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रोशनी पड़ते ही पानी के बैक्टीरिया खत्म करेंगे क्वांटम डॉट्स

Zinc oxide quantum dots could kill bacteria in water using light

Kanpur Live News Desk ·

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रोशनी पड़ते ही पानी के बैक्टीरिया खत्म करेंगे क्वांटम डॉट्स
साफ पीने का पानी आज भी देश और दुनिया के लिए बड़ी चुनौती है। दूषित पानी में मौजूद बैक्टीरिया कई गंभीर बीमारियों की वजह बनते हैं। ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों का एक नया शोध उम्मीद की किरण लेकर आया है। वैज्ञानिकों ने एक नई पद्धति से बेहद सूक्ष्म जिंक ऑक्साइड क्वांटम डॉट्स तैयार किए हैं, जो सामान्य रोशनी पड़ने पर ऐसा प्रकाश छोड़ते हैं, जिससे बैक्टीरिया को नष्ट किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह तकनीक पानी और दूसरी चीजों में मौजूद बैक्टीरिया को कुछ ही सेकंड में खत्म करने की क्षमता रखती है। किसने किया यह शोध यह शोध इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग के पूर्व प्रोफेसर और वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. टीपी यादव, दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. गोविंद दयाल सिंह और शोधार्थी निकिता ने किया है। डॉ. टीपी यादव को दुनिया के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों में गिना जाता है, जबकि डॉ. गोविंद दयाल सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे हैं। इस शोध को नीदरलैंड के प्रतिष्ठित जर्नल 'सिरैमिक्स इंटरनेशनल' ने 24 सितंबर 2026 के अंक में प्रकाशित किया है। क्या होते हैं क्वांटम डॉट्स क्वांटम डॉट्स बेहद छोटे कण होते हैं, जो नैनो कणों से भी छोटे होते हैं। प्रो. टीपी यादव के अनुसार जिंक ऑक्साइड क्वांटम डॉट्स की सतह पर ऊर्जा नैनो कणों के मुकाबले काफी ज्यादा होती है। इन क्वांटम डॉट्स का आकार केवल 2 से 6 नैनोमीटर है। एक नैनोमीटर एक मीटर का एक अरबवां हिस्सा होता है। इसे ऐसे समझें कि इंसान का एक बाल लगभग 80 हजार से एक लाख नैनोमीटर मोटा होता है। यानी ये कण इतने छोटे हैं कि इन्हें सामान्य माइक्रोस्कोप से भी नहीं देखा जा सकता। कैसे खत्म होंगे बैक्टीरिया इन क्वांटम डॉट्स की खास बात है कि ये सामान्य रोशनी में लगभग 400 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य का तेज बैंगनी प्रकाश छोड़ते हैं, जो पराबैंगनी किरणों के बेहद करीब होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस तरह की किरणों से बैक्टीरिया को नष्ट किया जा सकता है। पराबैंगनी यानी अल्ट्रावायलेट किरणें बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीवों के डीएनए को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे वे बढ़ नहीं पाते और खत्म हो जाते हैं। यही कारण है कि कई वाटर प्यूरीफायर में यूवी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। नई तकनीक में सामान्य रोशनी से ही ऐसा प्रभाव पैदा करने की संभावना है। इस तरह तैयार हुए क्वांटम डॉट्स शोधकर्ताओं ने इन्हें बनाने के लिए दो तकनीकों, हाई एनर्जी बॉल मिलिंग और अल्ट्रासोनिकेशन-लिक्विड फेज एक्सफोलिएशन को मिलाया। पहले यांत्रिक प्रक्रिया से कणों का आकार घटाया गया, फिर अल्ट्रासोनिक तरंगों की मदद से उन्हें और सूक्ष्म बनाया गया। इस प्रक्रिया से मिले कणों में अच्छी क्रिस्टलीय संरचना