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यूपीआई पर एमडीआर के विरोध में कानपुर के व्यापारियों का 'नो यूपीआई डे', क्यूआर कोड पर बांधा काला कपड़ा; जानें क्या है पूरा मामला

Kanpur traders observe 'No UPI Day' against proposed MDR on UPI payments above Rs 2,000

Kanpur Live News Desk ·

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यूपीआई पर एमडीआर के विरोध में कानपुर के व्यापारियों का 'नो यूपीआई डे', क्यूआर कोड पर बांधा काला कपड़ा; जानें क्या है पूरा मामला
डिजिटल भुगतान के दौर में यूपीआई आम लोगों और छोटे दुकानदारों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक, हर जगह क्यूआर कोड स्कैन करके भुगतान करना अब आम बात है। लेकिन अब यूपीआई लेनदेन पर प्रस्तावित एक शुल्क को लेकर व्यापारियों में नाराजगी देखने को मिल रही है। इसी के विरोध में कानपुर के ग्रामीण क्षेत्रों के व्यापारियों ने 2 अक्टूबर को 'नो यूपीआई डे' मनाने का ऐलान किया। इस दिन व्यापारियों ने यूपीआई से भुगतान न लेने और प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराने की घोषणा की थी। क्या है व्यापारियों का विरोध दो हजार रुपये से ज्यादा के यूपीआई लेनदेन पर प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर के विरोध में व्यापारियों ने 2 अक्टूबर को नो यूपीआई डे मनाने का फैसला किया। घोषणा के अनुसार इस दिन व्यापारी यूपीआई से भुगतान स्वीकार नहीं करेंगे, अपने क्यूआर कोड पर काला कपड़ा बांधेंगे और हाथों पर काली पट्टी बांधकर विरोध दर्ज कराएंगे। अहिरवां में हुई बैठक इस विरोध का फैसला अहिरवां में आदर्श व्यापार मंडल की ओर से आयोजित बैठक में लिया गया। व्यापार मंडल के जिलाध्यक्ष महेश वर्मा ने बताया कि इस विरोध में ग्रामीण क्षेत्र के चकेरी से घाटमपुर और महाराजपुर से भीतरगांव तक के प्रमुख बाजार शामिल होंगे। बैठक में जिला महामंत्री रजत पांडे, रवि सिंह, आनंद गुप्ता, श्याम सुंदर और हरिओम शिवहरे समेत कई व्यापारी मौजूद रहे। एमडीआर क्या होता है मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वह शुल्क है, जो कोई दुकानदार या व्यापारी डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता को देता है। उदाहरण के तौर पर, जब कोई ग्राहक डेबिट या क्रेडिट कार्ड से भुगतान करता है, तो उस लेनदेन पर दुकानदार को एक छोटा शुल्क देना पड़ता है। यही शुल्क एमडीआर कहलाता है। यूपीआई के मामले में अब तक व्यापारियों के लिए आम तौर पर जीरो एमडीआर की व्यवस्था रही है, यानी यूपीआई से भुगतान लेने पर उन्हें कोई शुल्क नहीं देना पड़ता था। यही वजह है कि छोटे दुकानदारों ने भी बड़ी संख्या में यूपीआई को अपनाया। क्या है नया प्रावधान रिपोर्टों के अनुसार 15 अक्टूबर से चुनिंदा व्यापारी लेनदेन में 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई भुगतान पर एमडीआर लागू होगा। वहीं 2,000 रुपये तक के भुगतान और छोटे व्यापारियों के लिए जीरो-एमडीआर की व्यवस्था पहले की तरह जारी रहेगी। कानपुर के व्यापारी संगठन का कहना है कि 2,000 रुपये से ज्यादा के लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क प्रस्तावित है। इसका मतलब है कि अगर कोई ग्राहक 10,000 रुपये का भुगतान यूपीआई से करता है, तो व्यापारी को उस पर करीब 40 रुपये शुल्क देना पड़ सकता है। व्यापारियों का कहना है कि कम मार्जिन