Begum akhtar suron ki wo dastan jo kabhi khatam nahi hoti-
kanpur - Fri Jun 26

बेगम अख्तर, जिन्हें हम प्यार से 'मल्लिका-ए-ग़ज़ल' कहते हैं, महज़ एक गायिका नहीं थीं; वे एक अहसास थीं। उनकी आवाज़ में वह टीस थी, जो सीधे रूह को छू लेती थी। आपने जिन रचनाओं का ज़िक्र किया, वे सिर्फ गीत नहीं, बल्कि बेगम साहिबा की रूहानी विरासत के हिस्से हैं।
आइए, इन्हीं सदाबहार नग्मों को एक नए और भावुक नज़रिया से महसूस करते हैं:
बेगम अख्तर: सुरों की वो दास्तां, जो कभी खत्म नहीं होती
उनकी गायकी में महफ़िल की रौनक भी थी और तन्हाई का सन्नाटा भी। उनकी आवाज़ का जादू इन चुनिंदा रचनाओं में कुछ इस तरह झलकता है:
१. दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
यह ग़ज़ल बेगम साहिबा की वो पुकार है, जो किसी भी पत्थर दिल को मोम कर दे। इसमें एक ऐसी रवानगी है जो सुनने वाले को अपने इर्द-गिर्द की दुनिया से बेखबर कर देती है। यह रचना इश्क़ में फना होने का दूसरा नाम है।
२. वो जो हम में तुम में क़रार था
मोमिन ख़ाँ मोमिन के इन शेरों को बेगम अख्तर ने जिस दर्द के साथ पिरोया, वह आज भी एक पुरानी यादों के संदूक को खोलने जैसा है। उनकी आवाज़ में यह ग़ज़ल एक बीते हुए सुनहरे दौर की वो आह है, जो ताउम्र कानों में गूंजती रहती है।
३. ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
मोहब्बत का दस्तूर क्या है, और उसका आखिरी अंजाम क्या हो सकता है—इसे बेगम अख्तर से बेहतर कोई नहीं गा सका। इस ग़ज़ल को सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे हर लफ़्ज़ से आँसू छलक रहे हों। यह विरह की चरम सीमा है।
४. ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी को आम आदमी के दिल तक पहुँचाने का श्रेय बेगम साहिबा को ही जाता है। उनकी आवाज़ में एक ठहराव था, एक गम्भीरता थी, जो ग़ालिब के जटिल लफ़्ज़ों को भी बेहद आसान और असरदार बना देती थी।
५. मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा
यह ग़ज़ल नहीं, एक शिकायत है उस हमसफ़र से जिसने वफ़ा के नाम पर दग़ा दिया। बेगम अख्तर ने इसे इतनी शिद्दत और बारीकी से गाया है कि लगता है जैसे वह महज़ गाना नहीं गा रही हैं, बल्कि किसी का टूटा हुआ दिल कुरेद रही हैं।
६. हमारी अटरिया पे आओ सांवरिया
जब बात बेगम अख्तर की हो, तो उनकी अदाओं और नज़ाकत को कैसे भुलाया जा सकता है? यह दादरा सुनते ही आँखों के सामने वो पुरानी लखनऊ की शामें, वो तहज़ीब और वो चुलबुलापन ताज़ा हो जाता है। यह रचना दिखाती है कि वे केवल ग़म ही नहीं, बल्कि शोखियों की भी मल्लिका थीं।
एक अनकही बात: बेगम अख्तर की गायकी सिर्फ सुरों का मेल नहीं थी, वह 'दर्द' का एक ऐसा तसव्वुर था, जिसे सुनने वाला हमेशा के लिए अपना बना लेता है। उनकी हर गज़ल, हर ठुमरी एक किताब की तरह है, जिसे आप जितनी बार खोलेंगे, हर बार एक नया अर्थ और नया दर्द पाएंगे।
बेगम साहिबा का कौन सा नग़मा आपके ज़हन के सबसे करीब है, जिसे सुनकर आपको लगता है कि वक्त ठहर गया है
बेगम अख्तर: सुरों की वो दास्तां, जो कभी खत्म नहीं होती
बेगम अख्तर, जिन्हें हम प्यार से 'मल्लिका-ए-ग़ज़ल' कहते हैं, महज़ एक गायिका नहीं थीं; वे एक अहसास थीं। उनकी आवाज़ में वह टीस थी, जो सीधे रूह को छू लेती थी। आपने जिन रचनाओं का ज़िक्र किया, वे सिर्फ गीत नहीं, बल्कि बेगम साहिबा की रूहानी विरासत के हिस्से हैं।
आइए, इन्हीं सदाबहार नग्मों को एक नए और भावुक नज़रिया से महसूस करते हैं:
बेगम अख्तर: सुरों की वो दास्तां, जो कभी खत्म नहीं होती
उनकी गायकी में महफ़िल की रौनक भी थी और तन्हाई का सन्नाटा भी। उनकी आवाज़ का जादू इन चुनिंदा रचनाओं में कुछ इस तरह झलकता है:
१. दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
यह ग़ज़ल बेगम साहिबा की वो पुकार है, जो किसी भी पत्थर दिल को मोम कर दे। इसमें एक ऐसी रवानगी है जो सुनने वाले को अपने इर्द-गिर्द की दुनिया से बेखबर कर देती है। यह रचना इश्क़ में फना होने का दूसरा नाम है।
२. वो जो हम में तुम में क़रार था
मोमिन ख़ाँ मोमिन के इन शेरों को बेगम अख्तर ने जिस दर्द के साथ पिरोया, वह आज भी एक पुरानी यादों के संदूक को खोलने जैसा है। उनकी आवाज़ में यह ग़ज़ल एक बीते हुए सुनहरे दौर की वो आह है, जो ताउम्र कानों में गूंजती रहती है।
३. ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
मोहब्बत का दस्तूर क्या है, और उसका आखिरी अंजाम क्या हो सकता है—इसे बेगम अख्तर से बेहतर कोई नहीं गा सका। इस ग़ज़ल को सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे हर लफ़्ज़ से आँसू छलक रहे हों। यह विरह की चरम सीमा है।
४. ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी को आम आदमी के दिल तक पहुँचाने का श्रेय बेगम साहिबा को ही जाता है। उनकी आवाज़ में एक ठहराव था, एक गम्भीरता थी, जो ग़ालिब के जटिल लफ़्ज़ों को भी बेहद आसान और असरदार बना देती थी।
५. मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा
यह ग़ज़ल नहीं, एक शिकायत है उस हमसफ़र से जिसने वफ़ा के नाम पर दग़ा दिया। बेगम अख्तर ने इसे इतनी शिद्दत और बारीकी से गाया है कि लगता है जैसे वह महज़ गाना नहीं गा रही हैं, बल्कि किसी का टूटा हुआ दिल कुरेद रही हैं।
६. हमारी अटरिया पे आओ सांवरिया
जब बात बेगम अख्तर की हो, तो उनकी अदाओं और नज़ाकत को कैसे भुलाया जा सकता है? यह दादरा सुनते ही आँखों के सामने वो पुरानी लखनऊ की शामें, वो तहज़ीब और वो चुलबुलापन ताज़ा हो जाता है। यह रचना दिखाती है कि वे केवल ग़म ही नहीं, बल्कि शोखियों की भी मल्लिका थीं।
एक अनकही बात: बेगम अख्तर की गायकी सिर्फ सुरों का मेल नहीं थी, वह 'दर्द' का एक ऐसा तसव्वुर था, जिसे सुनने वाला हमेशा के लिए अपना बना लेता है। उनकी हर गज़ल, हर ठुमरी एक किताब की तरह है, जिसे आप जितनी बार खोलेंगे, हर बार एक नया अर्थ और नया दर्द पाएंगे।
बेगम साहिबा का कौन सा नग़मा आपके ज़हन के सबसे करीब है, जिसे सुनकर आपको लगता है कि वक्त ठहर गया है।
आइए, इन्हीं सदाबहार नग्मों को एक नए और भावुक नज़रिया से महसूस करते हैं:
बेगम अख्तर: सुरों की वो दास्तां, जो कभी खत्म नहीं होती
उनकी गायकी में महफ़िल की रौनक भी थी और तन्हाई का सन्नाटा भी। उनकी आवाज़ का जादू इन चुनिंदा रचनाओं में कुछ इस तरह झलकता है:
१. दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
यह ग़ज़ल बेगम साहिबा की वो पुकार है, जो किसी भी पत्थर दिल को मोम कर दे। इसमें एक ऐसी रवानगी है जो सुनने वाले को अपने इर्द-गिर्द की दुनिया से बेखबर कर देती है। यह रचना इश्क़ में फना होने का दूसरा नाम है।
२. वो जो हम में तुम में क़रार था
मोमिन ख़ाँ मोमिन के इन शेरों को बेगम अख्तर ने जिस दर्द के साथ पिरोया, वह आज भी एक पुरानी यादों के संदूक को खोलने जैसा है। उनकी आवाज़ में यह ग़ज़ल एक बीते हुए सुनहरे दौर की वो आह है, जो ताउम्र कानों में गूंजती रहती है।
३. ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
मोहब्बत का दस्तूर क्या है, और उसका आखिरी अंजाम क्या हो सकता है—इसे बेगम अख्तर से बेहतर कोई नहीं गा सका। इस ग़ज़ल को सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे हर लफ़्ज़ से आँसू छलक रहे हों। यह विरह की चरम सीमा है।
४. ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी को आम आदमी के दिल तक पहुँचाने का श्रेय बेगम साहिबा को ही जाता है। उनकी आवाज़ में एक ठहराव था, एक गम्भीरता थी, जो ग़ालिब के जटिल लफ़्ज़ों को भी बेहद आसान और असरदार बना देती थी।
५. मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा
यह ग़ज़ल नहीं, एक शिकायत है उस हमसफ़र से जिसने वफ़ा के नाम पर दग़ा दिया। बेगम अख्तर ने इसे इतनी शिद्दत और बारीकी से गाया है कि लगता है जैसे वह महज़ गाना नहीं गा रही हैं, बल्कि किसी का टूटा हुआ दिल कुरेद रही हैं।
६. हमारी अटरिया पे आओ सांवरिया
जब बात बेगम अख्तर की हो, तो उनकी अदाओं और नज़ाकत को कैसे भुलाया जा सकता है? यह दादरा सुनते ही आँखों के सामने वो पुरानी लखनऊ की शामें, वो तहज़ीब और वो चुलबुलापन ताज़ा हो जाता है। यह रचना दिखाती है कि वे केवल ग़म ही नहीं, बल्कि शोखियों की भी मल्लिका थीं।
एक अनकही बात: बेगम अख्तर की गायकी सिर्फ सुरों का मेल नहीं थी, वह 'दर्द' का एक ऐसा तसव्वुर था, जिसे सुनने वाला हमेशा के लिए अपना बना लेता है। उनकी हर गज़ल, हर ठुमरी एक किताब की तरह है, जिसे आप जितनी बार खोलेंगे, हर बार एक नया अर्थ और नया दर्द पाएंगे।
बेगम साहिबा का कौन सा नग़मा आपके ज़हन के सबसे करीब है, जिसे सुनकर आपको लगता है कि वक्त ठहर गया है