और लगभग गोल आकृति पाई गई। क्वांटम कॉन्फाइनमेंट का कमाल शोध के अनुसार जब किसी अर्धचालक पदार्थ के कणों का आकार बहुत छोटा हो जाता है, तो उसमें क्वांटम कॉन्फाइनमेंट नाम का प्रभाव पैदा होता है, जिससे पदार्थ के प्रकाश से जुड़े गुण बदल जाते हैं। इस अध्ययन में तैयार क्वांटम डॉट्स में प्रकाश सोखने और छोड़ने के गुणों में उल्लेखनीय बदलाव देखा गया। सरल भाषा में कहें तो एक ही पदार्थ के गुण उसके आकार पर निर्भर करने लगते हैं। जब कण बेहद छोटे हो जाते हैं, तो वे बड़े टुकड़ों से बिल्कुल अलग व्यवहार करने लगते हैं। इसी सिद्धांत पर आधुनिक नैनो टेक्नोलॉजी आधारित है। और कहां हो सकता है इस्तेमाल यह शोध भविष्य में कई तकनीकों के विकास में उपयोगी हो सकता है: प्रकाश उत्सर्जक उपकरण: एलईडी और डिस्प्ले जैसी तकनीकों में। रासायनिक संवेदक: हवा या पानी में हानिकारक रसायनों का पता लगाने वाले सेंसर में। जैविक इमेजिंग: शरीर की कोशिकाओं और ऊतकों की जांच में। चिकित्सा क्षेत्र: संक्रमण नियंत्रण और कीटाणुनाशक तकनीकों में। प्रो. यादव का मानना है कि आने वाले समय में यह खोज चिकित्सा जगत के लिए भी क्रांतिकारी साबित हो सकती है। अगला कदम: वायरस पर शोध इस सफलता के बाद वैज्ञानिकों की टीम अब वायरस पर जिंक ऑक्साइड क्वांटम डॉट्स के असर पर शोध करने जा रही है। डॉ. यादव ने बताया कि देश में वायरस पर शोध के लिए बहुत कम प्रयोगशालाएं हैं और सामान्य प्रयोगशाला में ऐसा शोध नहीं हो सकता, क्योंकि इससे वायरस फैलने का खतरा रहता है। जल्द ही उच्च स्तरीय लैब में अगले चरण का शोध शुरू किया जाएगा। साफ पानी की चुनौती भारत में आज भी बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। दूषित पानी से डायरिया, हैजा, टाइफाइड और पीलिया जैसी बीमारियां फैलती हैं, जिनका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है। ऐसे में कम लागत वाली और आसान पानी शुद्धिकरण तकनीकें बेहद जरूरी हैं। अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में पानी को सुरक्षित बनाने में बड़ी मदद मिल सकती है। प्रयोगशाला से घर तक का सफर किसी भी वैज्ञानिक खोज को प्रयोगशाला से आम लोगों तक पहुंचने में समय लगता है। पहले इसके और परीक्षण होते हैं, सुरक्षा की जांच की जाती है, फिर उद्योगों के साथ मिलकर इसे व्यावसायिक उत्पाद में बदला जाता है। इसलिए यह तकनीक अभी शोध के स्तर पर है। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि देश में नैनो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बढ़ती क्षमता को दर्शाती है। नैनो टेक्नोलॉजी: छोटे कण, बड़ा असर नैनो टेक्नोलॉजी आज विज्ञान के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक है। दवाइयों को शरीर में सही जगह तक पहुंचाने, बेहतर बैटरी बनाने, मजबूत और हल्की सामग्री तैयार करने और सोलर पैनल की क्षमता बढ़ाने जैसे कामों में इसका इस्तेमाल हो रहा है। भारत के कई विश्वविद्यालय और शोध संस्थान इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। विज्ञान में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए यह करियर का एक आकर्षक और भविष्य वाला क्षेत्र बन चुका है। निष्कर्ष जिंक ऑक्साइड क्वांटम डॉट्स पर हुआ यह शोध साफ पानी, स्वास्थ्य और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलता है। उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि प्रदेश के लिए भी गर्व की बात है। विज्ञान और तकनीक से जुड़ी हर दिलचस्प खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ लगातार जुड़े रहें।