पर काम करने वाले कारोबार के लिए यह अतिरिक्त बोझ है। हालांकि यह शुल्क किन व्यापारियों पर और किन शर्तों के साथ लागू होगा, इसकी सटीक जानकारी के लिए आधिकारिक अधिसूचना और अपने बैंक से पुष्टि जरूर करें। व्यापारियों की चिंता क्या है व्यापारियों की मुख्य चिंताएं ये हैं: मार्जिन पर असर: किराना, अनाज, दवा और थोक कारोबार जैसे क्षेत्रों में मुनाफे का मार्जिन बहुत कम होता है। ऐसे में 0.4 प्रतिशत का शुल्क भी उनके मुनाफे को काफी कम कर सकता है। डिजिटल भुगतान से दूरी: व्यापारियों का तर्क है कि शुल्क लगने से कई दुकानदार बड़े भुगतान के लिए नकद लेनदेन को प्राथमिकता देने लगेंगे, जिससे डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। ग्राहकों पर बोझ: कुछ व्यापारियों का कहना है कि अगर उन पर अतिरिक्त लागत आती है, तो अंततः उसका असर ग्राहकों तक भी पहुंच सकता है। ग्रामीण बाजारों पर असर: ग्रामीण क्षेत्रों में यूपीआई ने नकदी की निर्भरता काफी कम की है। व्यापारियों को डर है कि शुल्क लगने से यह प्रगति प्रभावित हो सकती है। दूसरा पक्ष भी समझें डिजिटल भुगतान प्रणाली को चलाने में बैंकों और भुगतान कंपनियों का बड़ा खर्च आता है। सर्वर, सुरक्षा व्यवस्था, धोखाधड़ी रोकने की तकनीक और ग्राहक सेवा जैसी व्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए संसाधनों की जरूरत होती है। उद्योग से जुड़े कुछ लोगों का तर्क रहा है कि बड़े लेनदेन और बड़े व्यापारियों पर सीमित शुल्क से इस व्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि नए प्रावधान में छोटे भुगतानों और छोटे व्यापारियों को छूट देने की बात कही गई है। इस मुद्दे पर अंतिम स्वरूप और उसके असर का आकलन आधिकारिक दिशा-निर्देशों के आधार पर ही किया जा सकेगा। उदाहरण से समझें शुल्क का गणित व्यापारियों की चिंता को एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी किराना थोक व्यापारी की रोजाना यूपीआई से होने वाली बिक्री 50,000 रुपये है और इसमें ज्यादातर भुगतान 2,000 रुपये से ऊपर के हैं। अगर इन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू होता है, तो उसे रोजाना करीब 200 रुपये और महीने में करीब 6,000 रुपये तक का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है। जिन कारोबारों में मुनाफा दो-तीन प्रतिशत ही होता है, उनके लिए यह रकम मायने रखती है। वहीं छोटे लेनदेन वाले दुकानदारों, जैसे चाय, सब्जी या छोटी परचून की दुकानों पर इसका असर कम होगा, क्योंकि उनके ज्यादातर भुगतान 2,000 रुपये से कम के होते हैं और उन्हें छूट की श्रेणी में रखा गया है। कार्ड भुगतान से तुलना डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान स्वीकार करने पर व्यापारियों को पहले से एमडीआर देना पड़ता रहा है। क्रेडिट कार्ड पर यह शुल्क आम तौर पर ज्यादा होता है। यूपीआई की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह यही रही है कि इसमें व्यापारियों के लिए अब तक शुल्क का बोझ नहीं था। यही कारण है कि व्यापारी इस बदलाव को लेकर ज्यादा संवेदनशील हैं और चाहते हैं कि कोई भी नया शुल्क लागू करने से पहले उनकी चिंताओं को भी ध्यान में रखा जाए। आम ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा आम ग्राहकों के लिए अच्छी खबर यह है कि एमडीआर का भुगतान व्यापारी को करना होता है, ग्राहक को नहीं। यानी यूपीआई से भुगतान करने