस पहाड़ी पर यह बना है, उसकी भूवैज्ञानिक आयु लगभग 75 करोड़ वर्ष बताई जाती है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी जीएसआई ने भी इस क्षेत्र को आधिकारिक रूप से चिह्नित किया है। यहां की अनोखी भूवैज्ञानिक संरचना किले के भीतर और आसपास साफ दिखाई देती है।
इस समय अवधि को समझना आसान नहीं है। 75 करोड़ साल पहले धरती पर न डायनासोर थे, न पेड़-पौधे और न ही जमीन पर कोई बड़ा जीव। उस समय जीवन मुख्य रूप से समुद्र में सूक्ष्म रूपों में मौजूद था। यानी मेहरानगढ़ की चट्टानें धरती के उस बेहद प्राचीन दौर की गवाह हैं।
मालानी आग्नेय सुइट: ज्वालामुखी का प्रमाण
विशेषज्ञों के अनुसार यहां पाया जाने वाला मालानी आग्नेय सुइट भारतीय उपमहाद्वीप में प्रीकैम्ब्रियन युग के अंतिम दौर की अम्लीय ज्वालामुखीय गतिविधि का महत्वपूर्ण प्रमाण है। बड़े पैमाने पर हुए ज्वालामुखीय विस्फोटों से इन आग्नेय चट्टानों का निर्माण हुआ था। इन खास चट्टानों को वेल्डेड टफ भी कहा जाता है।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने मेहरानगढ़ की चट्टानों वाले क्षेत्र में दो राष्ट्रीय स्तर के भूवैज्ञानिक स्मारक भी स्थापित किए हैं। यही विशेषताएं मेहरानगढ़ को ग्लोबल जियोपार्क के लिए मजबूत दावेदार बनाती हैं।
आग्नेय चट्टान क्या होती है: जब धरती के भीतर का पिघला हुआ पदार्थ यानी मैग्मा ज्वालामुखी के जरिये बाहर आता है या भीतर ही ठंडा होकर जम जाता है, तो उससे बनी चट्टानों को आग्नेय चट्टान कहा जाता है। ग्रेनाइट और बेसाल्ट इसके आम उदाहरण हैं। वेल्डेड टफ ऐसी चट्टान है, जो ज्वालामुखी विस्फोट से निकली गर्म राख और कणों के आपस में जुड़कर ठोस हो जाने से बनती है।
6 अक्टूबर को भू-विविधता दिवस पर विशेष अभियान
मेहरानगढ़ केवल ऐतिहासिक धरोहर ही नहीं, बल्कि भू-विरासत, प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक विविधता का भी अहम केंद्र है। इसी पहाड़ी क्षेत्र में स्थित राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क अपनी प्राकृतिक और जैविक विविधता के लिए जाना जाता है।
यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क के दावे को मजबूत करने के लिए 6 अक्टूबर को भू-विविधता दिवस के मौके पर विशेष जन-जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, जिसमें भारत सरकार, राजस्थान सरकार और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी की योजना है। परियोजना से जुड़े प्रतिनिधि अंतरराष्ट्रीय मानकों को समझने के लिए यूनेस्को हाउस में आयोजित एक कार्यशाला में भी हिस्सा ले चुके हैं।
दुनिया में 241 जियोपार्क, भारत में एक भी नहीं
यूनेस्को भूवैज्ञानिक महत्व वाले क्षेत्रों को उनकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ संरक्षित करने के उद्देश्य से ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा देता है। इसके लिए संबंधित क्षेत्र की ओर से तय प्रक्रिया के तहत आवेदन किया जाता है, जिसके बाद यूनेस्को उसका मूल्यांकन करता है।
वर्तमान में दुनिया के 51 देशों में 241 ग्लोबल जियोपार्क हैं, लेकिन भारत में अभी तक किसी भी स्थल को यह दर्जा नहीं मिला है। यूनेस्को ने 2015 में इंटरनेशनल जियोसाइंस एंड जियोपार्क प्रोग्राम के तहत इस वैश्विक पहल की शुरुआत की थी। 2025 में इस कार्यक्रम के 10 साल पूरे होने पर 11 देशों के 16 नए स्थलों को ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा दिया गया था।
जियोपार्क और विश्व धरोहर में फर्क
बहुत से लोग यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल को एक ही समझते हैं, लेकिन दोनों अलग हैं। विश्व धरोहर स्थल का दर्जा किसी स्थान के असाधारण सार्वभौमिक महत्व वाली सांस्कृतिक या प्राकृतिक विरासत के लिए दिया जाता है। भारत में ताजमहल, कुतुब मीनार, अजंता-एलोरा जैसे कई विश्व धरोहर स्थल हैं। राजस्थान के कई पहाड़ी किले भी विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।
वहीं ग्लोबल जियोपार्क एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र होता है, जिसकी भूवैज्ञानिक विरासत अंतरराष्ट्रीय महत्व की हो और जिसका प्रबंधन संरक्षण, शिक्षा और सतत विकास की समग्र सोच के साथ किया जाए। इसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी और भू-पर्यटन के जरिये उनकी आजीविका को बढ़ावा देना भी अहम हिस्सा होता है।
सिर्फ चट्टानों का संरक्षण नहीं
यूनेस्को के मानकों के अनुसार ग्लोबल जियोपार्क केवल भूवैज्ञानिक विरासत के संरक्षण तक सीमित नहीं होता। इसमें प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को साथ लेकर स्थानीय संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है। ऐसे क्षेत्र जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के खतरों को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
आंध्र प्रदेश के स्थलों के लिए भी प्रयास
इंटेक मेहरानगढ़ के अलावा देश के दूसरे भूवैज्ञानिक स्थलों को भी यह पहचान दिलाने के लिए काम कर रहा है। आंध्र प्रदेश में एर्रा मट्टी डिब्बालु यानी लाल रेत के टीलों और प्रसिद्ध बोरा गुफाओं समेत अन्य अहम भूवैज्ञानिक स्थलों को भी यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क के तहत मान्यता दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
मेहरानगढ़: इतिहास की एक झलक
मेहरानगढ़ किले की नींव 15वीं शताब्दी में राठौड़ वंश के शासक राव जोधा ने रखी थी, जिनके नाम पर जोधपुर शहर बसा। करीब 400 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना यह किला भारत के सबसे विशाल और भव्य किलों में गिना जाता है। इसकी ऊंची और मजबूत दीवारें, बारीक नक्काशी वाले महल, खूबसूरत झरोखे और विशाल प्रांगण पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। किले के भीतर स्थित संग्रहालय में राजसी वस्तुएं, अस्त्र-शस्त्र, पालकियां, चित्रकलाएं और वस्त्रों का शानदार संग्रह है।
किले से नीचे बसे जोधपुर शहर का नजारा बेहद खूबसूरत दिखता है, जहां बड़ी संख्या में नीले रंग के मकान हैं। इसी वजह से जोधपुर को 'ब्लू सिटी' यानी नीला शहर भी कहा जाता है। मेहरानगढ़ किला कई चर्चित फिल्मों की शूटिंग का गवाह भी रहा है।
राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क
मेहरानगढ़ किले के पास स्थित राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क उसी चट्टानी पहाड़ी क्षेत्र में विकसित किया गया है। यहां रेगिस्तानी और चट्टानी इलाकों में पाई जाने वाली देसी वनस्पतियों को फिर से बसाया गया है। पार्क में पैदल घूमने के रास्ते बनाए गए हैं, जहां पर्यटक ज्वालामुखीय चट्टानों की संरचना को करीब से देख सकते हैं। यह पार्क प्रकृति प्रेमियों और भूविज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए खास आकर्षण है।
भू-पर्यटन से क्या फायदा
भू-पर्यटन यानी जियो टूरिज्म पर्यटन का वह रूप है, जिसमें लोग किसी स्थान की भूवैज्ञानिक विशेषताओं जैसे चट्टानों, गुफाओं, पहाड़ों, ज्वालामुखियों और जीवाश्मों को देखने और समझने के लिए जाते हैं। दुनिया के कई देशों में जियोपार्क पर्यटन का बड़ा केंद्र बन चुके हैं।
अगर मेहरानगढ़ को यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा मिलता है, तो इसके कई फायदे हो सकते हैं:
अंतरराष्ट्रीय पहचान: जोधपुर की ऐतिहासिक पहचान के साथ उसकी भूवैज्ञानिक विरासत को भी वैश्विक मान्यता मिलेगी।
पर्यटन में बढ़ोतरी: देश-विदेश से भूविज्ञान में रुचि रखने वाले पर्यटक, शोधार्थी और छात्र यहां आएंगे।
स्थानीय रोजगार: गाइड, होटल, परिवहन और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर बनेंगे।
शिक्षा और शोध: विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों के लिए यह जीवंत प्रयोगशाला की तरह काम करेगा।
संरक्षण को बढ़ावा: भूवैज्ञानिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
भारत में भू-विरासत की अपार संपदा
भारत भूवैज्ञानिक दृष्टि से बेहद समृद्ध देश है। हिमालय दुनिया की सबसे नई पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जबकि अरावली सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाती है। दक्कन का पठार विशाल ज्वालामुखीय लावा प्रवाह से बना है। देश के अलग-अलग हिस्सों में जीवाश्म, गुफाएं, प्राकृतिक चट्टानी संरचनाएं और अनोखी भू-आकृतियां मौजूद हैं। इसके बावजूद अब तक भारत का कोई स्थल यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क नेटवर्क में शामिल नहीं है। मेहरानगढ़ की यह पहल इस दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।
यूपी के पर्यटकों के लिए भी खास
कानपुर और उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक हर साल राजस्थान घूमने जाते हैं। अक्टूबर से मार्च तक का समय राजस्थान घूमने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि इस दौरान मौसम सुहावना रहता है। जोधपुर रेल और हवाई मार्ग से देश के बड़े शहरों से जुड़ा है। मेहरानगढ़ किला, उम्मेद भवन पैलेस, जसवंत थड़ा और मंडोर उद्यान जैसे स्थल जोधपुर यात्रा को यादगार बना देते हैं।
निष्कर्ष
मेहरानगढ़ किला इतिहास और भूविज्ञान का अनोखा संगम है। एक ओर इसकी दीवारों में राजपूत शौर्य की गाथाएं दर्ज हैं, तो दूसरी ओर इसकी नींव में धरती के करोड़ों साल पुराने इतिहास के निशान मौजूद हैं। अगर इसे यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा मिलता है, तो यह न केवल राजस्थान, बल्कि पूरे भारत के लिए गौरव की बात होगी।
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