रोशनी पड़ते ही पानी के बैक्टीरिया खत्म करेंगे क्वांटम डॉट्स

साफ पीने का पानी आज भी देश और दुनिया के लिए बड़ी चुनौती है। दूषित पानी में मौजूद बैक्टीरिया कई गंभीर बीमारियों की वजह बनते हैं। ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों का एक नया शोध उम्मीद की किरण लेकर आया है। वैज्ञानिकों ने एक नई पद्धति से बेहद सूक्ष्म जिंक ऑक्साइड क्वांटम डॉट्स तैयार किए हैं, जो सामान्य रोशनी पड़ने पर ऐसा प्रकाश छोड़ते हैं, जिससे बैक्टीरिया को नष्ट किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह तकनीक पानी और दूसरी चीजों में मौजूद बैक्टीरिया को कुछ ही सेकंड में खत्म करने की क्षमता रखती है। किसने किया यह शोध यह शोध इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग के पूर्व प्रोफेसर और वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. टीपी यादव, दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. गोविंद दयाल सिंह और शोधार्थी निकिता ने किया है। डॉ. टीपी यादव को दुनिया के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों में गिना जाता है, जबकि डॉ. गोविंद दयाल सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे हैं। इस शोध को नीदरलैंड के प्रतिष्ठित जर्नल 'सिरैमिक्स इंटरनेशनल' ने 24 सितंबर 2026 के अंक में प्रकाशित किया है। क्या होते हैं क्वांटम डॉट्स क्वांटम डॉट्स बेहद छोटे कण होते हैं, जो नैनो कणों से भी छोटे होते हैं। प्रो. टीपी यादव के अनुसार जिंक ऑक्साइड क्वांटम डॉट्स की सतह पर ऊर्जा नैनो कणों के मुकाबले काफी ज्यादा होती है। इन क्वांटम डॉट्स का आकार केवल 2 से 6 नैनोमीटर है। एक नैनोमीटर एक मीटर का एक अरबवां हिस्सा होता है। इसे ऐसे समझें कि इंसान का एक बाल लगभग 80 हजार से एक लाख नैनोमीटर मोटा होता है। यानी ये कण इतने छोटे हैं कि इन्हें सामान्य माइक्रोस्कोप से भी नहीं देखा जा सकता। कैसे खत्म होंगे बैक्टीरिया इन क्वांटम डॉट्स की खास बात है कि ये सामान्य रोशनी में लगभग 400 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य का तेज बैंगनी प्रकाश छोड़ते हैं, जो पराबैंगनी किरणों के बेहद करीब होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस तरह की किरणों से बैक्टीरिया को नष्ट किया जा सकता है। पराबैंगनी यानी अल्ट्रावायलेट किरणें बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीवों के डीएनए को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे वे बढ़ नहीं पाते और खत्म हो जाते हैं। यही कारण है कि कई वाटर प्यूरीफायर में यूवी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। नई तकनीक में सामान्य रोशनी से ही ऐसा प्रभाव पैदा करने की संभावना है। इस तरह तैयार हुए क्वांटम डॉट्स शोधकर्ताओं ने इन्हें बनाने के लिए दो तकनीकों, हाई एनर्जी बॉल मिलिंग और अल्ट्रासोनिकेशन-लिक्विड फेज एक्सफोलिएशन को मिलाया। पहले यांत्रिक प्रक्रिया से कणों का आकार घटाया गया, फिर अल्ट्रासोनिक तरंगों की मदद से उन्हें और सूक्ष्म बनाया गया। इस प्रक्रिया से मिले कणों में अच्छी क्रिस्टलीय संरचना और लगभग गोल आकृति पाई गई। क्वांटम कॉन्फाइनमेंट का कमाल शोध के अनुसार जब किसी अर्धचालक पदार्थ के कणों का आकार बहुत छोटा हो जाता है, तो उसमें क्वांटम कॉन्फाइनमेंट