कानपुर: अफ्रीकी देश कांगो में बनेगा एकीकृत चीनी परिसर, कानपुर के चीनी विशेषज्ञ देंगे तकनीकी मदद, भारतीय कंपनियों के लिए खुलेंगे रास्ते
Kanpur expertise to help build integrated sugar complex in Congo
Kanpur Live News Desk ·

कानपुर की चीनी तकनीक अब अफ्रीका में भी अपनी छाप छोड़ेगी। मध्य अफ्रीकी देश कांगो गणराज्य में एक एकीकृत चीनी परिसर (इंटीग्रेटेड शुगर कॉम्प्लेक्स) बनाया जाएगा, जिसके लिए कानपुर स्थित एनएसआई के पूर्व निदेशक प्रो. नरेंद्र मोहन तकनीकी और पेशेवर सहायता देंगे।
इस परियोजना का मकसद कांगो की घरेलू चीनी जरूरतें पूरी करना और पड़ोसी मध्य अफ्रीकी देशों के बाजारों में भी चीनी की आपूर्ति करना है।
दो चरणों में बनेगा परिसर
पहला चरण:
2,500 टन प्रतिदिन गन्ना पेराई क्षमता वाली चीनी मिल।
मिल से पैदा होने वाली अतिरिक्त बिजली राष्ट्रीय पावर ग्रिड को दी जाएगी।
दूसरा चरण:
पेराई क्षमता बढ़ाकर 3,500 टन प्रतिदिन की जाएगी।
एथेनॉल उत्पादन भी शुरू किया जाएगा।
एकीकृत चीनी परिसर क्या होता है
पारंपरिक चीनी मिल में सिर्फ गन्ने से चीनी बनाई जाती है। लेकिन एकीकृत चीनी परिसर में गन्ने के हर हिस्से का इस्तेमाल होता है:
चीनी: गन्ने के रस से चीनी।
बिजली: गन्ने की खोई (बगास) को जलाकर बिजली बनाई जाती है, जिसे को-जनरेशन कहते हैं। मिल अपनी जरूरत की बिजली खुद बनाती है और अतिरिक्त बिजली ग्रिड को बेचती है।
एथेनॉल: शीरे (मोलासेस) या गन्ने के रस से एथेनॉल बनता है, जिसे पेट्रोल में मिलाया जा सकता है।
खाद: मिल के अपशिष्ट से जैविक खाद बनाई जा सकती है।
इससे मिल की आमदनी के कई स्रोत बनते हैं और कुछ भी बर्बाद नहीं होता।
भारतीय कंपनियों के लिए अवसर
रिपोर्ट के अनुसार इस परियोजना से भारत के लिए कई अवसर खुलेंगे:
मशीनरी निर्यात: भारतीय चीनी मशीनरी निर्माता अपने उपकरण निर्यात कर सकेंगे।
इंजीनियरिंग: भारतीय इंजीनियरिंग कंपनियां डिजाइन और निर्माण में भूमिका निभा सकेंगी।
तकनीक हस्तांतरण: भारतीय तकनीक और विशेषज्ञता अफ्रीका तक पहुंचेगी।
कमीशनिंग और संचालन: भारतीय विशेषज्ञ मिल चालू करने, प्रशिक्षण देने और संचालन प्रबंधन में योगदान दे सकेंगे।
कानपुर: चीनी तकनीक का गढ़
कानपुर का राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, एनएसआई) चीनी प्रौद्योगिकी और चीनी इंजीनियरिंग के क्षेत्र में देश का प्रमुख संस्थान है। यहां से प्रशिक्षित विशेषज्ञ देश और दुनिया की चीनी मिलों में काम करते हैं। संस्थान कई देशों को चीनी उद्योग से जुड़ी तकनीकी सलाह और प्रशिक्षण देता रहा है। अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका के कई देशों के छात्र भी यहां प्रशिक्षण लेने आते हैं।
नोट: रिपोर्ट में संस्थान का संक्षिप्त नाम 'एनएसआई' बताया गया है और प्रो. नरेंद्र मोहन को उसका पूर्व निदेशक बताया गया है। कांगो के साथ समझौते की शर्तों, लागत और समय सीमा की जानकारी रिपोर्ट में नहीं दी गई है।
कांगो गणराज्य: एक नजर में
कांगो गणराज्य मध्य अफ्रीका का एक देश है, जिसकी राजधानी ब्राजाविल है। इसे इसके बड़े पड़ोसी देश 'डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो' से अलग पहचानने के लिए 'कांगो-ब्राजाविल' भी कहा जाता है। देश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तेल पर निर्भर है और यह खेती और उद्योग को बढ़ावा देकर अर्थव्यवस्था में विविधता लाना चाहता है। चीनी परिसर इसी दिशा में एक कदम हो सकता है।
भारत-अफ्रीका संबंधों को मजबूती
भारत और अफ्रीकी देशों के बीच व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। भारत अफ्रीकी देशों को कृषि, सिंचाई, दवाइयों और प्रशिक्षण के क्षेत्र में मदद देता रहा है। चीनी उद्योग में भारत की विशेषज्ञता विश्वस्तरीय है, क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल है। ऐसे में अफ्रीका में चीनी परियोजनाओं में भारतीय तकनीक की भागीदारी 'ग्लोबल साउथ' के देशों के बीच सहयोग का अच्छा उदाहरण है।
उत्तर प्रदेश और गन्ना
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है। यहां सैकड़ों चीनी मिलें हैं और लाखों किसान गन्ने की खेती पर निर्भर हैं। उत्तर प्रदेश की चीनी मिलें भी अब एथेनॉल और बिजली उत्पादन की ओर बढ़ रही हैं। केंद्र सरकार के एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से चीनी मिलों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला है।
युवाओं के लिए करियर के अवसर
चीनी प्रौद्योगिकी, शुगर इंजीनियरिंग और अल्कोहल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में करियर के अच्छे अवसर हैं। ऐसी अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं से भारतीय विशेषज्ञों और इंजीनियरों को विदेश में काम करने के मौके भी मिलते हैं। कानपुर का एनएसआई इन क्षेत्रों में प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम चलाता है।
बगास से बिजली: पर्यावरण के लिए फायदेमंद
गन्ने की खोई (बगास) से बिजली बनाना पर्यावरण के लिहाज से भी फायदेमंद माना जाता है। यह एक नवीकरणीय ईंधन है, क्योंकि हर साल नई फसल से फिर खोई मिलती है। इससे कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है। अफ्रीका के कई देशों में बिजली की कमी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में चीनी मिल से पैदा अतिरिक्त बिजली को राष्ट्रीय ग्रिड में देना कांगो के लिए भी लाभदायक हो सकता है। यही मॉडल भारत में भी कई चीनी मिलें अपना चुकी हैं।
एथेनॉल का बढ़ता महत्व
दुनिया भर में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का चलन बढ़ रहा है, ताकि कच्चे तेल के आयात और प्रदूषण को कम किया जा सके। भारत ने भी पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य तय किए हैं। गन्ने से बनने वाला एथेनॉल इस कार्यक्रम का प्रमुख स्रोत है। कांगो परियोजना के दूसरे चरण में एथेनॉल उत्पादन जोड़ने से वहां भी ईंधन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में मदद मिल सकती है।
कानपुर के लिए गर्व की बात
कानपुर को आमतौर पर चमड़ा, कपड़ा और उद्योगों के शहर के रूप में जाना जाता है, लेकिन शिक्षा और शोध के क्षेत्र में भी शहर का बड़ा नाम है। आईआईटी कानपुर, चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, एचबीटीयू और राष्ट्रीय शर्करा संस्थान जैसे संस्थान शहर की पहचान हैं। जब कानपुर की विशेषज्ञता विदेश में किसी बड़ी परियोजना की नींव बनती है, तो यह पूरे शहर के लिए गर्व का विषय है।
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निष्कर्ष
कांगो में बनने वाले एकीकृत चीनी परिसर में कानपुर के विशेषज्ञ की तकनीकी भूमिका शहर के लिए गर्व की बात है। चीनी, बिजली और एथेनॉल को एक साथ जोड़ने वाली यह परियोजना अफ्रीका में भारतीय तकनीक और कंपनियों के लिए नए दरवाजे खोलेगी। कानपुर की चीनी विशेषज्ञता एक बार फिर दुनिया के नक्शे पर है।
कानपुर की हर खबर के लिए कानपुर लाइव के साथ जुड़े रहें।
कानपुर: अफ्रीकी देश कांगो में बनेगा एकीकृत चीनी परिसर, कानपुर के चीनी विशेषज्ञ देंगे तकनीकी मदद, भारतीय कंपनियों के लिए खुलेंगे रास्ते
कानपुर की चीनी तकनीक अब अफ्रीका में भी अपनी छाप छोड़ेगी। मध्य अफ्रीकी देश कांगो गणराज्य में एक एकीकृत चीनी परिसर (इंटीग्रेटेड शुगर कॉम्प्लेक्स) बनाया जाएगा, जिसके लिए कानपुर स्थित एनएसआई के पूर्व निदेशक प्रो. नरेंद्र मोहन तकनीकी और पेशेवर सहायता देंगे।
इस परियोजना का मकसद कांगो की घरेलू चीनी जरूरतें पूरी करना और पड़ोसी मध्य अफ्रीकी देशों के बाजारों में भी चीनी की आपूर्ति करना है।
दो चरणों में बनेगा परिसर
पहला चरण:
2,500 टन प्रतिदिन गन्ना पेराई क्षमता वाली चीनी मिल।
मिल से पैदा होने वाली अतिरिक्त बिजली राष्ट्रीय पावर ग्रिड को दी जाएगी।
दूसरा चरण:
पेराई क्षमता बढ़ाकर 3,500 टन प्रतिदिन की जाएगी।
एथेनॉल उत्पादन भी शुरू किया जाएगा।
एकीकृत चीनी परिसर क्या होता है
पारंपरिक चीनी मिल में सिर्फ गन्ने से चीनी बनाई जाती है। लेकिन एकीकृत चीनी परिसर में गन्ने के हर हिस्से का इस्तेमाल होता है:
चीनी: गन्ने के रस से चीनी।
बिजली: गन्ने की खोई (बगास) को जलाकर बिजली बनाई जाती है, जिसे को-जनरेशन कहते हैं। मिल अपनी जरूरत की बिजली खुद बनाती है और अतिरिक्त बिजली ग्रिड को बेचती है।
एथेनॉल: शीरे (मोलासेस) या गन्ने के रस से एथेनॉल बनता है, जिसे पेट्रोल में मिलाया जा सकता है।
खाद: मिल के अपशिष्ट से जैविक खाद बनाई जा सकती है।
इससे मिल की आमदनी के कई स्रोत बनते हैं और कुछ भी बर्बाद नहीं होता।
भारतीय कंपनियों के लिए अवसर
रिपोर्ट के अनुसार इस परियोजना से भारत के लिए कई अवसर खुलेंगे:
मशीनरी निर्यात: भारतीय चीनी मशीनरी निर्माता अपने उपकरण निर्यात कर सकेंगे।
इंजीनियरिंग: भारतीय इंजीनियरिंग कंपनियां डिजाइन और निर्माण में भूमिका निभा सकेंगी।
तकनीक हस्तांतरण: भारतीय तकनीक और विशेषज्ञता अफ्रीका तक पहुंचेगी।
कमीशनिंग और संचालन: भारतीय विशेषज्ञ मिल चालू करने, प्रशिक्षण देने और संचालन प्रबंधन में योगदान दे सकेंगे।
कानपुर: चीनी तकनीक का गढ़
कानपुर का राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, एनएसआई) चीनी प्रौद्योगिकी और चीनी इंजीनियरिंग के क्षेत्र में देश का प्रमुख संस्थान है। यहां से प्रशिक्षित विशेषज्ञ देश और दुनिया की चीनी मिलों में काम करते हैं। संस्थान कई देशों को चीनी उद्योग से जुड़ी तकनीकी सलाह और प्रशिक्षण देता रहा है। अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका के कई देशों के छात्र भी यहां प्रशिक्षण लेने आते हैं।
नोट: रिपोर्ट में संस्थान का संक्षिप्त नाम 'एनएसआई' बताया गया है और प्रो. नरेंद्र मोहन को उसका पूर्व निदेशक बताया गया है। कांगो के साथ समझौते की शर्तों, लागत और समय सीमा की जानकारी रिपोर्ट में नहीं दी गई है।
कांगो गणराज्य: एक नजर में
कांगो गणराज्य मध्य अफ्रीका का एक देश है, जिसकी राजधानी ब्राजाविल है। इसे इसके बड़े पड़ोसी देश 'डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो' से अलग पहचानने के लिए 'कांगो-ब्राजाविल' भी कहा जाता है। देश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तेल पर निर्भर है और यह खेती और उद्योग को बढ़ावा देकर अर्थव्यवस्था में विविधता लाना चाहता है। चीनी परिसर इसी दिशा में एक कदम हो सकता है।
भारत-अफ्रीका संबंधों को मजबूती
भारत और अफ्रीकी देशों के बीच व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। भारत अफ्रीकी देशों को कृषि, सिंचाई, दवाइयों और प्रशिक्षण के क्षेत्र में मदद देता रहा है। चीनी उद्योग में भारत की विशेषज्ञता विश्वस्तरीय है, क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल है। ऐसे में अफ्रीका में चीनी परियोजनाओं में भारतीय तकनीक की भागीदारी 'ग्लोबल साउथ' के देशों के बीच सहयोग का अच्छा उदाहरण है।
उत्तर प्रदेश और गन्ना
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है। यहां सैकड़ों चीनी मिलें हैं और लाखों किसान गन्ने की खेती पर निर्भर हैं। उत्तर प्रदेश की चीनी मिलें भी अब एथेनॉल और बिजली उत्पादन की ओर बढ़ रही हैं। केंद्र सरकार के एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से चीनी मिलों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला है।
युवाओं के लिए करियर के अवसर
चीनी प्रौद्योगिकी, शुगर इंजीनियरिंग और अल्कोहल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में करियर के अच्छे अवसर हैं। ऐसी अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं से भारतीय विशेषज्ञों और इंजीनियरों को विदेश में काम करने के मौके भी मिलते हैं। कानपुर का एनएसआई इन क्षेत्रों में प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम चलाता है।
बगास से बिजली: पर्यावरण के लिए फायदेमंद
गन्ने की खोई (बगास) से बिजली बनाना पर्यावरण के लिहाज से भी फायदेमंद माना जाता है। यह एक नवीकरणीय ईंधन है, क्योंकि हर साल नई फसल से फिर खोई मिलती है। इससे कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है। अफ्रीका के कई देशों में बिजली की कमी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में चीनी मिल से पैदा अतिरिक्त बिजली को राष्ट्रीय ग्रिड में देना कांगो के लिए भी लाभदायक हो सकता है। यही मॉडल भारत में भी कई चीनी मिलें अपना चुकी हैं।
एथेनॉल का बढ़ता महत्व
दुनिया भर में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का चलन बढ़ रहा है, ताकि कच्चे तेल के आयात और प्रदूषण को कम किया जा सके। भारत ने भी पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य तय किए हैं। गन्ने से बनने वाला एथेनॉल इस कार्यक्रम का प्रमुख स्रोत है। कांगो परियोजना के दूसरे चरण में एथेनॉल उत्पादन जोड़ने से वहां भी ईंधन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में मदद मिल सकती है।
कानपुर के लिए गर्व की बात
कानपुर को आमतौर पर चमड़ा, कपड़ा और उद्योगों के शहर के रूप में जाना जाता है, लेकिन शिक्षा और शोध के क्षेत्र में भी शहर का बड़ा नाम है। आईआईटी कानपुर, चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, एचबीटीयू और राष्ट्रीय शर्करा संस्थान जैसे संस्थान शहर की पहचान हैं। जब कानपुर की विशेषज्ञता विदेश में किसी बड़ी परियोजना की नींव बनती है, तो यह पूरे शहर के लिए गर्व का विषय है।
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कानपुर: कपिल देव बोले- प्लान ए सिर्फ जीत का होना चाहिए (एडिटर: kanpur.live पर इस खबर का लिंक जोड़ें)
कानपुर: पीएसआईटी टेक एक्सपो में सेना के लिए एआई वॉकी-टॉकी (लिंक जोड़ें)
कानपुर देहात: आलू के बीज पर 1,000 रुपये प्रति क्विंटल अनुदान (लिंक जोड़ें)
निष्कर्ष
कांगो में बनने वाले एकीकृत चीनी परिसर में कानपुर के विशेषज्ञ की तकनीकी भूमिका शहर के लिए गर्व की बात है। चीनी, बिजली और एथेनॉल को एक साथ जोड़ने वाली यह परियोजना अफ्रीका में भारतीय तकनीक और कंपनियों के लिए नए दरवाजे खोलेगी। कानपुर की चीनी विशेषज्ञता एक बार फिर दुनिया के नक्शे पर है।
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