Strained Relationships: Kanpur's Sharia Courts Receive Around 30 Cases a Month, Maintenance and Divorce Cases Rise
crime - Thu Sep 24

मुख्य बातें:
कानपुर में पारिवारिक विवाद, तलाक और भरण-पोषण (नफका) से जुड़े मामले बढ़ रहे हैं।
सुन्नी दारुलकजा, मोहकमा-ए-शरिया दारुलकजा और काउंसलिंग सेंटर्स के आंकड़ों के अनुसार हर महीने औसतन 30 मामले शरई अदालतों में पहुंच रहे हैं।
कई मामलों में इद्दत की अवधि के दौरान भी पत्नी को जरूरी खर्च नहीं दिया गया।
काजी और काउंसलर दोनों पक्षों को बुलाकर आपसी सहमति से मामले सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।
महिलाओं के पास देश के सामान्य कानून के तहत भी भरण-पोषण मांगने का विकल्प है।
कानपुर में रिश्तों में दरार और उससे जुड़े आर्थिक विवादों के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार तलाक और महिलाओं व बच्चों के भरण-पोषण, जिसे नफका कहा जाता है, से जुड़े मामले अब बड़ी संख्या में शरई अदालतों तक पहुंच रहे हैं। अपने और अपने बच्चों के हक के लिए महिलाएं इन अदालतों का दरवाजा खटखटा रही हैं।
हर महीने करीब 30 मामले
रिपोर्टों के अनुसार शहर की सुन्नी दारुलकजा, मोहकमा-ए-शरिया दारुलकजा और काउंसलिंग सेंटर्स से मिले आंकड़े बताते हैं कि हर महीने औसतन 30 ऐसे मामले शरई अदालत तक पहुंच रहे हैं। इनमें से कई मामलों में यह बात सामने आई है कि पतियों ने इद्दत की अवधि के दौरान भी पत्नी का जरूरी खर्च नहीं उठाया।
शरई अदालतों में काजी और काउंसलर दोनों पक्षों को बुलाकर बातचीत कराते हैं और शरीअत के अनुसार फैसला कराने की कोशिश करते हैं।
नफका और इद्दत क्या है?
नफका का मतलब है भरण-पोषण, यानी खाना, कपड़ा और रहने का खर्च। इस्लामी व्यवस्था में पत्नी और बच्चों का नफका देना पति की जिम्मेदारी मानी जाती है।
इद्दत वह अवधि है जो तलाक या पति की मृत्यु के बाद महिला को पूरी करनी होती है। तलाक के मामले में यह आम तौर पर करीब तीन महीने की होती है। इस दौरान महिला का खर्च उठाना पति का फर्ज माना जाता है।
तीन मामले जो तस्वीर दिखाते हैं
रिपोर्टों में शहर के तीन ऐसे मामलों का जिक्र है, जो इस समस्या की गंभीरता बताते हैं:
जाजमऊ का मामला: यहां की एक महिला का पति से विवाद के बाद तलाक हो गया। शरीअत के अनुसार इद्दत के तीन महीने के दौरान नफका देना जरूरी था, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार पति ने कोई खर्च नहीं दिया। महिला को शरई अदालत जाना पड़ा, जहां उलेमा ने पति को इद्दत का पूरा खर्च देने का आदेश दिया।
चमनगंज का मामला: पति से अनबन के बाद एक महिला अपने दो छोटे बच्चों के साथ आठ महीने से मायके में रह रही है। रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान पति ने न तो हालचाल पूछा और न ही बच्चों की पढ़ाई, दूध या दवा के लिए कोई पैसा भेजा। महिला ने शरई अदालत में अर्जी देकर मांग की है कि बच्चों की परवरिश की आर्थिक जिम्मेदारी पति पर तय की जाए।
बाबूपुरवा का मामला: रिपोर्ट के अनुसार यहां एक व्यक्ति ने पहली पत्नी को बताए बिना दूसरी शादी कर ली और पहली पत्नी व चार साल की बेटी को घर से बेसहारा कर दिया। बच्ची की स्कूल फीस तक नहीं दी जा रही। शरई अदालत ने पति को तलब किया है, ताकि बच्ची के भविष्य के खर्च पर फैसला हो सके।
उलेमा क्या कहते हैं
सुन्नी दारुलकजा रजबी रोड के नायब शहर काजी कारी सगीर आलम हबीबी का कहना है कि पुरुषों में जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। उनके अनुसार शरीअत में पत्नी और बच्चों का खर्च देना पति का फर्ज है, फिर भी महिलाओं को अपने ही हक के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
दारुलकजा के अध्यक्ष मुफ्ती अब्दुल रशीद ने बताया कि ऐसे मामलों में आपसी सहमति और काउंसलिंग के जरिए महिलाओं को उनका हक दिलाने की कोशिश की जाती है। उनके अनुसार हर महीने ऐसे मामले आ रहे हैं और ज्यादातर का निपटारा बातचीत से कराया जाता है।
शरई अदालत की भूमिका और सीमाएं
दारुलकजा या शरई अदालतें समुदाय के भीतर विवादों को आपसी बातचीत और मध्यस्थता से सुलझाने का काम करती हैं। इनका फायदा यह है कि मामले जल्दी, कम खर्च में और परिवार की निजता बनाए रखते हुए सुलझ सकते हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि ये सरकारी अदालतें नहीं हैं। इनके फैसले दोनों पक्षों की सहमति पर टिके होते हैं और इन्हें देश के कानून की तरह लागू नहीं कराया जा सकता। अगर एक पक्ष फैसला न माने, तो महिला को कानूनी अदालत का रास्ता अपनाना पड़ता है।
महिलाओं के कानूनी अधिकार
देश का कानून हर महिला को, चाहे वह किसी भी धर्म की हो, अपने और अपने बच्चों के भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार देता है:
भरण-पोषण का कानूनी प्रावधान: पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 की जगह अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में यह प्रावधान मौजूद है। इसके तहत पत्नी, बच्चे और माता-पिता भरण-पोषण मांग सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि मुस्लिम महिलाएं भी इस सामान्य कानून के तहत अपने पति से भरण-पोषण का दावा कर सकती हैं।
परिवार न्यायालय: कानपुर में परिवार न्यायालय ऐसे मामलों की सुनवाई करता है।
मुफ्त कानूनी मदद: जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) आर्थिक रूप से कमजोर लोगों और महिलाओं को मुफ्त वकील उपलब्ध कराता है।
महिला हेल्पलाइन 181: घरेलू हिंसा या उत्पीड़न की स्थिति में मदद के लिए।
बच्चों पर सबसे बड़ा असर
पति-पत्नी के विवाद का सबसे बड़ा असर बच्चों पर पड़ता है। खर्च न मिलने से उनकी पढ़ाई छूट सकती है, सेहत पर असर पड़ता है और मानसिक तनाव भी बढ़ता है। काउंसलर मानते हैं कि विवाद कैसा भी हो, बच्चों की जरूरतें कभी भी टकराव का हिस्सा नहीं बननी चाहिए।
काउंसलिंग क्यों है जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि कई विवाद शुरुआत में ही बातचीत से सुलझ सकते हैं। आर्थिक तंगी, संयुक्त परिवार का दबाव, संवाद की कमी और एक-दूसरे पर भरोसे की कमी अक्सर विवाद की बड़ी वजह बनते हैं। समय पर काउंसलिंग मिलने से रिश्ता बच सकता है, और अगर अलगाव तय हो, तो भी वह सम्मान और जिम्मेदारी के साथ हो सकता है।
kanpur.live समाज से जुड़े ऐसे मुद्दों पर आगे भी रिपोर्ट करता रहेगा।
समाज की भूमिका
जानकारों का कहना है कि परिवार टूटने की स्थिति में समाज और रिश्तेदारों की भूमिका भी बहुत अहम होती है। अगर शुरुआती दौर में ही बड़े-बुजुर्ग, धार्मिक रहनुमा या काउंसलर बीच में आकर बातचीत कराएं, तो कई मामले अदालत तक पहुंचने से पहले ही सुलझ सकते हैं। साथ ही, महिलाओं को उनके अधिकारों की जानकारी देना भी जरूरी है, ताकि वे मजबूरी में चुप न रहें।
लड़कियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि लड़कियों की अच्छी शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता उन्हें ऐसे हालात में मजबूती से खड़े रहने की ताकत देती है। जो महिलाएं खुद कमाती हैं, वे बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ अपने हक की लड़ाई भी बेहतर ढंग से लड़ पाती हैं। सरकार की कौशल विकास योजनाएं और स्वयं सहायता समूह इस दिशा में मददगार हो सकते हैं।
kanpur.live की राय
पारिवारिक विवाद निजी होते हुए भी पूरे समाज को प्रभावित करते हैं। जरूरी है कि महिलाएं और बच्चे किसी भी हालत में बेसहारा न छोड़े जाएं। चाहे समुदाय के भीतर की व्यवस्था हो या देश की अदालतें, दोनों का मकसद कमजोर पक्ष को उसका हक दिलाना होना चाहिए। हम ऐसे विषयों पर संवेदनशीलता के साथ रिपोर्ट करते रहेंगे।
जरूरत पड़ने पर महिलाएं जिला प्रोबेशन कार्यालय और वन स्टॉप सेंटर से भी परामर्श और सहायता ले सकती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1. कानपुर की शरई अदालतों में हर महीने कितने मामले आ रहे हैं? रिपोर्टों के अनुसार औसतन करीब 30 मामले।
प्रश्न 2. नफका का मतलब क्या है? भरण-पोषण, यानी खाना, कपड़ा और रहने का खर्च।
प्रश्न 3. इद्दत कितने समय की होती है? तलाक के मामले में आम तौर पर करीब तीन महीने।
प्रश्न 4. क्या शरई अदालत का फैसला कानूनी रूप से लागू होता है? नहीं, यह आपसी सहमति पर आधारित होता है। कानूनी रूप से लागू कराने के लिए सरकारी अदालत जाना होता है।
प्रश्न 5. क्या मुस्लिम महिलाएं सामान्य कानून के तहत भरण-पोषण मांग सकती हैं? हां, सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2024 में यह स्पष्ट किया था।
प्रश्न 6. मुफ्त कानूनी मदद कहां मिलती है? जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) से, जो जिला न्यायालय परिसर में होता है।
प्रश्न 7. घरेलू हिंसा की स्थिति में कहां मदद मिलेगी? महिला हेल्पलाइन 181 या आपात स्थिति में 112 पर संपर्क करें।
स्रोत: दारुलकजा और काउंसलिंग सेंटर्स के आंकड़ों पर आधारित स्थानीय रिपोर्ट, 24 सितंबर 2026।
दरकते रिश्ते: कानपुर की शरई अदालतों में हर महीने करीब 30 मामले, नफका और तलाक के केस बढ़े; काउंसलिंग से सुलझाने की कोशिश
मुख्य बातें:
कानपुर में पारिवारिक विवाद, तलाक और भरण-पोषण (नफका) से जुड़े मामले बढ़ रहे हैं।
सुन्नी दारुलकजा, मोहकमा-ए-शरिया दारुलकजा और काउंसलिंग सेंटर्स के आंकड़ों के अनुसार हर महीने औसतन 30 मामले शरई अदालतों में पहुंच रहे हैं।
कई मामलों में इद्दत की अवधि के दौरान भी पत्नी को जरूरी खर्च नहीं दिया गया।
काजी और काउंसलर दोनों पक्षों को बुलाकर आपसी सहमति से मामले सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।
महिलाओं के पास देश के सामान्य कानून के तहत भी भरण-पोषण मांगने का विकल्प है।
कानपुर में रिश्तों में दरार और उससे जुड़े आर्थिक विवादों के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार तलाक और महिलाओं व बच्चों के भरण-पोषण, जिसे नफका कहा जाता है, से जुड़े मामले अब बड़ी संख्या में शरई अदालतों तक पहुंच रहे हैं। अपने और अपने बच्चों के हक के लिए महिलाएं इन अदालतों का दरवाजा खटखटा रही हैं।
हर महीने करीब 30 मामले
रिपोर्टों के अनुसार शहर की सुन्नी दारुलकजा, मोहकमा-ए-शरिया दारुलकजा और काउंसलिंग सेंटर्स से मिले आंकड़े बताते हैं कि हर महीने औसतन 30 ऐसे मामले शरई अदालत तक पहुंच रहे हैं। इनमें से कई मामलों में यह बात सामने आई है कि पतियों ने इद्दत की अवधि के दौरान भी पत्नी का जरूरी खर्च नहीं उठाया।
शरई अदालतों में काजी और काउंसलर दोनों पक्षों को बुलाकर बातचीत कराते हैं और शरीअत के अनुसार फैसला कराने की कोशिश करते हैं।
नफका और इद्दत क्या है?
नफका का मतलब है भरण-पोषण, यानी खाना, कपड़ा और रहने का खर्च। इस्लामी व्यवस्था में पत्नी और बच्चों का नफका देना पति की जिम्मेदारी मानी जाती है।
इद्दत वह अवधि है जो तलाक या पति की मृत्यु के बाद महिला को पूरी करनी होती है। तलाक के मामले में यह आम तौर पर करीब तीन महीने की होती है। इस दौरान महिला का खर्च उठाना पति का फर्ज माना जाता है।
तीन मामले जो तस्वीर दिखाते हैं
रिपोर्टों में शहर के तीन ऐसे मामलों का जिक्र है, जो इस समस्या की गंभीरता बताते हैं:
जाजमऊ का मामला: यहां की एक महिला का पति से विवाद के बाद तलाक हो गया। शरीअत के अनुसार इद्दत के तीन महीने के दौरान नफका देना जरूरी था, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार पति ने कोई खर्च नहीं दिया। महिला को शरई अदालत जाना पड़ा, जहां उलेमा ने पति को इद्दत का पूरा खर्च देने का आदेश दिया।
चमनगंज का मामला: पति से अनबन के बाद एक महिला अपने दो छोटे बच्चों के साथ आठ महीने से मायके में रह रही है। रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान पति ने न तो हालचाल पूछा और न ही बच्चों की पढ़ाई, दूध या दवा के लिए कोई पैसा भेजा। महिला ने शरई अदालत में अर्जी देकर मांग की है कि बच्चों की परवरिश की आर्थिक जिम्मेदारी पति पर तय की जाए।
बाबूपुरवा का मामला: रिपोर्ट के अनुसार यहां एक व्यक्ति ने पहली पत्नी को बताए बिना दूसरी शादी कर ली और पहली पत्नी व चार साल की बेटी को घर से बेसहारा कर दिया। बच्ची की स्कूल फीस तक नहीं दी जा रही। शरई अदालत ने पति को तलब किया है, ताकि बच्ची के भविष्य के खर्च पर फैसला हो सके।
उलेमा क्या कहते हैं
सुन्नी दारुलकजा रजबी रोड के नायब शहर काजी कारी सगीर आलम हबीबी का कहना है कि पुरुषों में जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। उनके अनुसार शरीअत में पत्नी और बच्चों का खर्च देना पति का फर्ज है, फिर भी महिलाओं को अपने ही हक के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
दारुलकजा के अध्यक्ष मुफ्ती अब्दुल रशीद ने बताया कि ऐसे मामलों में आपसी सहमति और काउंसलिंग के जरिए महिलाओं को उनका हक दिलाने की कोशिश की जाती है। उनके अनुसार हर महीने ऐसे मामले आ रहे हैं और ज्यादातर का निपटारा बातचीत से कराया जाता है।
शरई अदालत की भूमिका और सीमाएं
दारुलकजा या शरई अदालतें समुदाय के भीतर विवादों को आपसी बातचीत और मध्यस्थता से सुलझाने का काम करती हैं। इनका फायदा यह है कि मामले जल्दी, कम खर्च में और परिवार की निजता बनाए रखते हुए सुलझ सकते हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि ये सरकारी अदालतें नहीं हैं। इनके फैसले दोनों पक्षों की सहमति पर टिके होते हैं और इन्हें देश के कानून की तरह लागू नहीं कराया जा सकता। अगर एक पक्ष फैसला न माने, तो महिला को कानूनी अदालत का रास्ता अपनाना पड़ता है।
महिलाओं के कानूनी अधिकार
देश का कानून हर महिला को, चाहे वह किसी भी धर्म की हो, अपने और अपने बच्चों के भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार देता है:
भरण-पोषण का कानूनी प्रावधान: पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 की जगह अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में यह प्रावधान मौजूद है। इसके तहत पत्नी, बच्चे और माता-पिता भरण-पोषण मांग सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि मुस्लिम महिलाएं भी इस सामान्य कानून के तहत अपने पति से भरण-पोषण का दावा कर सकती हैं।
परिवार न्यायालय: कानपुर में परिवार न्यायालय ऐसे मामलों की सुनवाई करता है।
मुफ्त कानूनी मदद: जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) आर्थिक रूप से कमजोर लोगों और महिलाओं को मुफ्त वकील उपलब्ध कराता है।
महिला हेल्पलाइन 181: घरेलू हिंसा या उत्पीड़न की स्थिति में मदद के लिए।
बच्चों पर सबसे बड़ा असर
पति-पत्नी के विवाद का सबसे बड़ा असर बच्चों पर पड़ता है। खर्च न मिलने से उनकी पढ़ाई छूट सकती है, सेहत पर असर पड़ता है और मानसिक तनाव भी बढ़ता है। काउंसलर मानते हैं कि विवाद कैसा भी हो, बच्चों की जरूरतें कभी भी टकराव का हिस्सा नहीं बननी चाहिए।
काउंसलिंग क्यों है जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि कई विवाद शुरुआत में ही बातचीत से सुलझ सकते हैं। आर्थिक तंगी, संयुक्त परिवार का दबाव, संवाद की कमी और एक-दूसरे पर भरोसे की कमी अक्सर विवाद की बड़ी वजह बनते हैं। समय पर काउंसलिंग मिलने से रिश्ता बच सकता है, और अगर अलगाव तय हो, तो भी वह सम्मान और जिम्मेदारी के साथ हो सकता है।
kanpur.live समाज से जुड़े ऐसे मुद्दों पर आगे भी रिपोर्ट करता रहेगा।
समाज की भूमिका
जानकारों का कहना है कि परिवार टूटने की स्थिति में समाज और रिश्तेदारों की भूमिका भी बहुत अहम होती है। अगर शुरुआती दौर में ही बड़े-बुजुर्ग, धार्मिक रहनुमा या काउंसलर बीच में आकर बातचीत कराएं, तो कई मामले अदालत तक पहुंचने से पहले ही सुलझ सकते हैं। साथ ही, महिलाओं को उनके अधिकारों की जानकारी देना भी जरूरी है, ताकि वे मजबूरी में चुप न रहें।
लड़कियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि लड़कियों की अच्छी शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता उन्हें ऐसे हालात में मजबूती से खड़े रहने की ताकत देती है। जो महिलाएं खुद कमाती हैं, वे बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ अपने हक की लड़ाई भी बेहतर ढंग से लड़ पाती हैं। सरकार की कौशल विकास योजनाएं और स्वयं सहायता समूह इस दिशा में मददगार हो सकते हैं।
kanpur.live की राय
पारिवारिक विवाद निजी होते हुए भी पूरे समाज को प्रभावित करते हैं। जरूरी है कि महिलाएं और बच्चे किसी भी हालत में बेसहारा न छोड़े जाएं। चाहे समुदाय के भीतर की व्यवस्था हो या देश की अदालतें, दोनों का मकसद कमजोर पक्ष को उसका हक दिलाना होना चाहिए। हम ऐसे विषयों पर संवेदनशीलता के साथ रिपोर्ट करते रहेंगे।
जरूरत पड़ने पर महिलाएं जिला प्रोबेशन कार्यालय और वन स्टॉप सेंटर से भी परामर्श और सहायता ले सकती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1. कानपुर की शरई अदालतों में हर महीने कितने मामले आ रहे हैं? रिपोर्टों के अनुसार औसतन करीब 30 मामले।
प्रश्न 2. नफका का मतलब क्या है? भरण-पोषण, यानी खाना, कपड़ा और रहने का खर्च।
प्रश्न 3. इद्दत कितने समय की होती है? तलाक के मामले में आम तौर पर करीब तीन महीने।
प्रश्न 4. क्या शरई अदालत का फैसला कानूनी रूप से लागू होता है? नहीं, यह आपसी सहमति पर आधारित होता है। कानूनी रूप से लागू कराने के लिए सरकारी अदालत जाना होता है।
प्रश्न 5. क्या मुस्लिम महिलाएं सामान्य कानून के तहत भरण-पोषण मांग सकती हैं? हां, सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2024 में यह स्पष्ट किया था।
प्रश्न 6. मुफ्त कानूनी मदद कहां मिलती है? जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) से, जो जिला न्यायालय परिसर में होता है।
प्रश्न 7. घरेलू हिंसा की स्थिति में कहां मदद मिलेगी? महिला हेल्पलाइन 181 या आपात स्थिति में 112 पर संपर्क करें।
स्रोत: दारुलकजा और काउंसलिंग सेंटर्स के आंकड़ों पर आधारित स्थानीय रिपोर्ट, 24 सितंबर 2026।