नाम का प्रभाव पैदा होता है, जिससे पदार्थ के प्रकाश से जुड़े गुण बदल जाते हैं। इस अध्ययन में तैयार क्वांटम डॉट्स में प्रकाश सोखने और छोड़ने के गुणों में उल्लेखनीय बदलाव देखा गया। सरल भाषा में कहें तो एक ही पदार्थ के गुण उसके आकार पर निर्भर करने लगते हैं। जब कण बेहद छोटे हो जाते हैं, तो वे बड़े टुकड़ों से बिल्कुल अलग व्यवहार करने लगते हैं। इसी सिद्धांत पर आधुनिक नैनो टेक्नोलॉजी आधारित है। और कहां हो सकता है इस्तेमाल यह शोध भविष्य में कई तकनीकों के विकास में उपयोगी हो सकता है: प्रकाश उत्सर्जक उपकरण: एलईडी और डिस्प्ले जैसी तकनीकों में। रासायनिक संवेदक: हवा या पानी में हानिकारक रसायनों का पता लगाने वाले सेंसर में। जैविक इमेजिंग: शरीर की कोशिकाओं और ऊतकों की जांच में। चिकित्सा क्षेत्र: संक्रमण नियंत्रण और कीटाणुनाशक तकनीकों में। प्रो. यादव का मानना है कि आने वाले समय में यह खोज चिकित्सा जगत के लिए भी क्रांतिकारी साबित हो सकती है। अगला कदम: वायरस पर शोध इस सफलता के बाद वैज्ञानिकों की टीम अब वायरस पर जिंक ऑक्साइड क्वांटम डॉट्स के असर पर शोध करने जा रही है। डॉ. यादव ने बताया कि देश में वायरस पर शोध के लिए बहुत कम प्रयोगशालाएं हैं और सामान्य प्रयोगशाला में ऐसा शोध नहीं हो सकता, क्योंकि इससे वायरस फैलने का खतरा रहता है। जल्द ही उच्च स्तरीय लैब में अगले चरण का शोध शुरू किया जाएगा। साफ पानी की चुनौती भारत में आज भी बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। दूषित पानी से डायरिया, हैजा, टाइफाइड और पीलिया जैसी बीमारियां फैलती हैं, जिनका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है। ऐसे में कम लागत वाली और आसान पानी शुद्धिकरण तकनीकें बेहद जरूरी हैं। अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में पानी को सुरक्षित बनाने में बड़ी मदद मिल सकती है। प्रयोगशाला से घर तक का सफर किसी भी वैज्ञानिक खोज को प्रयोगशाला से आम लोगों तक पहुंचने में समय लगता है। पहले इसके और परीक्षण होते हैं, सुरक्षा की जांच की जाती है, फिर उद्योगों के साथ मिलकर इसे व्यावसायिक उत्पाद में बदला जाता है। इसलिए यह तकनीक अभी शोध के स्तर पर है। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि देश में नैनो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बढ़ती क्षमता को दर्शाती है। नैनो टेक्नोलॉजी: छोटे कण, बड़ा असर नैनो टेक्नोलॉजी आज विज्ञान के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक है। दवाइयों को शरीर में सही जगह तक पहुंचाने, बेहतर बैटरी बनाने, मजबूत और हल्की सामग्री तैयार करने और सोलर पैनल की क्षमता बढ़ाने जैसे कामों में इसका इस्तेमाल हो रहा है। भारत के कई विश्वविद्यालय और शोध संस्थान इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। विज्ञान में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए यह करियर का एक आकर्षक और भविष्य वाला क्षेत्र बन चुका है। निष्कर्ष जिंक ऑक्साइड क्वांटम डॉट्स पर हुआ यह शोध साफ पानी, स्वास्थ्य और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलता है। उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि प्रदेश के लिए भी गर्व की बात है। विज्ञान और तकनीक से जुड़ी हर दिलचस्प खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ लगातार जुड़े रहें।

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