पर ग्राहकों के खाते से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं कटेगा। व्यक्ति से व्यक्ति यानी दोस्त या परिवार को पैसे भेजने पर भी यह शुल्क लागू नहीं होता। हालांकि यह संभव है कि कुछ दुकानदार बड़े भुगतान के लिए नकद या दूसरे माध्यम की मांग करें। यूपीआई का बढ़ता दायरा यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस आज भारत की सबसे सफल डिजिटल भुगतान प्रणालियों में से एक है। इसे भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम यानी एनपीसीआई संचालित करता है। हर महीने अरबों लेनदेन यूपीआई के जरिये होते हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सब्जी विक्रेता, ऑटो चालक, छोटे दुकानदार और यहां तक कि गांवों के छोटे कारोबारी भी अब क्यूआर कोड के जरिये भुगतान लेने लगे हैं। भारत की यह प्रणाली दुनिया के कई देशों के लिए एक मॉडल बन चुकी है। कानपुर के बाजारों पर असर कानपुर एक बड़ा व्यापारिक केंद्र है। शहर के साथ-साथ घाटमपुर, बिधनू, महाराजपुर, चकेरी और भीतरगांव जैसे ग्रामीण इलाकों में भी बड़े बाजार हैं, जहां रोजाना भारी मात्रा में लेनदेन होता है। त्योहारों का मौसम शुरू होने वाला है और दशहरा-दीपावली के दौरान खरीदारी कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे समय में भुगतान व्यवस्था से जुड़ा कोई भी बदलाव व्यापारियों और ग्राहकों, दोनों के लिए अहम हो जाता है। ग्राहक क्या करें बड़े भुगतान से पहले दुकानदार से पूछ लें कि वह किस माध्यम से भुगतान स्वीकार करेगा। जरूरत के अनुसार थोड़ी नकदी साथ रखें, खासकर ग्रामीण बाजारों में खरीदारी करते समय। डिजिटल भुगतान करते समय रसीद या भुगतान का स्क्रीनशॉट जरूर संभालकर रखें। किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर यूपीआई पिन न डालें। पैसे लेने के लिए पिन की जरूरत नहीं होती। भुगतान से जुड़ी धोखाधड़ी की स्थिति में तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें। व्यापारियों के लिए सुझाव व्यापारी अपने बैंक से संपर्क कर नए नियमों की सटीक जानकारी लें कि उनके खाते पर एमडीआर लागू होगा या नहीं। छोटे व्यापारी की परिभाषा और छूट की शर्तें समझना जरूरी है। साथ ही अपने लेनदेन का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखें, ताकि किसी भी शुल्क की सही गणना हो सके। व्यापार मंडल और संगठनों के माध्यम से अपनी बात संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना लोकतांत्रिक तरीका है। आगे क्या व्यापारी संगठनों का यह विरोध प्रतीकात्मक है, जिसके जरिये वे अपनी चिंता को सरकार और संबंधित संस्थाओं तक पहुंचाना चाहते हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर व्यापारी संगठनों और संबंधित पक्षों के बीच संवाद होने की उम्मीद है। 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नियमों का अंतिम स्वरूप और उनका असर आने वाले समय में ही साफ होगा। निष्कर्ष यूपीआई ने भारत में भुगतान का तरीका बदल दिया है और छोटे से छोटे कारोबारी को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा है। ऐसे में इस पर लगने वाला कोई भी शुल्क व्यापक बहस का विषय बनना स्वाभाविक है। कानपुर के व्यापारियों का नो यूपीआई डे इसी चिंता की अभिव्यक्ति है। ग्राहकों और व्यापारियों, दोनों के हित में यही है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था सरल, सुरक्षित और सभी के लिए सुलभ बनी रहे। व्यापार, बाजार और आपकी जेब से जुड़ी हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ लगातार जुड़े रहें।

यूपीआई पर एमडीआर के विरोध में कानपुर के व्यापारियों का 'नो यूपीआई डे', क्यूआर कोड पर बांधा काला कपड़ा; जानें क्या है पूरा मामला

डिजिटल भुगतान के दौर में यूपीआई आम लोगों और छोटे दुकानदारों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक, हर जगह क्यूआर कोड स्कैन करके भुगतान करना अब आम बात है। लेकिन अब यूपीआई लेनदेन पर प्रस्तावित एक शुल्क को लेकर व्यापारियों में नाराजगी देखने को मिल रही है। इसी के विरोध में कानपुर के ग्रामीण क्षेत्रों के व्यापारियों ने 2 अक्टूबर को 'नो यूपीआई डे' मनाने का ऐलान किया। इस दिन व्यापारियों ने यूपीआई से भुगतान न लेने और प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराने की घोषणा की थी। क्या है व्यापारियों का विरोध दो हजार रुपये से ज्यादा के यूपीआई लेनदेन पर प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर के विरोध में व्यापारियों ने 2 अक्टूबर को नो यूपीआई डे मनाने का फैसला किया। घोषणा के अनुसार इस दिन व्यापारी यूपीआई से भुगतान स्वीकार नहीं करेंगे, अपने क्यूआर कोड पर काला कपड़ा बांधेंगे और हाथों पर काली पट्टी बांधकर विरोध दर्ज कराएंगे। अहिरवां में हुई बैठक इस विरोध का फैसला अहिरवां में आदर्श व्यापार मंडल की ओर से आयोजित बैठक में लिया गया। व्यापार मंडल के जिलाध्यक्ष महेश वर्मा ने बताया कि इस विरोध में ग्रामीण क्षेत्र के चकेरी से घाटमपुर और महाराजपुर से भीतरगांव तक के प्रमुख बाजार शामिल होंगे। बैठक में जिला महामंत्री रजत पांडे, रवि सिंह, आनंद गुप्ता, श्याम सुंदर और हरिओम शिवहरे समेत कई व्यापारी मौजूद रहे। एमडीआर क्या होता है मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वह शुल्क है, जो कोई दुकानदार या व्यापारी डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता को देता है। उदाहरण के तौर पर, जब कोई ग्राहक डेबिट या क्रेडिट कार्ड से भुगतान करता है, तो उस लेनदेन पर दुकानदार को एक छोटा शुल्क देना पड़ता है। यही शुल्क एमडीआर कहलाता है। यूपीआई के मामले में अब तक व्यापारियों के लिए आम तौर पर जीरो एमडीआर की व्यवस्था रही है, यानी यूपीआई से भुगतान लेने पर उन्हें कोई शुल्क नहीं देना पड़ता था। यही वजह है कि छोटे दुकानदारों ने भी बड़ी संख्या में यूपीआई को अपनाया। क्या है नया प्रावधान रिपोर्टों के अनुसार 15 अक्टूबर से चुनिंदा व्यापारी लेनदेन में 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई भुगतान पर एमडीआर लागू होगा। वहीं 2,000 रुपये तक के भुगतान और छोटे व्यापारियों के लिए जीरो-एमडीआर की व्यवस्था पहले की तरह जारी रहेगी। कानपुर के व्यापारी संगठन का कहना है कि 2,000 रुपये से ज्यादा के लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क प्रस्तावित है। इसका मतलब है कि अगर कोई ग्राहक 10,000 रुपये का भुगतान यूपीआई से करता है, तो व्यापारी को उस पर करीब 40 रुपये शुल्क देना पड़ सकता है। व्यापारियों का कहना है कि कम मार्जिन पर काम करने वाले कारोबार के लिए यह अतिरिक्त बोझ है। हालांकि यह शुल्क किन व्यापारियों पर और किन शर्तों के साथ लागू होगा, इसकी सटीक जानकारी के लिए आधिकारिक अधिसूचना और अपने बैंक से पुष्टि जरूर करें। व्यापारियों