ब्रेकिंग न्यूज़
India's Skyroot Aerospace wins two-launch order from US firm Reflect Orbital | Model Mission Shakti Kendra opens at Kanpur's Badshahinaka police station | India-New Zealand FTA comes into force; 100% duty-free access for Indian exports, new visa pathways | PLFS September 2026: Unemployment rate falls to 5%, urban female participation rises | Asian Para Games 2026: India reaches 30 medals; Deepthi Jeevanji, Simran set Games records | Global Hunger Index 2026: India ranks 100th of 122 countries, child wasting a concern | PM Modi inaugurates five projects worth ₹3,350 crore in Ladakh | Rain washes out Bengaluru decider, India-West Indies T20I series ends 2-2
K
Kanpur.live
कानपुर की आवाज़ | Voice of Kanpur

वो रिक्शा चालक जिसने बनाई लाइब्रेरी — कानपुर की एक शांत मगर दृढ़ इरादों की कहानी

The Rickshaw Puller Who Built a Library — A Kanpur Story of Quiet Determination

Kanpur Live News Desk ·

WhatsApp पर भेजेंFacebookX
वो रिक्शा चालक जिसने बनाई लाइब्रेरी — कानपुर की एक शांत मगर दृढ़ इरादों की कहानी
कानपुर की गलियों में रोज सुबह अपनी रिक्शा लेकर निकलने वाला एक साधारण सा आदमी, आज शहर के एक छोटे से मोहल्ले में गरीब बच्चों के लिए उम्मीद की एक बड़ी वजह बन चुका है। यह कहानी है एक रिक्शा चालक की, जिसने अपनी मामूली सी कमाई से बच्चों के लिए एक छोटी लेकिन जीवंत लाइब्रेरी खड़ी कर दी — बिना किसी सरकारी मदद के, सिर्फ अपने दृढ़ इरादे और मेहनत के दम पर। बात कुछ साल पुरानी है, जब यह रिक्शा चालक अपने मोहल्ले के कुछ बच्चों को स्कूल जाने के बजाय पूरे दिन गलियों में इधर-उधर भटकते देखता था। उनमें से कई बच्चे ऐसे परिवारों से थे, जो किताबें खरीदना तो दूर, दो वक्त की रोटी जुटाने में ही जूझ रहे थे। यह देखकर उसके मन में एक विचार आया — क्यों न इन बच्चों के लिए कुछ ऐसा किया जाए, जिससे वे पढ़ाई की ओर आकर्षित हों। छोटी शुरुआत, बड़ा सपना शुरुआत में उसने अपनी रिक्शा की कमाई से हर हफ्ते कुछ पुरानी किताबें खरीदनी शुरू कीं। वह पुराने बाजारों और रद्दी की दुकानों से सस्ती दरों पर किताबें जुटाता, और शाम को अपने काम से लौटने के बाद मोहल्ले के बच्चों को इकट्ठा कर उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करता। धीरे-धीरे किताबों की संख्या बढ़ती गई, और उसने अपने घर के एक छोटे से हिस्से को ही एक छोटी लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया। शुरुआत में सिर्फ पांच-छह बच्चे