यूएन की चेतावनी: 1.5 डिग्री का लक्ष्य बचाना है तो 2030 तक 18% घटाना होगा उत्सर्जन
UNEP Emissions Gap Report 2026: Emissions must fall 18% by 2030 to keep 1.5°C within reach
Kanpur Live News Desk ·

जलवायु परिवर्तन को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने एक बार फिर दुनिया को चेताया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने अपनी 17वीं वार्षिक एमिशंस गैप रिपोर्ट 2026 जारी की है, जिसका शीर्षक "द पॉइंट ऑफ रिटर्न" रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2025 में दुनिया का कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 58.4 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर रहा। रिपोर्ट कहती है कि अगर पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को पहुंच में रखना है, तो उत्सर्जन में 2030 तक 18 प्रतिशत, 2035 तक 45 प्रतिशत और 2040 तक 69 प्रतिशत की कटौती करनी होगी।
रिपोर्ट के मुख्य आंकड़े
2025 में वैश्विक उत्सर्जन: 58.4 गीगाटन CO2 समतुल्य
2030 तक जरूरी कटौती: 18 प्रतिशत
2035 तक जरूरी कटौती: 45 प्रतिशत
2040 तक जरूरी कटौती: 69 प्रतिशत
रिपोर्ट का शीर्षक: "द पॉइंट ऑफ रिटर्न"
संस्करण: 17वां
एमिशंस गैप क्या है
"एमिशंस गैप" यानी उत्सर्जन का अंतर। यह वह फासला है, जो देशों के वादों और नीतियों के हिसाब से होने वाले उत्सर्जन और जलवायु लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी उत्सर्जन स्तर के बीच है। यूएनईपी हर साल यह रिपोर्ट जारी कर बताता है कि दुनिया अपने लक्ष्यों से कितनी दूर है और इस अंतर को पाटने के लिए क्या करना होगा।
पेरिस समझौता और 1.5 डिग्री का लक्ष्य
2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते में दुनिया के देशों ने तय किया था कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखा जाएगा, और इसे 1.5 डिग्री तक सीमित रखने की कोशिश होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि 1.5 डिग्री से ज्यादा तापमान बढ़ने पर गर्मी की लहरें, बाढ़, सूखा और समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी जैसे खतरे कई गुना बढ़ जाएंगे।
ग्रीनहाउस गैसें क्या हैं
ग्रीनहाउस गैसें वे गैसें हैं, जो धरती के वातावरण में गर्मी को रोककर रखती हैं। इनमें मुख्य हैं:
कार्बन डाइऑक्साइड: कोयला, पेट्रोल, डीजल और गैस जलाने से निकलती है।
मीथेन: धान की खेती, पशुपालन, कूड़े के ढेर और तेल-गैस उद्योग से।
नाइट्रस ऑक्साइड: रासायनिक खादों के इस्तेमाल से।
फ्लोरीनेटेड गैसें: एसी और फ्रिज में इस्तेमाल होने वाली कुछ गैसें।
जलवायु परिवर्तन का असर
जलवायु परिवर्तन का असर अब दुनियाभर में साफ दिखने लगा है:
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और लू की घटनाएं
अचानक भारी बारिश और बाढ़
लंबे सूखे और पानी की किल्लत
ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना
समुद्र का बढ़ता जलस्तर
फसलों की पैदावार पर असर
जंगल की आग की बढ़ती घटनाएं
भारत पर असर
भारत जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल है। बढ़ती गर्मी, अनियमित मानसून, बाढ़ और सूखे का सीधा असर खेती, पानी और लोगों की सेहत पर पड़ता है। उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में मौसम का बदलता मिजाज किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है। इस साल भी कई इलाकों में भारी बारिश और जलभराव की घटनाएं देखी गईं।
भारत के प्रयास
भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं:
2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य
सौर और पवन ऊर्जा का तेजी से विस्तार
इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की अगुवाई
मिशन लाइफ (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) अभियान