की चिंता क्या है व्यापारियों की मुख्य चिंताएं ये हैं: मार्जिन पर असर: किराना, अनाज, दवा और थोक कारोबार जैसे क्षेत्रों में मुनाफे का मार्जिन बहुत कम होता है। ऐसे में 0.4 प्रतिशत का शुल्क भी उनके मुनाफे को काफी कम कर सकता है। डिजिटल भुगतान से दूरी: व्यापारियों का तर्क है कि शुल्क लगने से कई दुकानदार बड़े भुगतान के लिए नकद लेनदेन को प्राथमिकता देने लगेंगे, जिससे डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। ग्राहकों पर बोझ: कुछ व्यापारियों का कहना है कि अगर उन पर अतिरिक्त लागत आती है, तो अंततः उसका असर ग्राहकों तक भी पहुंच सकता है। ग्रामीण बाजारों पर असर: ग्रामीण क्षेत्रों में यूपीआई ने नकदी की निर्भरता काफी कम की है। व्यापारियों को डर है कि शुल्क लगने से यह प्रगति प्रभावित हो सकती है। दूसरा पक्ष भी समझें डिजिटल भुगतान प्रणाली को चलाने में बैंकों और भुगतान कंपनियों का बड़ा खर्च आता है। सर्वर, सुरक्षा व्यवस्था, धोखाधड़ी रोकने की तकनीक और ग्राहक सेवा जैसी व्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए संसाधनों की जरूरत होती है। उद्योग से जुड़े कुछ लोगों का तर्क रहा है कि बड़े लेनदेन और बड़े व्यापारियों पर सीमित शुल्क से इस व्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि नए प्रावधान में छोटे भुगतानों और छोटे व्यापारियों को छूट देने की बात कही गई है। इस मुद्दे पर अंतिम स्वरूप और उसके असर का आकलन आधिकारिक दिशा-निर्देशों के आधार पर ही किया जा सकेगा। उदाहरण से समझें शुल्क का गणित व्यापारियों की चिंता को एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी किराना थोक व्यापारी की रोजाना यूपीआई से होने वाली बिक्री 50,000 रुपये है और इसमें ज्यादातर भुगतान 2,000 रुपये से ऊपर के हैं। अगर इन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू होता है, तो उसे रोजाना करीब 200 रुपये और महीने में करीब 6,000 रुपये तक का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है। जिन कारोबारों में मुनाफा दो-तीन प्रतिशत ही होता है, उनके लिए यह रकम मायने रखती है। वहीं छोटे लेनदेन वाले दुकानदारों, जैसे चाय, सब्जी या छोटी परचून की दुकानों पर इसका असर कम होगा, क्योंकि उनके ज्यादातर भुगतान 2,000 रुपये से कम के होते हैं और उन्हें छूट की श्रेणी में रखा गया है। कार्ड भुगतान से तुलना डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान स्वीकार करने पर व्यापारियों को पहले से एमडीआर देना पड़ता रहा है। क्रेडिट कार्ड पर यह शुल्क आम तौर पर ज्यादा होता है। यूपीआई की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह यही रही है कि इसमें व्यापारियों के लिए अब तक शुल्क का बोझ नहीं था। यही कारण है कि व्यापारी इस बदलाव को लेकर ज्यादा संवेदनशील हैं और चाहते हैं कि कोई भी नया शुल्क लागू करने से पहले उनकी चिंताओं को भी ध्यान में रखा जाए। आम ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा आम ग्राहकों के लिए अच्छी खबर यह है कि एमडीआर का भुगतान व्यापारी को करना होता है, ग्राहक को नहीं। यानी यूपीआई से भुगतान करने पर ग्राहकों के खाते से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं कटेगा। व्यक्ति से व्यक्ति यानी दोस्त या परिवार को पैसे भेजने पर भी यह शुल्क लागू नहीं होता। हालांकि यह संभव है कि कुछ दुकानदार