आते थे, लेकिन जैसे-जैसे मोहल्ले में इस बात की चर्चा फैली, बच्चों की संख्या बढ़ती चली गई। मोहल्ले वालों का साथ जैसे-जैसे उसकी यह पहल मोहल्ले में मशहूर होती गई, कुछ पड़ोसियों और स्थानीय दुकानदारों ने भी उसकी मदद करनी शुरू कर दी। कोई पुरानी किताबें दान करता, तो कोई बच्चों के लिए स्टेशनरी का इंतजाम कर देता। धीरे-धीरे यह एक व्यक्ति की पहल से आगे बढ़कर पूरे मोहल्ले का सामूहिक प्रयास बन गई। आज इस छोटी सी लाइब्रेरी में सैकड़ों किताबें मौजूद हैं, और रोजाना दर्जनों बच्चे यहां पढ़ने आते हैं। कई बच्चे, जो कभी स्कूल जाने में भी अनियमित थे, अब नियमित रूप से पढ़ाई करने लगे हैं। संघर्ष के दिन भी कम नहीं हालांकि, इस सफर में चुनौतियां भी कम नहीं रहीं। सीमित आमदनी में अपने परिवार का खर्च चलाना और साथ ही लाइब्रेरी के लिए किताबें जुटाना आसान नहीं था। कई बार ऐसे भी दिन आए जब उसे अपनी जरूरतों में कटौती करके बच्चों के लिए किताबें खरीदनी पड़ीं। उसका कहना है कि उसने कभी बड़े सपने नहीं देखे थे, बस इतना चाहता था कि उसके आसपास के बच्चे कम से कम पढ़ना-लिखना सीख जाएं, ताकि उनका भविष्य बेहतर हो सके। बच्चों के जीवन में बदलाव इस छोटी सी लाइब्रेरी ने कई बच्चों की जिंदगी बदल दी है। कुछ बच्चे, जो पहले पढ़ाई में बिल्कुल रुचि नहीं रखते थे, अब नियमित रूप से स्कूल जाते हैं और अच्छे अंकों से पास हो रहे हैं। कई अभिभावकों का कहना है कि इस लाइब्रेरी ने न सिर्फ उनके बच्चों को किताबों से जोड़ा, बल्कि उनमें अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित की। समाज के लिए एक सीख इस रिक्शा चालक की कहानी यह साबित करती है कि बड़े बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयास से भी समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। यह कहानी उन सभी लोगों के लिए एक प्रेरणा है, जो यह मानते हैं कि सामाजिक बदलाव लाने के लिए बड़े पद या बड़ी दौलत की जरूरत होती है। आगे की योजना अब वह अपनी इस छोटी लाइब्रेरी को और विस्तार देने की योजना बना रहा है। उसका सपना है कि आने वाले समय में वह मोहल्ले के और भी बच्चों तक किताबें पहुंचा सके, और शायद एक दिन एक स्थायी भवन में इस लाइब्रेरी को स्थापित कर सके। उसकी यह साधारण लेकिन प्रेरणादायक कहानी यह याद दिलाती है कि समाज में बदलाव लाने वाले हीरो हमेशा सुर्खियों में नहीं होते — वे अक्सर हमारे आसपास, चुपचाप अपने हिस्से का काम करते रहते हैं। कानपुर लाइव समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाले ऐसे प्रेरणादायक लोगों की कहानियां अपने पाठकों तक पहुंचाता रहेगा।