भारत का कहना है कि विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा उत्सर्जन किया है, इसलिए उन्हें उत्सर्जन घटाने और विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी मदद देने में बड़ी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
कॉप31 से पहले अहम रिपोर्ट
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब दुनिया के देश संयुक्त राष्ट्र के अगले जलवायु सम्मेलन कॉप31 की तैयारी कर रहे हैं। यह सम्मेलन तुर्किये के अंताल्या में होने जा रहा है। रिपोर्ट के आंकड़े इस सम्मेलन में होने वाली बातचीत के लिए अहम आधार बनेंगे और देशों पर अपने लक्ष्यों को और महत्वाकांक्षी बनाने का दबाव बढ़ाएंगे।
आम आदमी क्या कर सकता है
जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में हर व्यक्ति योगदान दे सकता है:
बिजली बचाएं: एलईडी बल्ब और ऊर्जा बचाने वाले उपकरण इस्तेमाल करें, बेवजह लाइट और पंखे बंद रखें।
सार्वजनिक परिवहन: छोटी दूरी के लिए पैदल, साइकिल या बस-मेट्रो का इस्तेमाल करें। कानपुर मेट्रो एक अच्छा विकल्प है।
पेड़ लगाएं: ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाएं और उनकी देखभाल करें।
पानी बचाएं: पानी की बर्बादी न करें, वर्षा जल संचयन अपनाएं।
कचरा कम करें: प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाएं, कचरे को अलग-अलग करके दें।
कूड़ा न जलाएं: कूड़ा और पराली जलाने से बचें।
सौर ऊर्जा: घर की छत पर सोलर पैनल लगवाने पर विचार करें। सरकार इसके लिए सब्सिडी भी देती है।
यूएनईपी क्या है
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) संयुक्त राष्ट्र की वह संस्था है, जो दुनियाभर में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कामों का समन्वय करती है। इसका मुख्यालय केन्या की राजधानी नैरोबी में है। यूएनईपी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर रिपोर्ट जारी करता है और देशों को नीतियां बनाने में मदद करता है। एमिशंस गैप रिपोर्ट इसकी सबसे चर्चित रिपोर्टों में से एक है, जिसका दुनियाभर के नीति निर्माता इंतजार करते हैं।
स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ती दुनिया
दुनियाभर में सौर और पवन ऊर्जा की लागत तेजी से घटी है। कई देशों में अब नई बिजली परियोजनाओं में सबसे ज्यादा हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा का है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री भी लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह रफ्तार और तेज हो, तो उत्सर्जन में बड़ी कटौती संभव है।
बच्चों को करें जागरूक
स्कूलों में बच्चों को जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण के बारे में सिखाना जरूरी है, क्योंकि आने वाले समय में सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर पड़ेगा।
निष्कर्ष
यूएनईपी की एमिशंस गैप रिपोर्ट 2026 का शीर्षक "द पॉइंट ऑफ रिटर्न" अपने आप में एक चेतावनी है। अगर दुनिया ने अभी तेजी से उत्सर्जन नहीं घटाया, तो 1.5 डिग्री का लक्ष्य हाथ से निकल सकता है। सरकारों, उद्योगों और आम लोगों, सभी को मिलकर काम करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित धरती मिल सके।
पर्यावरण और दुनिया की हर बड़ी खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
यूएन की चेतावनी: 1.5 डिग्री का लक्ष्य बचाना है तो 2030 तक 18% घटाना होगा उत्सर्जन
जलवायु परिवर्तन को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने एक बार फिर दुनिया को चेताया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने अपनी 17वीं वार्षिक एमिशंस गैप रिपोर्ट 2026 जारी की है, जिसका शीर्षक "द पॉइंट ऑफ रिटर्न" रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2025 में दुनिया का कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 58.4 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर रहा। रिपोर्ट कहती है कि अगर पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को पहुंच में रखना है, तो उत्सर्जन में 2030 तक 18 प्रतिशत, 2035 तक 45 प्रतिशत और 2040 तक 69 प्रतिशत की कटौती करनी होगी।
रिपोर्ट के मुख्य आंकड़े
2025 में वैश्विक उत्सर्जन: 58.4 गीगाटन CO2 समतुल्य
2030 तक जरूरी कटौती: 18 प्रतिशत
2035 तक जरूरी कटौती: 45 प्रतिशत
2040 तक जरूरी कटौती: 69 प्रतिशत
रिपोर्ट का शीर्षक: "द पॉइंट ऑफ रिटर्न"
संस्करण: 17वां
एमिशंस गैप क्या है
"एमिशंस गैप" यानी उत्सर्जन का अंतर। यह वह फासला है, जो देशों के वादों और नीतियों के हिसाब से होने वाले उत्सर्जन और जलवायु लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी उत्सर्जन स्तर के बीच है। यूएनईपी हर साल यह रिपोर्ट जारी कर बताता है कि दुनिया अपने लक्ष्यों से कितनी दूर है और इस अंतर को पाटने के लिए क्या करना होगा।
पेरिस समझौता और 1.5 डिग्री का लक्ष्य
2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते में दुनिया के देशों ने तय किया था कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखा जाएगा, और इसे 1.5 डिग्री तक सीमित रखने की कोशिश होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि 1.5 डिग्री से ज्यादा तापमान बढ़ने पर गर्मी की लहरें, बाढ़, सूखा और समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी जैसे खतरे कई गुना बढ़ जाएंगे।
ग्रीनहाउस गैसें क्या हैं
ग्रीनहाउस गैसें वे गैसें हैं, जो धरती के वातावरण में गर्मी को रोककर रखती हैं। इनमें मुख्य हैं:
कार्बन डाइऑक्साइड: कोयला, पेट्रोल, डीजल और गैस जलाने से निकलती है।
मीथेन: धान की खेती, पशुपालन, कूड़े के ढेर और तेल-गैस उद्योग से।
नाइट्रस ऑक्साइड: रासायनिक खादों के इस्तेमाल से।
फ्लोरीनेटेड गैसें: एसी और फ्रिज में इस्तेमाल होने वाली कुछ गैसें।
जलवायु परिवर्तन का असर
जलवायु परिवर्तन का असर अब दुनियाभर में साफ दिखने लगा है:
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और लू की घटनाएं
अचानक भारी बारिश और बाढ़
लंबे सूखे और पानी की किल्लत
ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना
समुद्र का बढ़ता जलस्तर
फसलों की पैदावार पर असर
जंगल की आग की बढ़ती घटनाएं
भारत पर असर
भारत जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल है। बढ़ती गर्मी, अनियमित मानसून, बाढ़ और सूखे का सीधा असर खेती, पानी और लोगों की सेहत पर पड़ता है। उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में मौसम का बदलता मिजाज किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है। इस साल भी कई इलाकों में भारी बारिश और जलभराव की घटनाएं देखी गईं।
भारत के प्रयास
भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं:
2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य
सौर और पवन ऊर्जा का तेजी से विस्तार
इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की अगुवाई
मिशन लाइफ (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) अभियान
भारत का कहना है कि विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा उत्सर्जन किया है, इसलिए उन्हें उत्सर्जन घटाने और विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी मदद देने में बड़ी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
कॉप31 से पहले अहम रिपोर्ट
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब दुनिया के देश संयुक्त राष्ट्र के अगले जलवायु सम्मेलन कॉप31 की तैयारी कर रहे हैं। यह सम्मेलन तुर्किये के अंताल्या में होने जा रहा है। रिपोर्ट के आंकड़े इस सम्मेलन में होने वाली बातचीत के लिए अहम आधार बनेंगे और देशों पर अपने लक्ष्यों को और महत्वाकांक्षी बनाने का दबाव बढ़ाएंगे।
आम आदमी क्या कर सकता है
जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में हर व्यक्ति योगदान दे सकता है:
बिजली बचाएं: एलईडी बल्ब और ऊर्जा बचाने वाले उपकरण इस्तेमाल करें, बेवजह लाइट और पंखे बंद रखें।
सार्वजनिक परिवहन: छोटी दूरी के लिए पैदल, साइकिल या बस-मेट्रो का इस्तेमाल करें। कानपुर मेट्रो एक अच्छा विकल्प है।
पेड़ लगाएं: ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाएं और उनकी देखभाल करें।
पानी बचाएं: पानी की बर्बादी न करें, वर्षा जल संचयन अपनाएं।
कचरा कम करें: प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाएं, कचरे को अलग-अलग करके दें।
कूड़ा न जलाएं: कूड़ा और पराली जलाने से बचें।
सौर ऊर्जा: घर की छत पर सोलर पैनल लगवाने पर विचार करें। सरकार इसके लिए सब्सिडी भी देती है।
यूएनईपी क्या है
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) संयुक्त राष्ट्र की वह संस्था है, जो दुनियाभर में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कामों का समन्वय करती है। इसका मुख्यालय केन्या की राजधानी नैरोबी में है। यूएनईपी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर रिपोर्ट जारी करता है और देशों को नीतियां बनाने में मदद करता है। एमिशंस गैप रिपोर्ट इसकी सबसे चर्चित रिपोर्टों में से एक है, जिसका दुनियाभर के नीति निर्माता इंतजार करते हैं।
स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ती दुनिया
दुनियाभर में सौर और पवन ऊर्जा की लागत तेजी से घटी है। कई देशों में अब नई बिजली परियोजनाओं में सबसे ज्यादा हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा का है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री भी लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह रफ्तार और तेज हो, तो उत्सर्जन में बड़ी कटौती संभव है।
बच्चों को करें जागरूक
स्कूलों में बच्चों को जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण के बारे में सिखाना जरूरी है, क्योंकि आने वाले समय में सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर पड़ेगा।
निष्कर्ष
यूएनईपी की एमिशंस गैप रिपोर्ट 2026 का शीर्षक "द पॉइंट ऑफ रिटर्न" अपने आप में एक चेतावनी है। अगर दुनिया ने अभी तेजी से उत्सर्जन नहीं घटाया, तो 1.5 डिग्री का लक्ष्य हाथ से निकल सकता है। सरकारों, उद्योगों और आम लोगों, सभी को मिलकर काम करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित धरती मिल सके।
पर्यावरण और दुनिया की हर बड़ी खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
यह खबर अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें:
किसी तथ्य में गलती दिखे तो हमें बताएं — हमारी संपादकीय नीति पढ़ें।
और पढ़ें | Related News
मैनपुरी की सौज झील बनी रामसर साइट, यूपी में अब 14
नवरात्र में गंदगी पर सख्ती: कानपुर नगर आयुक्त के निरीक्षण में मिला कूड़ा, दो सफाई नायकों को नोटिस, कर्मचारियों का एक दिन का वेतन कटा
कानपुर देहात में 11 अक्टूबर तक आंधी-बिजली का अलर्ट
कानपुर में 7 अक्टूबर को हल्की बारिश के आसार
कानपुर समेत पूरे यूपी से मानसून की विदाई, तय समय से दो दिन पहले लौटा; दिन-रात के पारे में 10 डिग्री का अंतर,
पांडु नदी फिर उफान पर, जरौली में घुसा पानी; एनडीआरएफ ने 16 परिवारों को सुरक्षित निकाला
सबसे ज़्यादा पढ़ी गई | Most Read
- 1एशियाई पैरा खेल: भारत के 30 पदक, दीप्ति और सिमरन ने बनाए खेलों के रिकॉर्ड
- 2सेना को मिला स्वदेशी 'नागास्त्र-2' एंटी-टैंक ड्रोन, 50 किमी तक दुश्मन के टैंक पर करेगा वार
- 3'खेत बचाओ अभियान' शुरू: 30 नवंबर तक 1 करोड़ किसानों तक पहुंचेंगे 12 हजार कृषि वैज्ञानिक
- 4तिलक वर्मा और नीतीश रेड्डी ने पलटी बाजी, भारत ने न्यूजीलैंड को हराकर 2-0 की बढ़त ली
- 5जीटी रोड पर कंटेनर से भिड़ंत के बाद डिवाइडर तोड़कर दूसरी लेन में पलटा नगर निगम का वाहन