सेना को मिला स्वदेशी 'नागास्त्र-2' एंटी-टैंक ड्रोन, 50 किमी तक दुश्मन के टैंक पर करेगा वार
Indian Army receives indigenous Nagastra-2 anti-tank loitering munition with 50 km range
Kanpur Live News Desk ·

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत भारतीय सेना की ताकत में एक और स्वदेशी हथियार जुड़ गया है। नागपुर की कंपनी सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (एसडीएएल) ने भारतीय सेना को "नागास्त्र-2" एंटी-टैंक लोइटरिंग म्यूनिशन सौंपा है। यह एक ऐसा ड्रोन है, जिसे सैनिक अपने साथ ले जा सकते हैं और जो दुश्मन के टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को सटीक निशाना बनाकर नष्ट कर सकता है। इसे "कामिकाजे" ड्रोन भी कहा जाता है, क्योंकि यह खुद लक्ष्य से टकराकर उसे तबाह करता है।
नागास्त्र-2 की खूबियां
प्रकार: सैनिकों द्वारा ले जाया जा सकने वाला (मैन-पोर्टेबल) एंटी-टैंक लोइटरिंग म्यूनिशन
वारहेड: 4 किलो का टैंडम शेप्ड-चार्ज वारहेड
कवच भेदन क्षमता: रिपोर्टों के अनुसार 650 मिलीमीटर तक के रोल्ड होमोजीनियस आर्मर (आरएचए) को भेदने में सक्षम
मारक दूरी (रिकवर एंड रीयूज मोड): 25 किलोमीटर
मारक दूरी (फायर एंड फॉरगेट मोड): 50 किलोमीटर
परीक्षण: अगस्त 2026 में राजस्थान की महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में सफल तकनीकी परीक्षण
लोइटरिंग म्यूनिशन क्या है
लोइटरिंग म्यूनिशन एक खास तरह का ड्रोन होता है, जो लक्ष्य वाले इलाके के ऊपर कुछ समय तक मंडराता रहता है। इस दौरान इसका ऑपरेटर कैमरे के जरिये लक्ष्य की पहचान करता है। सही लक्ष्य मिलते ही ड्रोन तेजी से नीचे आकर उससे टकराता है और उसमें लगा विस्फोटक लक्ष्य को नष्ट कर देता है। यह एक तरह से ड्रोन और मिसाइल का मिला-जुला रूप है।
दो मोड, ज्यादा लचीलापन
नागास्त्र-2 की खास बात इसके दो मोड हैं:
रिकवर एंड रीयूज मोड: अगर ऑपरेटर को सही लक्ष्य नहीं मिलता या मिशन रद्द करना पड़ता है, तो ड्रोन को वापस बुलाकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इस मोड में इसकी दूरी 25 किलोमीटर है।
फायर एंड फॉरगेट मोड: इसमें ड्रोन एक बार छोड़े जाने के बाद खुद लक्ष्य तक जाता है। इस मोड में यह 50 किलोमीटर तक मार कर सकता है।
वापस बुलाने की क्षमता से महंगे हथियार की बर्बादी नहीं होती और गलत लक्ष्य पर हमले का खतरा भी कम होता है।
टैंडम वारहेड क्यों खास
आधुनिक टैंकों पर विस्फोटक प्रतिक्रियाशील कवच (ईआरए) लगा होता है, जो सामान्य हथियारों के असर को कम कर देता है। टैंडम वारहेड में दो चार्ज होते हैं। पहला चार्ज इस अतिरिक्त कवच को तोड़ता है और दूसरा चार्ज टैंक के मुख्य कवच को भेदकर अंदर तक नुकसान पहुंचाता है। इसलिए टैंडम वारहेड वाले हथियार आधुनिक टैंकों के खिलाफ ज्यादा कारगर माने जाते हैं।
नागास्त्र-1 से आगे
इससे पहले सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड सेना को नागास्त्र-1 लोइटरिंग म्यूनिशन की आपूर्ति कर चुकी है। इसी महीने कंपनी ने सेना को 450 नागास्त्र-1आर लोइटरिंग म्यूनिशन सौंपे, जिसे ऐसे हथियारों की अब तक की सबसे बड़ी आपूर्ति बताया गया। नागास्त्र-2 को खास तौर पर टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है, जिससे सेना की एंटी-टैंक क्षमता और मजबूत होगी।
आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका
हाल के वर्षों में दुनिया के कई संघर्षों में ड्रोन ने युद्ध का चेहरा बदल दिया है। सस्ते ड्रोन महंगे टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को नष्ट करने में कामयाब रहे हैं। इससे साबित हुआ है कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन की भूमिका बेहद अहम होगी। भारतीय सेना ने भी इस बदलाव को समझते हुए ड्रोन क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने पर जोर दिया है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में थल सेना की नई "लैंड वॉरफेयर डॉक्ट्रिन 2026" जारी की है, जिसमें ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त प्रणालियों, साइबर युद्ध और सटीक हथियारों पर खास जोर दिया गया है।
आत्मनिर्भर भारत की ताकत
नागास्त्र-2 का पूरी तरह भारत में विकसित और निर्मित होना आत्मनिर्भर भारत अभियान की बड़ी सफलता है। पहले भारत को ऐसे हथियारों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब देश की निजी कंपनियां भी आधुनिक हथियार बना रही हैं। इससे:
विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
युद्ध के समय आपूर्ति में रुकावट का खतरा कम होता है।
देश में उच्च तकनीक वाले रोजगार पैदा होते हैं।
भविष्य में ऐसे हथियारों के निर्यात की संभावना बनती है।
निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका
रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। सरकार ने रक्षा उत्पादन के नियम आसान किए हैं, कई हथियारों के आयात पर रोक लगाई है और घरेलू कंपनियों को प्राथमिकता दी जा रही है। सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस जैसी कंपनियां इसी नीति का फायदा उठाकर आधुनिक हथियार बना रही हैं।
उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर
उत्तर प्रदेश में भी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है, जिसमें कानपुर एक अहम नोड है। कानपुर में पहले से आयुध निर्माणियां और रक्षा से जुड़ी कई इकाइयां हैं। ड्रोन और आधुनिक हथियारों के बढ़ते उत्पादन से यहां के उद्योगों और युवाओं के लिए भी नए अवसर खुल सकते हैं। आईआईटी कानपुर भी ड्रोन तकनीक के शोध में अग्रणी संस्थानों में शामिल है।
सैनिकों के लिए आसान इस्तेमाल
मैन-पोर्टेबल होने का मतलब है कि सैनिक इसे अपने साथ पीठ पर लादकर ले जा सकते हैं। इसके लिए किसी बड़े लॉन्चर या वाहन की जरूरत नहीं होती। पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तान और जंगल जैसी कठिन जगहों पर तैनात सैनिक इसे आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं। छोटे दस्ते भी इसकी मदद से दुश्मन के बड़े बख्तरबंद वाहनों को रोक सकते हैं। इससे सेना की जमीनी ताकत और लचीलापन बढ़ता है।
सीमाओं पर बढ़ेगी ताकत
भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर दुश्मन की बख्तरबंद क्षमता को देखते हुए ऐसे एंटी-टैंक हथियार बेहद जरूरी हैं। रेगिस्तानी और मैदानी इलाकों में टैंक युद्ध की संभावना को देखते हुए नागास्त्र-2 जैसे हथियार सेना को बड़ी बढ़त दे सकते हैं।
युवाओं के लिए अवसर
ड्रोन तकनीक में करियर बनाने के इच्छुक युवाओं के लिए यह क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है। सरकार ने ड्रोन पायलट प्रशिक्षण के लिए भी कई संस्थानों को मान्यता दी है।
निष्कर्ष
नागास्त्र-2 एंटी-टैंक ड्रोन भारतीय सेना की ताकत में अहम इजाफा है। 50 किलोमीटर तक की मारक क्षमता, आधुनिक कवच भेदने वाला वारहेड और दोबारा इस्तेमाल की सुविधा इसे खास बनाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह पूरी तरह स्वदेशी है, जो रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के बढ़ते कदमों का प्रतीक है।
रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा की हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
सेना को मिला स्वदेशी 'नागास्त्र-2' एंटी-टैंक ड्रोन, 50 किमी तक दुश्मन के टैंक पर करेगा वार
आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत भारतीय सेना की ताकत में एक और स्वदेशी हथियार जुड़ गया है। नागपुर की कंपनी सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (एसडीएएल) ने भारतीय सेना को "नागास्त्र-2" एंटी-टैंक लोइटरिंग म्यूनिशन सौंपा है। यह एक ऐसा ड्रोन है, जिसे सैनिक अपने साथ ले जा सकते हैं और जो दुश्मन के टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को सटीक निशाना बनाकर नष्ट कर सकता है। इसे "कामिकाजे" ड्रोन भी कहा जाता है, क्योंकि यह खुद लक्ष्य से टकराकर उसे तबाह करता है।
नागास्त्र-2 की खूबियां
प्रकार: सैनिकों द्वारा ले जाया जा सकने वाला (मैन-पोर्टेबल) एंटी-टैंक लोइटरिंग म्यूनिशन
वारहेड: 4 किलो का टैंडम शेप्ड-चार्ज वारहेड
कवच भेदन क्षमता: रिपोर्टों के अनुसार 650 मिलीमीटर तक के रोल्ड होमोजीनियस आर्मर (आरएचए) को भेदने में सक्षम
मारक दूरी (रिकवर एंड रीयूज मोड): 25 किलोमीटर
मारक दूरी (फायर एंड फॉरगेट मोड): 50 किलोमीटर
परीक्षण: अगस्त 2026 में राजस्थान की महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में सफल तकनीकी परीक्षण
लोइटरिंग म्यूनिशन क्या है
लोइटरिंग म्यूनिशन एक खास तरह का ड्रोन होता है, जो लक्ष्य वाले इलाके के ऊपर कुछ समय तक मंडराता रहता है। इस दौरान इसका ऑपरेटर कैमरे के जरिये लक्ष्य की पहचान करता है। सही लक्ष्य मिलते ही ड्रोन तेजी से नीचे आकर उससे टकराता है और उसमें लगा विस्फोटक लक्ष्य को नष्ट कर देता है। यह एक तरह से ड्रोन और मिसाइल का मिला-जुला रूप है।
दो मोड, ज्यादा लचीलापन
नागास्त्र-2 की खास बात इसके दो मोड हैं:
रिकवर एंड रीयूज मोड: अगर ऑपरेटर को सही लक्ष्य नहीं मिलता या मिशन रद्द करना पड़ता है, तो ड्रोन को वापस बुलाकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इस मोड में इसकी दूरी 25 किलोमीटर है।
फायर एंड फॉरगेट मोड: इसमें ड्रोन एक बार छोड़े जाने के बाद खुद लक्ष्य तक जाता है। इस मोड में यह 50 किलोमीटर तक मार कर सकता है।
वापस बुलाने की क्षमता से महंगे हथियार की बर्बादी नहीं होती और गलत लक्ष्य पर हमले का खतरा भी कम होता है।
टैंडम वारहेड क्यों खास
आधुनिक टैंकों पर विस्फोटक प्रतिक्रियाशील कवच (ईआरए) लगा होता है, जो सामान्य हथियारों के असर को कम कर देता है। टैंडम वारहेड में दो चार्ज होते हैं। पहला चार्ज इस अतिरिक्त कवच को तोड़ता है और दूसरा चार्ज टैंक के मुख्य कवच को भेदकर अंदर तक नुकसान पहुंचाता है। इसलिए टैंडम वारहेड वाले हथियार आधुनिक टैंकों के खिलाफ ज्यादा कारगर माने जाते हैं।
नागास्त्र-1 से आगे
इससे पहले सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड सेना को नागास्त्र-1 लोइटरिंग म्यूनिशन की आपूर्ति कर चुकी है। इसी महीने कंपनी ने सेना को 450 नागास्त्र-1आर लोइटरिंग म्यूनिशन सौंपे, जिसे ऐसे हथियारों की अब तक की सबसे बड़ी आपूर्ति बताया गया। नागास्त्र-2 को खास तौर पर टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है, जिससे सेना की एंटी-टैंक क्षमता और मजबूत होगी।
आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका
हाल के वर्षों में दुनिया के कई संघर्षों में ड्रोन ने युद्ध का चेहरा बदल दिया है। सस्ते ड्रोन महंगे टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को नष्ट करने में कामयाब रहे हैं। इससे साबित हुआ है कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन की भूमिका बेहद अहम होगी। भारतीय सेना ने भी इस बदलाव को समझते हुए ड्रोन क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने पर जोर दिया है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में थल सेना की नई "लैंड वॉरफेयर डॉक्ट्रिन 2026" जारी की है, जिसमें ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त प्रणालियों, साइबर युद्ध और सटीक हथियारों पर खास जोर दिया गया है।
आत्मनिर्भर भारत की ताकत
नागास्त्र-2 का पूरी तरह भारत में विकसित और निर्मित होना आत्मनिर्भर भारत अभियान की बड़ी सफलता है। पहले भारत को ऐसे हथियारों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब देश की निजी कंपनियां भी आधुनिक हथियार बना रही हैं। इससे:
विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
युद्ध के समय आपूर्ति में रुकावट का खतरा कम होता है।
देश में उच्च तकनीक वाले रोजगार पैदा होते हैं।
भविष्य में ऐसे हथियारों के निर्यात की संभावना बनती है।
निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका
रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। सरकार ने रक्षा उत्पादन के नियम आसान किए हैं, कई हथियारों के आयात पर रोक लगाई है और घरेलू कंपनियों को प्राथमिकता दी जा रही है। सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस जैसी कंपनियां इसी नीति का फायदा उठाकर आधुनिक हथियार बना रही हैं।
उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर
उत्तर प्रदेश में भी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है, जिसमें कानपुर एक अहम नोड है। कानपुर में पहले से आयुध निर्माणियां और रक्षा से जुड़ी कई इकाइयां हैं। ड्रोन और आधुनिक हथियारों के बढ़ते उत्पादन से यहां के उद्योगों और युवाओं के लिए भी नए अवसर खुल सकते हैं। आईआईटी कानपुर भी ड्रोन तकनीक के शोध में अग्रणी संस्थानों में शामिल है।
सैनिकों के लिए आसान इस्तेमाल
मैन-पोर्टेबल होने का मतलब है कि सैनिक इसे अपने साथ पीठ पर लादकर ले जा सकते हैं। इसके लिए किसी बड़े लॉन्चर या वाहन की जरूरत नहीं होती। पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तान और जंगल जैसी कठिन जगहों पर तैनात सैनिक इसे आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं। छोटे दस्ते भी इसकी मदद से दुश्मन के बड़े बख्तरबंद वाहनों को रोक सकते हैं। इससे सेना की जमीनी ताकत और लचीलापन बढ़ता है।
सीमाओं पर बढ़ेगी ताकत
भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर दुश्मन की बख्तरबंद क्षमता को देखते हुए ऐसे एंटी-टैंक हथियार बेहद जरूरी हैं। रेगिस्तानी और मैदानी इलाकों में टैंक युद्ध की संभावना को देखते हुए नागास्त्र-2 जैसे हथियार सेना को बड़ी बढ़त दे सकते हैं।
युवाओं के लिए अवसर
ड्रोन तकनीक में करियर बनाने के इच्छुक युवाओं के लिए यह क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है। सरकार ने ड्रोन पायलट प्रशिक्षण के लिए भी कई संस्थानों को मान्यता दी है।
निष्कर्ष
नागास्त्र-2 एंटी-टैंक ड्रोन भारतीय सेना की ताकत में अहम इजाफा है। 50 किलोमीटर तक की मारक क्षमता, आधुनिक कवच भेदने वाला वारहेड और दोबारा इस्तेमाल की सुविधा इसे खास बनाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह पूरी तरह स्वदेशी है, जो रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के बढ़ते कदमों का प्रतीक है।
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