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कान्हा में एक और बाघिन की मौत, कैनाइन डिस्टेंपर से इस साल 8वीं

Another tigress dies of canine distemper in Kanha, eighth CDV death this year

Kanpur Live News Desk ·

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कान्हा में एक और बाघिन की मौत, कैनाइन डिस्टेंपर से इस साल 8वीं
मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध कान्हा टाइगर रिजर्व से एक बार फिर चिंताजनक खबर आई है। रिजर्व की मुक्की रेंज में करीब तीन साल की एक बाघिन की इलाज के दौरान मौत हो गई। बताया जा रहा है कि बाघिन कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) से संक्रमित थी। इसके साथ ही इस साल कान्हा में सीडीवी से मरने वाले बाघों की संख्या आठ हो गई है। यह करीब तीन महीने बाद सीडीवी से हुई पहली नई मौत है। लगातार हो रही इन मौतों ने वन्यजीव विशेषज्ञों और वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। कैसे मिली थी बाघिन वन विभाग के अनुसार यह बाघिन 26 अगस्त को कोर और बफर क्षेत्र की सीमा के पास अकेली और बेहद कमजोर हालत में मिली थी। उसकी हालत देखकर वन अमले ने तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों और वन्यजीव चिकित्सकों को सूचना दी। अगले दिन यानी 27 अगस्त को उसे मुक्की स्थित उपचार केंद्र में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की टीम लगातार उसका इलाज कर रही थी। करीब छह हफ्ते के इलाज के बावजूद बाघिन को बचाया नहीं जा सका। बाहर से आई थी बाघिन कान्हा टाइगर रिजर्व के उप संचालक पी.के. वर्मा ने बाघिन की मौत की पुष्टि की। अधिकारियों के अनुसार यह बाघिन कान्हा की स्थायी निवासी नहीं थी, बल्कि किसी दूसरे इलाके से भटककर यहां पहुंची थी। युवा बाघ अक्सर अपना नया इलाका तलाशने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं। इसी दौरान वे कई बार गांवों के आसपास भी पहुंच जाते हैं, जहां उनके संक्रमित जानवरों के संपर्क में आने का खतरा बढ़ जाता है। पोस्टमार्टम और जांच बाघिन के शव का पोस्टमार्टम राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के तय प्रोटोकॉल के अनुसार किया गया। जांच के लिए नमूने जबलपुर की प्रयोगशाला भेजे गए हैं। मौत के सटीक कारण की अंतिम पुष्टि प्रयोगशाला की रिपोर्ट आने के बाद होगी। पोस्टमार्टम के बाद नियमानुसार अधिकारियों की मौजूदगी में बाघिन का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस साल अब तक की मौतें कान्हा में इस साल सीडीवी से बाघों की मौत का सिलसिला अप्रैल में शुरू हुआ था। अप्रैल: सरही रेंज में अमाही बाघिन और उसके चार शावकों की 21, 23, 25 और 29 अप्रैल को अलग-अलग दिन मौत हुई। 19 मई: मुक्की रेंज में करीब पांच साल के एक बाघ की मौत। 23 जून: मुक्की रेंज में करीब तीन साल के एक बाघ की मौत। अक्टूबर: अब मुक्की रेंज में तीन साल की बाघिन की मौत। इस तरह कुछ ही महीनों में आठ बाघों का इस वायरस से जान गंवाना बाघ संरक्षण के लिए गंभीर चेतावनी है। क्या है कैनाइन डिस्टेंपर वायरस कैनाइन डिस्टेंपर वायरस मुख्य रूप से कुत्तों में पाया जाने वाला एक संक्रामक वायरस है। यह वायरस खसरा फैलाने वाले वायरस के परिवार से जुड़ा है। कुत्तों के अलावा यह भेड़िये, लोमड़ी, सियार और बाघ-तेंदुए जैसे बड़ी बिल्ली प्रजाति के जानवरों को भी संक्रमित कर सकता है। बाघों में संक्रमण के लक्षण: कमजोरी और सुस्ती भूख न लगना सांस से जुड़ी परेशानी चलने-फिरने में असंतुलन इंसानों से डर खत्म हो जाना और असामान्य व्यवहार गंभीर मामलों में दौरे पड़ना वायरस तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है, इसलिए संक्रमित बाघ कई बार अपना स्वाभाविक व्यवहार भूल जाते हैं और गांवों या सड़कों के पास दिखने लगते हैं। आवारा कुत्तों से फैलता है खतरा विशेषज्ञ मानते हैं कि जंगलों के आसपास के गांवों में रहने वाले आवारा और बिना टीकाकरण वाले कुत्ते इस वायरस का सबसे बड़ा स्रोत हैं। जब बाघ या तेंदुए ऐसे कुत्तों का शिकार करते हैं या उनके संपर्क में आते हैं, तो वायरस उनमें पहुंच जाता है। जंगल के किनारे बढ़ती इंसानी बस्तियां और पालतू पशुओं की संख्या इस खतरे को और बढ़ाती हैं। यह मामला एक बार फिर "वन हेल्थ" की सोच की अहमियत बताता है, जिसके तहत इंसान, पालतू पशु और वन्यजीवों की सेहत को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। बचाव के लिए क्या जरूरी वन्यजीव विशेषज्ञ इस खतरे से निपटने के लिए कई उपाय सुझाते रहे हैं: कुत्तों का टीकाकरण: टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों में कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण। आवारा कुत्तों पर नियंत्रण: नसबंदी कार्यक्रम के जरिये आवारा कुत्तों की संख्या पर लगाम। निगरानी: बाघों और दूसरे मांसाहारी जानवरों के स्वास्थ्य पर लगातार नजर और बीमार जानवरों की जल्द पहचान। जांच: मृत जानवरों के नमूनों की नियमित जांच, ताकि संक्रमण के फैलाव का पता चल सके। जागरूकता: ग्रामीणों को पालतू कुत्तों को जंगल में न छोड़ने और टीकाकरण के लिए जागरूक करना। भारत में बाघ संरक्षण की चुनौती भारत दुनिया में सबसे ज्यादा बाघों वाला देश है। प्रोजेक्ट टाइगर के तहत दशकों की मेहनत से बाघों की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी हुई है। मध्य प्रदेश को "टाइगर स्टेट" के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां देश में सबसे ज्यादा बाघ पाए जाते हैं। कान्हा, बांधवगढ़, पेंच और सतपुड़ा जैसे टाइगर रिजर्व पूरी दुनिया में मशहूर हैं। लेकिन शिकार, आवास के सिकुड़ने और इंसान-वन्यजीव संघर्ष के साथ अब बीमारियां भी बड़ी चुनौती बनकर उभर रही हैं। सीडीवी जैसा वायरस अगर किसी इलाके में तेजी से फैले, तो बाघों की स्थानीय आबादी को भारी नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर तब जब छोटे शावक इसकी चपेट में आएं। उत्तर प्रदेश के लिए भी सबक उत्तर प्रदेश में भी दुधवा, पीलीभीत, अमानगढ़ और रानीपुर जैसे टाइगर रिजर्व हैं, जिनके आसपास बड़ी ग्रामीण आबादी रहती है। कान्हा की घटनाएं यूपी के वन विभाग के लिए भी सतर्क रहने का संकेत हैं। जंगलों से सटे गांवों में कुत्तों के टीकाकरण और बीमार वन्यजीवों की निगरानी पर ध्यान देना जरूरी है। निष्कर्ष कान्हा में एक और बाघिन की मौत ने यह साफ कर दिया है कि कैनाइन डिस्टेंपर वायरस बाघ संरक्षण के लिए एक गंभीर खतरा बन चुका है। इस साल आठ बाघों की मौत से सबक लेते हुए जंगल के आसपास कुत्तों के टीकाकरण, निगरानी और जागरूकता पर तेजी से काम करने की जरूरत है। बाघिन की मौत के सटीक कारण की अंतिम पुष्टि प्रयोगशाला रिपोर्ट से होगी, लेकिन यह घटना पहले ही एक बड़ी चेतावनी दे चुकी है। पर्यावरण, वन्यजीव और प्रकृति से जुड़ी हर अहम खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।

कान्हा में एक और बाघिन की मौत, कैनाइन डिस्टेंपर से इस साल 8वीं

मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध कान्हा टाइगर रिजर्व से एक बार फिर चिंताजनक खबर आई है। रिजर्व की मुक्की रेंज में करीब तीन साल की एक बाघिन की इलाज के दौरान मौत हो गई। बताया जा रहा है कि बाघिन कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) से संक्रमित थी। इसके साथ ही इस साल कान्हा में सीडीवी से मरने वाले बाघों की संख्या आठ हो गई है। यह करीब तीन महीने बाद सीडीवी से हुई पहली नई मौत है। लगातार हो रही इन मौतों ने वन्यजीव विशेषज्ञों और वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। कैसे मिली थी बाघिन वन विभाग के अनुसार यह बाघिन 26 अगस्त को कोर और बफर क्षेत्र की सीमा के पास अकेली और बेहद कमजोर हालत में मिली थी। उसकी हालत देखकर वन अमले ने तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों और वन्यजीव चिकित्सकों को सूचना दी। अगले दिन यानी 27 अगस्त को उसे मुक्की स्थित उपचार केंद्र में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की टीम लगातार उसका इलाज कर रही थी। करीब छह हफ्ते के इलाज के बावजूद बाघिन को बचाया नहीं जा सका। बाहर से आई थी बाघिन कान्हा टाइगर रिजर्व के उप संचालक पी.के. वर्मा ने बाघिन की मौत की पुष्टि की। अधिकारियों के अनुसार यह बाघिन कान्हा की स्थायी निवासी नहीं थी, बल्कि किसी दूसरे इलाके से भटककर यहां पहुंची थी। युवा बाघ अक्सर अपना नया इलाका तलाशने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं। इसी दौरान वे कई बार गांवों के आसपास भी पहुंच जाते हैं, जहां उनके संक्रमित जानवरों के संपर्क में आने का खतरा बढ़ जाता है। पोस्टमार्टम और जांच बाघिन के शव का पोस्टमार्टम राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के तय प्रोटोकॉल के अनुसार किया गया। जांच के लिए नमूने जबलपुर की प्रयोगशाला भेजे गए हैं। मौत के सटीक कारण की अंतिम पुष्टि प्रयोगशाला की रिपोर्ट आने के बाद होगी। पोस्टमार्टम के बाद नियमानुसार अधिकारियों की मौजूदगी में बाघिन का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस साल अब तक की मौतें कान्हा में इस साल सीडीवी से बाघों की मौत का सिलसिला अप्रैल में शुरू हुआ था। अप्रैल: सरही रेंज में अमाही बाघिन और उसके चार शावकों की 21, 23, 25 और 29 अप्रैल को अलग-अलग दिन मौत हुई। 19 मई: मुक्की रेंज में करीब पांच साल के एक बाघ की मौत। 23 जून: मुक्की रेंज में करीब तीन साल के एक बाघ की मौत। अक्टूबर: अब मुक्की रेंज में तीन साल की बाघिन की मौत। इस तरह कुछ ही महीनों में आठ बाघों का इस वायरस से जान गंवाना बाघ संरक्षण के लिए गंभीर चेतावनी है। क्या है कैनाइन डिस्टेंपर वायरस कैनाइन डिस्टेंपर वायरस मुख्य रूप से कुत्तों में पाया जाने वाला एक संक्रामक वायरस है। यह वायरस खसरा फैलाने वाले वायरस के परिवार से जुड़ा है। कुत्तों के अलावा यह भेड़िये, लोमड़ी, सियार और बाघ-तेंदुए जैसे बड़ी बिल्ली प्रजाति के जानवरों को भी संक्रमित कर सकता है। बाघों में संक्रमण के लक्षण: कमजोरी और सुस्ती भूख न लगना सांस से जुड़ी परेशानी चलने-फिरने में असंतुलन इंसानों से डर खत्म हो जाना और असामान्य व्यवहार गंभीर मामलों में दौरे पड़ना वायरस तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है, इसलिए संक्रमित बाघ कई बार अपना स्वाभाविक व्यवहार भूल जाते हैं और गांवों या सड़कों के पास दिखने लगते हैं। आवारा कुत्तों से फैलता है खतरा विशेषज्ञ मानते हैं कि जंगलों के आसपास के गांवों में रहने वाले आवारा और बिना टीकाकरण वाले कुत्ते इस वायरस का सबसे बड़ा स्रोत हैं। जब बाघ या तेंदुए ऐसे कुत्तों का शिकार करते हैं या उनके संपर्क में आते हैं, तो वायरस उनमें पहुंच जाता है। जंगल के किनारे बढ़ती इंसानी बस्तियां और पालतू पशुओं की संख्या इस खतरे को और बढ़ाती हैं। यह मामला एक बार फिर "वन हेल्थ" की सोच की अहमियत बताता है, जिसके तहत इंसान, पालतू पशु और वन्यजीवों की सेहत को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। बचाव के लिए क्या जरूरी वन्यजीव विशेषज्ञ इस खतरे से निपटने के लिए कई उपाय सुझाते रहे हैं: कुत्तों का टीकाकरण: टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों में कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण। आवारा कुत्तों पर नियंत्रण: नसबंदी कार्यक्रम के जरिये आवारा कुत्तों की संख्या पर लगाम। निगरानी: बाघों और दूसरे मांसाहारी जानवरों के स्वास्थ्य पर लगातार नजर और बीमार जानवरों की जल्द पहचान। जांच: मृत जानवरों के नमूनों की नियमित जांच, ताकि संक्रमण के फैलाव का पता चल सके। जागरूकता: ग्रामीणों को पालतू कुत्तों को जंगल में न छोड़ने और टीकाकरण के लिए जागरूक करना। भारत में बाघ संरक्षण की चुनौती भारत दुनिया में सबसे ज्यादा बाघों वाला देश है। प्रोजेक्ट टाइगर के तहत दशकों की मेहनत से बाघों की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी हुई है। मध्य प्रदेश को "टाइगर स्टेट" के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां देश में सबसे ज्यादा बाघ पाए जाते हैं। कान्हा, बांधवगढ़, पेंच और सतपुड़ा जैसे टाइगर रिजर्व पूरी दुनिया में मशहूर हैं। लेकिन शिकार, आवास के सिकुड़ने और इंसान-वन्यजीव संघर्ष के साथ अब बीमारियां भी बड़ी चुनौती बनकर उभर रही हैं। सीडीवी जैसा वायरस अगर किसी इलाके में तेजी से फैले, तो बाघों की स्थानीय आबादी को भारी नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर तब जब छोटे शावक इसकी चपेट में आएं। उत्तर प्रदेश के लिए भी सबक उत्तर प्रदेश में भी दुधवा, पीलीभीत, अमानगढ़ और रानीपुर जैसे टाइगर रिजर्व हैं, जिनके आसपास बड़ी ग्रामीण आबादी रहती है। कान्हा की घटनाएं यूपी के वन विभाग के लिए भी सतर्क रहने का संकेत हैं। जंगलों से सटे गांवों में कुत्तों के टीकाकरण और बीमार वन्यजीवों की निगरानी पर ध्यान देना जरूरी है। निष्कर्ष कान्हा में एक और बाघिन की मौत ने यह साफ कर दिया है कि कैनाइन डिस्टेंपर वायरस बाघ संरक्षण के लिए एक गंभीर खतरा बन चुका है। इस साल आठ बाघों की मौत से सबक लेते हुए जंगल के आसपास कुत्तों के टीकाकरण, निगरानी और जागरूकता पर तेजी से काम करने की जरूरत है। बाघिन की मौत के सटीक कारण की अंतिम पुष्टि प्रयोगशाला रिपोर्ट से होगी, लेकिन यह घटना पहले ही एक बड़ी चेतावनी दे चुकी है। पर्यावरण, वन्यजीव और 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