बड़े भुगतान के लिए नकद या दूसरे माध्यम की मांग करें। यूपीआई का बढ़ता दायरा यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस आज भारत की सबसे सफल डिजिटल भुगतान प्रणालियों में से एक है। इसे भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम यानी एनपीसीआई संचालित करता है। हर महीने अरबों लेनदेन यूपीआई के जरिये होते हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सब्जी विक्रेता, ऑटो चालक, छोटे दुकानदार और यहां तक कि गांवों के छोटे कारोबारी भी अब क्यूआर कोड के जरिये भुगतान लेने लगे हैं। भारत की यह प्रणाली दुनिया के कई देशों के लिए एक मॉडल बन चुकी है। कानपुर के बाजारों पर असर कानपुर एक बड़ा व्यापारिक केंद्र है। शहर के साथ-साथ घाटमपुर, बिधनू, महाराजपुर, चकेरी और भीतरगांव जैसे ग्रामीण इलाकों में भी बड़े बाजार हैं, जहां रोजाना भारी मात्रा में लेनदेन होता है। त्योहारों का मौसम शुरू होने वाला है और दशहरा-दीपावली के दौरान खरीदारी कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे समय में भुगतान व्यवस्था से जुड़ा कोई भी बदलाव व्यापारियों और ग्राहकों, दोनों के लिए अहम हो जाता है। ग्राहक क्या करें बड़े भुगतान से पहले दुकानदार से पूछ लें कि वह किस माध्यम से भुगतान स्वीकार करेगा। जरूरत के अनुसार थोड़ी नकदी साथ रखें, खासकर ग्रामीण बाजारों में खरीदारी करते समय। डिजिटल भुगतान करते समय रसीद या भुगतान का स्क्रीनशॉट जरूर संभालकर रखें। किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर यूपीआई पिन न डालें। पैसे लेने के लिए पिन की जरूरत नहीं होती। भुगतान से जुड़ी धोखाधड़ी की स्थिति में तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें। व्यापारियों के लिए सुझाव व्यापारी अपने बैंक से संपर्क कर नए नियमों की सटीक जानकारी लें कि उनके खाते पर एमडीआर लागू होगा या नहीं। छोटे व्यापारी की परिभाषा और छूट की शर्तें समझना जरूरी है। साथ ही अपने लेनदेन का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखें, ताकि किसी भी शुल्क की सही गणना हो सके। व्यापार मंडल और संगठनों के माध्यम से अपनी बात संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना लोकतांत्रिक तरीका है। आगे क्या व्यापारी संगठनों का यह विरोध प्रतीकात्मक है, जिसके जरिये वे अपनी चिंता को सरकार और संबंधित संस्थाओं तक पहुंचाना चाहते हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर व्यापारी संगठनों और संबंधित पक्षों के बीच संवाद होने की उम्मीद है। 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नियमों का अंतिम स्वरूप और उनका असर आने वाले समय में ही साफ होगा। निष्कर्ष यूपीआई ने भारत में भुगतान का तरीका बदल दिया है और छोटे से छोटे कारोबारी को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा है। ऐसे में इस पर लगने वाला कोई भी शुल्क व्यापक बहस का विषय बनना स्वाभाविक है। कानपुर के व्यापारियों का नो यूपीआई डे इसी चिंता की अभिव्यक्ति है। ग्राहकों और व्यापारियों, दोनों के हित में यही है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था सरल, सुरक्षित और सभी के लिए सुलभ बनी रहे। व्यापार, बाजार और आपकी जेब से जुड़ी हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ लगातार जुड़े रहें।

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