वो रिक्शा चालक जिसने बनाई लाइब्रेरी — कानपुर की एक शांत मगर दृढ़ इरादों की कहानी

कानपुर की गलियों में रोज सुबह अपनी रिक्शा लेकर निकलने वाला एक साधारण सा आदमी, आज शहर के एक छोटे से मोहल्ले में गरीब बच्चों के लिए उम्मीद की एक बड़ी वजह बन चुका है। यह कहानी है एक रिक्शा चालक की, जिसने अपनी मामूली सी कमाई से बच्चों के लिए एक छोटी लेकिन जीवंत लाइब्रेरी खड़ी कर दी — बिना किसी सरकारी मदद के, सिर्फ अपने दृढ़ इरादे और मेहनत के दम पर। बात कुछ साल पुरानी है, जब यह रिक्शा चालक अपने मोहल्ले के कुछ बच्चों को स्कूल जाने के बजाय पूरे दिन गलियों में इधर-उधर भटकते देखता था। उनमें से कई बच्चे ऐसे परिवारों से थे, जो किताबें खरीदना तो दूर, दो वक्त की रोटी जुटाने में ही जूझ रहे थे। यह देखकर उसके मन में एक विचार आया — क्यों न इन बच्चों के लिए कुछ ऐसा किया जाए, जिससे वे पढ़ाई की ओर आकर्षित हों। छोटी शुरुआत, बड़ा सपना शुरुआत में उसने अपनी रिक्शा की कमाई से हर हफ्ते कुछ पुरानी किताबें खरीदनी शुरू कीं। वह पुराने बाजारों और रद्दी की दुकानों से सस्ती दरों पर किताबें जुटाता, और शाम को अपने काम से लौटने के बाद मोहल्ले के बच्चों को इकट्ठा कर उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करता। धीरे-धीरे किताबों की संख्या बढ़ती गई, और उसने अपने घर के एक छोटे से हिस्से को ही एक छोटी लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया। शुरुआत में सिर्फ पांच-छह बच्चे आते थे, लेकिन जैसे-जैसे मोहल्ले में इस बात की चर्चा फैली, बच्चों की संख्या बढ़ती चली गई। मोहल्ले वालों का साथ जैसे-जैसे उसकी यह पहल मोहल्ले में मशहूर होती गई, कुछ पड़ोसियों और स्थानीय दुकानदारों ने भी उसकी मदद करनी शुरू कर दी। कोई पुरानी किताबें दान करता, तो कोई बच्चों के लिए स्टेशनरी का इंतजाम कर देता। धीरे-धीरे यह एक व्यक्ति की पहल से आगे बढ़कर पूरे मोहल्ले का सामूहिक प्रयास बन गई। आज इस छोटी सी लाइब्रेरी में सैकड़ों किताबें मौजूद हैं, और रोजाना दर्जनों बच्चे यहां पढ़ने आते हैं। कई बच्चे, जो कभी स्कूल जाने में भी अनियमित थे, अब नियमित रूप से पढ़ाई करने लगे हैं। संघर्ष के दिन भी कम नहीं हालांकि, इस सफर में चुनौतियां भी कम नहीं रहीं। सीमित आमदनी में अपने परिवार का खर्च चलाना और साथ ही लाइब्रेरी के लिए किताबें जुटाना आसान नहीं था। कई बार ऐसे भी दिन आए जब उसे अपनी जरूरतों में कटौती करके बच्चों के लिए किताबें खरीदनी पड़ीं। उसका कहना है कि उसने कभी बड़े सपने नहीं देखे थे, बस इतना चाहता था कि उसके आसपास के बच्चे कम से कम पढ़ना-लिखना सीख जाएं, ताकि उनका भविष्य बेहतर हो सके। बच्चों के जीवन में बदलाव इस छोटी सी लाइब्रेरी ने कई बच्चों की जिंदगी बदल दी है। कुछ बच्चे, जो पहले पढ़ाई में बिल्कुल रुचि नहीं रखते थे, अब नियमित रूप से स्कूल जाते हैं और अच्छे अंकों से पास हो रहे हैं। कई अभिभावकों का कहना है कि इस लाइब्रेरी ने न सिर्फ उनके बच्चों को किताबों से जोड़ा, बल्कि उनमें अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित की। समाज के लिए एक सीख इस रिक्शा चालक की कहानी यह साबित करती है कि बड़े बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयास से भी समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। यह कहानी उन सभी लोगों के लिए एक प्रेरणा है, जो यह मानते हैं कि सामाजिक बदलाव लाने के लिए बड़े पद या बड़ी दौलत की जरूरत होती है। आगे की योजना अब वह अपनी इस छोटी लाइब्रेरी को और विस्तार देने की योजना बना रहा है। उसका सपना है कि आने वाले समय में वह मोहल्ले के और भी बच्चों तक किताबें पहुंचा सके, और शायद एक दिन एक स्थायी भवन में इस लाइब्रेरी को स्थापित कर सके। उसकी यह साधारण लेकिन प्रेरणादायक कहानी यह याद दिलाती है कि समाज में बदलाव लाने वाले हीरो हमेशा सुर्खियों में नहीं होते — वे अक्सर हमारे आसपास, चुपचाप अपने हिस्से का काम करते रहते हैं। कानपुर लाइव समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाले ऐसे प्रेरणादायक लोगों की कहानियां अपने पाठकों तक पहुंचाता रहेगा।

यह खबर अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें:

WhatsApp पर भेजेंFacebookX

किसी तथ्य में गलती दिखे तो हमें बताएं — हमारी संपादकीय नीति पढ़ें।

और पढ़ें | Related News

सबसे ज़्यादा पढ़ी गई | Most Read

  1. 1वृद्धावस्था-विधवा-दिव्यांग पेंशन योजनाओं के नाम बदले, दिव्यांगों को बड़ी राहत
  2. 2भारतीय स्टार्टअप स्काईरूट को अमेरिकी कंपनी से दो लॉन्च का ऑर्डर
  3. 3कानपुर के बादशाहीनाका थाने में मॉडल मिशन शक्ति केंद्र शुरू
  4. 4भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता लागू, भारतीय सामान को 100% शुल्क मुक्त पहुंच
  5. 5सितंबर में बेरोजगारी दर घटकर 5%, शहरों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी