Dr. Piyush Mishra, who views medicine as a form of devotion: A 'guardian' of patients, transcending the constraints of time.
health - Wed Jul 01

चिकित्सा को 'तपस्या' मानने वाले डॉ. पियूष मिश्रा: समय की बेड़ियों से परे मरीजों के 'संरक्षक'
कानपुर। चिकित्सा जगत में अकसर डॉक्टरों की कार्यशैली घड़ी की सुइयों की मोहताज होती है, लेकिन कानपुर में एक ऐसा नाम है जो इस लकीर को मिटाकर मानवीय संवेदनाओं की नई इबारत लिख रहा है। नाम है डॉ. पियूष मिश्रा। सरकारी अस्पतालों में ओपीडी का समय भले ही दोपहर दो बजे की घंटी के साथ समाप्त हो जाता हो, लेकिन डॉ. मिश्रा के लिए 'सेवा का समय' तब तक जारी रहता है, जब तक कि अंतिम मरीज का उपचार सुनिश्चित न हो जाए। उनके लिए चिकित्सा महज एक पेशा नहीं, बल्कि एक कठिन 'तपस्या' है।
सेवा और समर्पण का पर्याय
डॉ. पियूष मिश्रा की कार्यशैली का सबसे बड़ा पहलू वह आत्मीयता है जो वे मरीजों को उपचार के साथ प्रदान करते हैं। एक मरीज के लिए चिकित्सक केवल रोग दूर करने वाला ही नहीं, बल्कि एक 'संरक्षक' की भूमिका में होता है—डॉ. मिश्रा ने इस विश्वास को धरातल पर जीवंत किया है। दिन हो या रात, मरीजों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने का उनका भाव ही उन्हें जन-जन के बीच एक अलग पहचान दिलाता है।
अस्पताल में बदलाव की बयार
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMS) के रूप में कार्यभार संभालने के बाद से ही डॉ. मिश्रा ने अस्पताल की कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की पहल की है। उनकी दृष्टि स्पष्ट है—कांशीराम ट्रामा सेंटर एवं संयुक्त चिकित्सालय को एक ऐसे अत्याधुनिक और संसाधन-युक्त 'आदर्श अस्पताल' के रूप में स्थापित करना, जहाँ गरीब से गरीब मरीज को भी विश्वस्तरीय सुविधाएं सुलभ हो सकें। उनके प्रयासों से अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार की एक नई उम्मीद जगी है।
प्रेरणा का एक दीपक
डॉ. मिश्रा का दृढ़ मानना है कि अस्पताल की चारदीवारी केवल इलाज की जगह नहीं, बल्कि यह उम्मीदों का केंद्र है। वे उस विरले वर्ग के चिकित्सक हैं, जो अपने कर्तव्य को 'पूजा' और पीड़ित मानवता की सेवा को 'धर्म' मानकर निभा रहे हैं।
डॉ. पियूष मिश्रा का व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि यदि मन में सेवा का संकल्प अडिग हो, तो एक डॉक्टर न केवल बीमारियों का उपचार करता है, बल्कि मरीजों के दिलों में भी जगह बनाता है। समाज को आज डॉ. मिश्रा जैसे संवेदनशील और समर्पित व्यक्तित्वों की नितांत आवश्यकता है, जो व्यवस्था के भीतर रहकर भी अपनी मानवता की मशाल को बुझने नहीं देते।
चिकित्सा को 'तपस्या' मानने वाले डॉ. पियूष मिश्रा: समय की बेड़ियों से परे मरीजों के 'संरक्षक'
चिकित्सा को 'तपस्या' मानने वाले डॉ. पियूष मिश्रा: समय की बेड़ियों से परे मरीजों के 'संरक्षक'
कानपुर। चिकित्सा जगत में अकसर डॉक्टरों की कार्यशैली घड़ी की सुइयों की मोहताज होती है, लेकिन कानपुर में एक ऐसा नाम है जो इस लकीर को मिटाकर मानवीय संवेदनाओं की नई इबारत लिख रहा है। नाम है डॉ. पियूष मिश्रा। सरकारी अस्पतालों में ओपीडी का समय भले ही दोपहर दो बजे की घंटी के साथ समाप्त हो जाता हो, लेकिन डॉ. मिश्रा के लिए 'सेवा का समय' तब तक जारी रहता है, जब तक कि अंतिम मरीज का उपचार सुनिश्चित न हो जाए। उनके लिए चिकित्सा महज एक पेशा नहीं, बल्कि एक कठिन 'तपस्या' है।
सेवा और समर्पण का पर्याय
डॉ. पियूष मिश्रा की कार्यशैली का सबसे बड़ा पहलू वह आत्मीयता है जो वे मरीजों को उपचार के साथ प्रदान करते हैं। एक मरीज के लिए चिकित्सक केवल रोग दूर करने वाला ही नहीं, बल्कि एक 'संरक्षक' की भूमिका में होता है—डॉ. मिश्रा ने इस विश्वास को धरातल पर जीवंत किया है। दिन हो या रात, मरीजों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने का उनका भाव ही उन्हें जन-जन के बीच एक अलग पहचान दिलाता है।
अस्पताल में बदलाव की बयार
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMS) के रूप में कार्यभार संभालने के बाद से ही डॉ. मिश्रा ने अस्पताल की कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की पहल की है। उनकी दृष्टि स्पष्ट है—कांशीराम ट्रामा सेंटर एवं संयुक्त चिकित्सालय को एक ऐसे अत्याधुनिक और संसाधन-युक्त 'आदर्श अस्पताल' के रूप में स्थापित करना, जहाँ गरीब से गरीब मरीज को भी विश्वस्तरीय सुविधाएं सुलभ हो सकें। उनके प्रयासों से अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार की एक नई उम्मीद जगी है।
प्रेरणा का एक दीपक
डॉ. मिश्रा का दृढ़ मानना है कि अस्पताल की चारदीवारी केवल इलाज की जगह नहीं, बल्कि यह उम्मीदों का केंद्र है। वे उस विरले वर्ग के चिकित्सक हैं, जो अपने कर्तव्य को 'पूजा' और पीड़ित मानवता की सेवा को 'धर्म' मानकर निभा रहे हैं।
डॉ. पियूष मिश्रा का व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि यदि मन में सेवा का संकल्प अडिग हो, तो एक डॉक्टर न केवल बीमारियों का उपचार करता है, बल्कि मरीजों के दिलों में भी जगह बनाता है। समाज को आज डॉ. मिश्रा जैसे संवेदनशील और समर्पित व्यक्तित्वों की नितांत आवश्यकता है, जो व्यवस्था के भीतर रहकर भी अपनी मानवता की मशाल को बुझने नहीं देते।