ब्रेकिंग न्यूज़
India's Skyroot Aerospace wins two-launch order from US firm Reflect Orbital | Model Mission Shakti Kendra opens at Kanpur's Badshahinaka police station | India-New Zealand FTA comes into force; 100% duty-free access for Indian exports, new visa pathways | PLFS September 2026: Unemployment rate falls to 5%, urban female participation rises | Asian Para Games 2026: India reaches 30 medals; Deepthi Jeevanji, Simran set Games records | Global Hunger Index 2026: India ranks 100th of 122 countries, child wasting a concern | PM Modi inaugurates five projects worth ₹3,350 crore in Ladakh | Rain washes out Bengaluru decider, India-West Indies T20I series ends 2-2
K
Kanpur.live
कानपुर की आवाज़ | Voice of Kanpur

चीन 2028 तक बनाएगा मंगल ग्रह का पहला एआई आधारित भूवैज्ञानिक नक्शा, तियानवेन-3 मिशन से लाएगा लाल ग्रह की मिट्टी

China plans first AI-driven geological map of entire Mars by 2028 ahead of Tianwen-3 sample return

Kanpur Live News Desk ·

WhatsApp पर भेजेंFacebookX
चीन 2028 तक बनाएगा मंगल ग्रह का पहला एआई आधारित भूवैज्ञानिक नक्शा, तियानवेन-3 मिशन से लाएगा लाल ग्रह की मिट्टी
अंतरिक्ष की दुनिया में एक नई और दिलचस्प घोषणा सामने आई है। चीन ने ऐलान किया है कि वह 2028 के अंत तक मंगल ग्रह की पूरी सतह का भूवैज्ञानिक नक्शा तैयार करेगा। खास बात यह है कि यह नक्शा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से बनाया जाएगा और चीन का दावा है कि यह दुनिया का पहला एआई आधारित मंगल भूवैज्ञानिक नक्शा होगा। यह परियोजना चीन के अगले बड़े मंगल मिशन तियानवेन-3 की तैयारी का अहम हिस्सा है, जिसका मकसद मंगल ग्रह की मिट्टी और चट्टानों के नमूने धरती पर लाना है। इस घोषणा को अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती अंतरिक्ष होड़ के नजरिये से भी देखा जा रहा है। कौन बना रहा है यह नक्शा चीन के अगले मंगल मिशन तियानवेन-3 के मुख्य वैज्ञानिक और चीनी विज्ञान अकादमी के सदस्य होउ झेंगछियान ने सोमवार को बताया कि यह नक्शा मंगल ग्रह की पूरी सतह को कवर करेगा और इसका लक्ष्य मंगल के भूवैज्ञानिक युगों के लिए वैश्विक मानक बनना है। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार यह मंगल का पहला एआई आधारित भूवैज्ञानिक नक्शा होगा। क्या-क्या होगा इस परियोजना में 2028 के अंत तक विशेषज्ञ तीन तरह के उत्पाद तैयार करने की उम्मीद कर रहे हैं: पूरे मंगल का वैश्विक भूवैज्ञानिक नक्शा: यह 1:50 लाख के पैमाने पर होगा। लैंडिंग स्थलों के विस्तृत नक्शे: तियानवेन-3 के संभावित उतरने वाले क्षेत्रों के 1:50,000 पैमाने के बेहद बारीक नक्शे। विशेष एटलस की श्रृंखला: मंगल के अलग-अलग पहलुओं पर केंद्रित नक्शों का संग्रह। चीनी वैज्ञानिकों का कहना है कि इस परियोजना में अपनाई गई प्रक्रिया भविष्य में चंद्रमा, शुक्र और क्षुद्रग्रहों जैसे दूसरे खगोलीय पिंडों के नक्शे बनाने के लिए एक मॉडल का काम कर सकती है। कैसे काम करेगा एआई किसी ग्रह का भूवैज्ञानिक नक्शा बनाना बेहद जटिल काम है। इसमें यह पहचानना होता है कि ग्रह की सतह पर कौन-सी चट्टानें कहां हैं, कौन-सा क्षेत्र कितना पुराना है, कहां ज्वालामुखी रहे होंगे, कहां पानी बहा होगा और कहां उल्कापिंडों के टकराने से गड्ढे बने हैं। अब तक यह काम मुख्य रूप से वैज्ञानिक तस्वीरों और आंकड़ों को देखकर हाथ से करते थे, जिसमें सालों लग जाते थे। एआई की मदद से रिमोट सेंसिंग यानी दूर से लिए गए आंकड़ों का विश्लेषण तेजी से किया जा सकेगा और ग्रह की भूवैज्ञानिक विशेषताओं की पहचान की जा सकेगी। इस नए नक्शे में चीन के झुरोंग रोवर के आंकड़ों को कक्षा से ली गई तस्वीरों, रडार, गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय मापों के साथ जोड़ा जाएगा, जिनमें चीन, अमेरिका और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के यानों से मिले आंकड़े भी शामिल होंगे। मंगल पर प्राचीन महासागर के सबूत इस नक्शे में झुरोंग रोवर की खोजों को भी शामिल किया जाएगा। झुरोंग से मिले आंकड़ों ने संकेत दिए हैं कि करीब 3.5 अरब साल पहले मंगल पर महाद्वीप जितना बड़ा एक प्राचीन महासागर रहा होगा, और लगभग 1.6 अरब साल पहले थोड़े समय के लिए बाढ़ जैसी स्थिति भी बनी होगी। ये खोजें बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पानी को जीवन का आधार माना जाता है। अगर मंगल पर कभी बड़े पैमाने पर पानी था, तो यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या वहां कभी सूक्ष्म जीवन रहा होगा। मंगल के जल इतिहास को समझना वैज्ञानिकों के लिए इस सवाल का जवाब खोजने की दिशा में अहम कदम है। मंगल के भूवैज्ञानिक युगों की नई व्यवस्था इस परियोजना का एक बड़ा उद्देश्य मंगल के भूवैज्ञानिक समय को बांटने की नई व्यवस्था तैयार करना भी है। वर्तमान व्यवस्था मुख्य रूप से सतह पर मौजूद गड्ढों की संख्या के आधार पर बनी है, न कि सटीक तारीखों के आधार पर। चीन इसकी जगह अपनी विकसित की हुई ज्यादा सटीक कालक्रम व्यवस्था प्रस्तावित कर रहा है और चाहता है कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिले। सरल शब्दों में समझें तो जिस तरह धरती के इतिहास को अलग-अलग युगों में बांटा गया है, उसी तरह वैज्ञानिक मंगल के इतिहास को भी युगों में बांटते हैं। चीन इस बंटवारे का एक नया और ज्यादा सटीक तरीका दुनिया के सामने रखना चाहता है। तियानवेन-3: मंगल से मिट्टी लाने का मिशन यह पूरा नक्शा तियानवेन-3 मिशन की तैयारी का हिस्सा है। चीन 2028 के अंत में तियानवेन-3 मिशन लॉन्च करेगा, जिसका लक्ष्य मंगल से कम से कम 500 ग्राम नमूने इकट्ठा करके 2031 तक धरती पर लाना है। अगर यह मिशन सफल रहा, तो चीन मंगल से नमूने वापस लाने वाला पहला देश बन सकता है। मिशन की योजना के अनुसार इसमें दो प्रक्षेपण होंगे। पहले प्रक्षेपण में एक लैंडर और मंगल से उड़ान भरने वाला यान होगा, जबकि दूसरे में एक ऑर्बिटर और नमूनों को धरती पर लाने वाला मॉड्यूल होगा। विस्तृत नक्शा उतरने के लिए सबसे उपयुक्त जगह चुनने में मदद करेगा, ताकि वहां से वैज्ञानिक रूप से सबसे कीमती नमूने जुटाए जा सकें। मंगल पर उतरने वाला दूसरा देश बना था चीन चीन का झुरोंग रोवर मई 2021 में तियानवेन-1 मिशन के तहत मंगल पर उतरा था। इसके साथ ही चीन अमेरिका के बाद मंगल पर सफलतापूर्वक रोवर उतारने वाला दूसरा देश बन गया था। उस मिशन से मिले आंकड़े अब इस नई परियोजना की नींव बन रहे हैं। अमेरिका और चीन की अंतरिक्ष होड़ यह घोषणा ऐसे समय आई है, जब अमेरिका और चीन के बीच अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के साथ मिलकर मंगल से नमूने लाने की योजना बनाई थी, लेकिन बजट से जुड़े बदलावों के कारण उस मिशन की रूपरेखा प्रभावित हुई और नासा अब वैकल्पिक तरीकों पर विचार कर रहा है। ऐसे में चीन की यह योजना उसे मंगल अन्वेषण में आगे निकलने का मौका दे सकती है। हालांकि अंतरिक्ष विज्ञान में प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग भी होता है। यही वजह है कि चीन के नए नक्शे में अमेरिकी और यूरोपीय यानों के आंकड़ों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। नासा ने पहले भी बनाए हैं मंगल के नक्शे ऐसा नहीं है कि मंगल का यह पहला नक्शा होगा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अपने मार्स रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर जैसे यानों की मदद से पहले ही मंगल के नक्शे बना चुकी है। लेकिन चीन अपने नक्शे को दुनिया का पहला बुद्धिमान यानी एआई आधारित भूवैज्ञानिक नक्शा बता रहा है, जिसमें कई स्रोतों के आंकड़ों को एक साथ जोड़ा जाएगा। भारत के लिए क्या मायने भारत भी मंगल अन्वेषण के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुका है। इसरो का मंगलयान मिशन 2013 में लॉन्च हुआ था और 2014 में मंगल की कक्षा में पहुंचा था। भारत पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा तक पहुंचने वाला पहला देश बना था। इस मिशन की बेहद कम लागत ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था। दुनिया में जिस तरह मंगल और चंद्रमा अन्वेषण तेज हो रहा है, उसमें भारत के लिए भी कई अवसर हैं। चंद्रयान-3 की सफलता के बाद भारत की अंतरिक्ष क्षमता पर दुनिया का भरोसा बढ़ा है। अंतरिक्ष विज्ञान में एआई का बढ़ता उपयोग भारतीय वैज्ञानिकों और युवाओं के लिए भी नए क्षेत्र खोल रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान में एआई का बढ़ता दखल आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केवल मोबाइल ऐप या चैटबॉट तक सीमित नहीं है। अंतरिक्ष विज्ञान में भी इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। उपग्रहों से आने वाली लाखों तस्वीरों का विश्लेषण, नए ग्रहों और तारों की खोज, अंतरिक्ष यानों का स्वचालित संचालन और मौसम पूर्वानुमान जैसे कामों में एआई अहम भूमिका निभा रहा है। जो काम पहले वैज्ञानिकों की टीमें सालों में करती थीं, उसे एआई की मदद से कम समय में और ज्यादा सटीकता से किया जा सकता है। छात्रों और युवाओं के लिए प्रेरणा अंतरिक्ष विज्ञान, भूविज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का यह मेल उन छात्रों के लिए प्रेरणा है, जो विज्ञान और तकनीक में करियर बनाना चाहते हैं। आईआईटी कानपुर जैसे संस्थान अंतरिक्ष तकनीक और एआई से जुड़े शोध में सक्रिय रहे हैं। आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र में डेटा विश्लेषण, एआई, रोबोटिक्स और ग्रह विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों की मांग बढ़ने की उम्मीद है। मंगल ग्रह: कुछ रोचक तथ्य मंगल को उसकी लाल रंगत की वजह से 'लाल ग्रह' कहा जाता है। यह रंग उसकी सतह पर मौजूद आयरन ऑक्साइड यानी जंग जैसे तत्व के कारण है। मंगल पर सौरमंडल का सबसे ऊंचा ज्वालामुखी ओलंपस मॉन्स स्थित है। मंगल का एक दिन धरती के एक दिन से थोड़ा लंबा होता है। मंगल के दो छोटे चंद्रमा हैं, फोबोस और डीमोस। मंगल का आकार धरती से छोटा है और वहां गुरुत्वाकर्षण भी धरती के मुकाबले काफी कम है, इसलिए वहां इंसान का वजन धरती से कम महसूस होगा। मंगल का वातावरण बेहद पतला है और मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड से बना है। निष्कर्ष चीन का मंगल का एआई आधारित भूवैज्ञानिक नक्शा बनाने का लक्ष्य अंतरिक्ष विज्ञान में एक नया अध्याय साबित हो सकता है। अगर यह परियोजना और तियानवेन-3 मिशन सफल रहे, तो इससे लाल ग्रह के इतिहास, वहां पानी की मौजूदगी और जीवन की संभावनाओं के बारे में हमारी समझ काफी बढ़ सकती है। साथ ही यह घोषणा बताती है कि आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष की होड़ और तेज होने वाली है। विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष से जुड़ी हर दिलचस्प खबर के लिए कानपुर लाइव पढ़ते रहें।

चीन 2028 तक बनाएगा मंगल ग्रह का पहला एआई आधारित भूवैज्ञानिक नक्शा, तियानवेन-3 मिशन से लाएगा लाल ग्रह की मिट्टी

अंतरिक्ष की दुनिया में एक नई और दिलचस्प घोषणा सामने आई है। चीन ने ऐलान किया है कि वह 2028 के अंत तक मंगल ग्रह की पूरी सतह का भूवैज्ञानिक नक्शा तैयार करेगा। खास बात यह है कि यह नक्शा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से बनाया जाएगा और चीन का दावा है कि यह दुनिया का पहला एआई आधारित मंगल भूवैज्ञानिक नक्शा होगा। यह परियोजना चीन के अगले बड़े मंगल मिशन तियानवेन-3 की तैयारी का अहम हिस्सा है, जिसका मकसद मंगल ग्रह की मिट्टी और चट्टानों के नमूने धरती पर लाना है। इस घोषणा को अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती अंतरिक्ष होड़ के नजरिये से भी देखा जा रहा है। कौन बना रहा है यह नक्शा चीन के अगले मंगल मिशन तियानवेन-3 के मुख्य वैज्ञानिक और चीनी विज्ञान अकादमी के सदस्य होउ झेंगछियान ने सोमवार को बताया कि यह नक्शा मंगल ग्रह की पूरी सतह को कवर करेगा और इसका लक्ष्य मंगल के भूवैज्ञानिक युगों के लिए वैश्विक मानक बनना है। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार यह मंगल का पहला एआई आधारित भूवैज्ञानिक नक्शा होगा। क्या-क्या होगा इस परियोजना में 2028 के अंत तक विशेषज्ञ तीन तरह के उत्पाद तैयार करने की उम्मीद कर रहे हैं: पूरे मंगल का वैश्विक भूवैज्ञानिक नक्शा: यह 1:50 लाख के पैमाने पर होगा। लैंडिंग स्थलों के विस्तृत नक्शे: तियानवेन-3 के संभावित उतरने वाले क्षेत्रों के 1:50,000 पैमाने के बेहद बारीक नक्शे। विशेष एटलस की श्रृंखला: मंगल के अलग-अलग पहलुओं पर केंद्रित नक्शों का संग्रह। चीनी वैज्ञानिकों का कहना है कि इस परियोजना में अपनाई गई प्रक्रिया भविष्य में चंद्रमा, शुक्र और क्षुद्रग्रहों जैसे दूसरे खगोलीय पिंडों के नक्शे बनाने के लिए एक मॉडल का काम कर सकती है। कैसे काम करेगा एआई किसी ग्रह का भूवैज्ञानिक नक्शा बनाना बेहद जटिल काम है। इसमें यह पहचानना होता है कि ग्रह की सतह पर कौन-सी चट्टानें कहां हैं, कौन-सा क्षेत्र कितना पुराना है, कहां ज्वालामुखी रहे होंगे, कहां पानी बहा होगा और कहां उल्कापिंडों के टकराने से गड्ढे बने हैं। अब तक यह काम मुख्य रूप से वैज्ञानिक तस्वीरों और आंकड़ों को देखकर हाथ से करते थे, जिसमें सालों लग जाते थे। एआई की मदद से रिमोट सेंसिंग यानी दूर से लिए गए आंकड़ों का विश्लेषण तेजी से किया जा सकेगा और ग्रह की भूवैज्ञानिक विशेषताओं की पहचान की जा सकेगी। इस नए नक्शे में चीन के झुरोंग रोवर के आंकड़ों को कक्षा से ली गई तस्वीरों, रडार, गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय मापों के साथ जोड़ा जाएगा, जिनमें चीन, अमेरिका और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के यानों से मिले आंकड़े भी शामिल होंगे। मंगल पर प्राचीन महासागर के सबूत इस नक्शे में झुरोंग रोवर की खोजों को भी शामिल किया जाएगा। झुरोंग से मिले आंकड़ों ने संकेत दिए हैं कि करीब 3.5 अरब साल पहले मंगल पर महाद्वीप जितना बड़ा एक प्राचीन महासागर रहा होगा, और लगभग 1.6 अरब साल पहले थोड़े समय के लिए बाढ़ जैसी स्थिति भी बनी होगी। ये खोजें बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पानी को जीवन का आधार माना जाता है। अगर मंगल पर कभी बड़े पैमाने पर पानी था, तो यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या वहां कभी सूक्ष्म जीवन रहा होगा। मंगल के जल इतिहास को समझना वैज्ञानिकों के लिए इस सवाल का जवाब खोजने की दिशा में अहम कदम है। मंगल के भूवैज्ञानिक युगों की नई व्यवस्था इस परियोजना का एक बड़ा उद्देश्य मंगल के भूवैज्ञानिक समय को बांटने की नई व्यवस्था तैयार करना भी है। वर्तमान व्यवस्था मुख्य रूप से सतह पर मौजूद गड्ढों की संख्या के आधार पर बनी है, न कि सटीक तारीखों के आधार पर। चीन इसकी जगह अपनी विकसित की हुई ज्यादा सटीक कालक्रम व्यवस्था प्रस्तावित कर रहा है और चाहता है कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिले। सरल शब्दों में समझें तो जिस तरह धरती के इतिहास को अलग-अलग युगों में बांटा गया है, उसी तरह वैज्ञानिक मंगल के इतिहास को भी युगों में बांटते हैं। चीन इस बंटवारे का एक नया और ज्यादा सटीक तरीका दुनिया के सामने रखना चाहता है। तियानवेन-3: मंगल से मिट्टी लाने का मिशन यह पूरा नक्शा तियानवेन-3 मिशन की तैयारी का हिस्सा है। चीन 2028 के अंत में तियानवेन-3 मिशन लॉन्च करेगा, जिसका लक्ष्य मंगल से कम से कम 500 ग्राम नमूने इकट्ठा करके 2031 तक धरती पर लाना है। अगर यह मिशन सफल रहा, तो चीन मंगल से नमूने वापस लाने वाला पहला देश बन सकता है। मिशन की योजना के अनुसार इसमें दो प्रक्षेपण होंगे। पहले प्रक्षेपण में एक लैंडर और मंगल से उड़ान भरने वाला यान होगा, जबकि दूसरे में एक ऑर्बिटर और नमूनों को धरती पर लाने वाला मॉड्यूल होगा। विस्तृत नक्शा उतरने के लिए सबसे उपयुक्त जगह चुनने में मदद करेगा, ताकि वहां से वैज्ञानिक रूप से सबसे कीमती नमूने जुटाए जा सकें। मंगल पर उतरने वाला दूसरा देश बना था चीन चीन का झुरोंग रोवर मई 2021 में तियानवेन-1 मिशन के तहत मंगल पर उतरा था। इसके साथ ही चीन अमेरिका के बाद मंगल पर सफलतापूर्वक रोवर उतारने वाला दूसरा देश बन गया था। उस मिशन से मिले आंकड़े अब इस नई परियोजना की नींव बन रहे हैं। अमेरिका और चीन की अंतरिक्ष होड़ यह घोषणा ऐसे समय आई है, जब अमेरिका और चीन के बीच अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के साथ मिलकर मंगल से नमूने लाने की योजना बनाई थी, लेकिन बजट से जुड़े बदलावों के कारण उस मिशन की रूपरेखा प्रभावित हुई और नासा अब वैकल्पिक तरीकों पर विचार कर रहा है। ऐसे में चीन की यह योजना उसे मंगल अन्वेषण में आगे निकलने का मौका दे सकती है। हालांकि अंतरिक्ष विज्ञान में प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग भी होता है। यही वजह है कि चीन के नए नक्शे में अमेरिकी और यूरोपीय यानों के आंकड़ों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। नासा ने पहले भी बनाए हैं मंगल के नक्शे ऐसा नहीं है कि मंगल का यह पहला नक्शा होगा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अपने मार्स रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर जैसे यानों की मदद से पहले ही मंगल के नक्शे बना चुकी है। लेकिन चीन अपने नक्शे को दुनिया का पहला बुद्धिमान यानी एआई आधारित भूवैज्ञानिक नक्शा बता रहा है, जिसमें कई स्रोतों के आंकड़ों को एक साथ जोड़ा जाएगा। भारत के लिए क्या मायने भारत भी मंगल अन्वेषण के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुका है। इसरो का मंगलयान मिशन 2013 में लॉन्च हुआ था और 2014 में मंगल की कक्षा में पहुंचा था। भारत पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा तक पहुंचने वाला पहला देश बना था। इस मिशन की बेहद कम लागत ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था। दुनिया में जिस तरह मंगल और चंद्रमा अन्वेषण तेज हो रहा है, उसमें भारत के लिए भी कई अवसर हैं। चंद्रयान-3 की सफलता के बाद भारत की अंतरिक्ष क्षमता पर दुनिया का भरोसा बढ़ा है। अंतरिक्ष विज्ञान में एआई का बढ़ता उपयोग भारतीय वैज्ञानिकों और युवाओं के लिए भी नए क्षेत्र खोल रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान में एआई का बढ़ता दखल आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केवल मोबाइल ऐप या चैटबॉट तक सीमित नहीं है। अंतरिक्ष विज्ञान में भी इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। उपग्रहों से आने वाली लाखों तस्वीरों का विश्लेषण, नए ग्रहों और तारों की खोज, अंतरिक्ष यानों का स्वचालित संचालन और मौसम पूर्वानुमान जैसे कामों में एआई अहम भूमिका निभा रहा है। जो काम पहले वैज्ञानिकों की टीमें सालों में करती थीं, उसे एआई की मदद से कम समय में और ज्यादा सटीकता से किया जा सकता है। छात्रों और युवाओं के लिए प्रेरणा अंतरिक्ष विज्ञान, भूविज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का यह मेल उन छात्रों के लिए प्रेरणा है, जो विज्ञान और तकनीक में करियर बनाना चाहते हैं। आईआईटी कानपुर जैसे संस्थान अंतरिक्ष तकनीक और एआई से जुड़े शोध में सक्रिय रहे हैं। आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र में डेटा विश्लेषण, एआई, रोबोटिक्स और ग्रह विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों की मांग बढ़ने की उम्मीद है। मंगल ग्रह: कुछ रोचक तथ्य मंगल को उसकी लाल रंगत की वजह से 'लाल ग्रह' कहा जाता है। यह रंग उसकी सतह पर मौजूद आयरन ऑक्साइड यानी जंग जैसे तत्व के कारण है। मंगल पर सौरमंडल का सबसे ऊंचा ज्वालामुखी ओलंपस मॉन्स स्थित है। मंगल का एक दिन धरती के एक दिन से थोड़ा लंबा होता है। मंगल के दो छोटे चंद्रमा हैं, फोबोस और डीमोस। मंगल का आकार धरती से छोटा है और वहां गुरुत्वाकर्षण भी धरती के मुकाबले काफी कम है, इसलिए वहां इंसान का वजन धरती से कम महसूस होगा। मंगल का वातावरण बेहद पतला है और मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड से बना है। निष्कर्ष चीन का मंगल का एआई आधारित भूवैज्ञानिक नक्शा बनाने का लक्ष्य अंतरिक्ष विज्ञान में एक नया अध्याय साबित हो सकता है। अगर यह परियोजना और तियानवेन-3 मिशन सफल रहे, तो इससे लाल ग्रह के इतिहास, वहां पानी की मौजूदगी और जीवन की संभावनाओं के बारे में हमारी समझ काफी बढ़ सकती है। साथ ही यह घोषणा बताती है कि आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष की होड़ और तेज होने वाली है। विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष से जुड़ी हर दिलचस्प खबर के लिए कानपुर लाइव पढ़ते रहें।

यह खबर अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें:

WhatsApp पर भेजेंFacebookX

किसी तथ्य में गलती दिखे तो हमें बताएं — हमारी संपादकीय नीति पढ़ें।

और पढ़ें | Related News

सबसे ज़्यादा पढ़ी गई | Most Read

  1. 1वृद्धावस्था-विधवा-दिव्यांग पेंशन योजनाओं के नाम बदले, दिव्यांगों को बड़ी राहत
  2. 2भारतीय स्टार्टअप स्काईरूट को अमेरिकी कंपनी से दो लॉन्च का ऑर्डर
  3. 3कानपुर के बादशाहीनाका थाने में मॉडल मिशन शक्ति केंद्र शुरू
  4. 4भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता लागू, भारतीय सामान को 100% शुल्क मुक्त पहुंच
  5. 5सितंबर में बेरोजगारी दर घटकर 5%, शहरों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी