कानपुर सेंट्रल पर ठेका मजदूरी का काला सच: कानून कागज पर, शोषण जमीन पर —Javed aziz Khan संवाददाता, कानपुर
kanpur - Mon Jun 08

कानपुर सेंट्रल पर ठेका मजदूरी का काला सच: कानून कागज पर, शोषण जमीन पर
— विशेष संवाददाता, कानपुर
कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन — उत्तर भारत के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक। रोज लाखों यात्री यहाँ से गुजरते हैं। प्लेटफॉर्म चमकते हैं, शौचालय साफ दिखते हैं, सामान ढोया जाता है — लेकिन यह सफाई और सेवा जिनके हाथों से होती है, वे खुद किस हाल में जी रहे हैं? यह सवाल न रेलवे प्रशासन पूछता है, न ठेकेदार — और न ही वह व्यवस्था जो इन सबकी निगरानी के लिए बनी है।
₹20,358 का हक, मिलते हैं ₹7,000
केंद्र सरकार ने स्वयं अक्टूबर 2024 से "A" श्रेणी क्षेत्रों में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन ₹783 प्रतिदिन यानी ₹20,358 प्रतिमाह निर्धारित किया है। रेलवे केंद्र सरकार का प्रतिष्ठान है — इसलिए यही दर यहाँ लागू होती है, राज्य की दर नहीं।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कानपुर सेंट्रल पर आउटसोर्सिंग कंपनियों के जरिये काम करने वाले सफाईकर्मियों, कुलियों और सहायक कर्मचारियों को ₹7,000 से ₹13,000 प्रतिमाह के बीच भुगतान किया जा रहा है। यानी उनके कानूनी हक का मात्र 35 से 40 प्रतिशत।
बाकी पैसा कहाँ जाता है? यह प्रश्न जितना सरल है, उत्तर उतना ही असुविधाजनक।
CAG ने किया था खुलासा — फिर भी कुछ नहीं बदला
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की रिपोर्ट संख्या 19/2018 — जो संसद में पेश की जा चुकी है — इस पूरे तंत्र का सरकारी आईना है। CAG ने रेलवे के 463 अनुबंधों की जाँच की और जो पाया, वह चौंकाने वाला था:
285 अनुबंधों में ठेकेदारों ने श्रम आयुक्त कार्यालय को कोई विवरणी ही जमा नहीं की
120 अनुबंधों के रिकॉर्ड और रजिस्टर ऑडिट को उपलब्ध ही नहीं कराए गए
मात्र 10 प्रतिशत अनुबंधों में श्रमिकों को उनकी रोजगार की शर्तें बताई गई थीं
₹0.96 करोड़ की ESI राशि काटी ही नहीं गई या काटकर ESIC में जमा नहीं हुई — और रेलवे प्रशासन ने वसूली के लिए कोई कदम नहीं उठाया
यह रिपोर्ट सात साल पुरानी है। व्यवस्था आज भी वैसी ही है।
ठेकेदार कमाते हैं करोड़, मजदूर को मिलते हैं टुकड़े
रेलवे से आउटसोर्सिंग अनुबंध लाखों-करोड़ों का होता है। एक ठेकेदार को ₹8 से ₹20 लाख प्रतिवर्ष तक का अनुबंध मिलता है — जिसमें श्रमिकों के वेतन, PF, ESI और अन्य देनदारियाँ शामिल मानी जाती हैं। लेकिन शोषण का यह तंत्र कई परतों में काम करता है:
नकद भुगतान — ताकि कोई रिकॉर्ड न रहे। PF और ESI की कटौती — पर जमा कहीं नहीं। फर्जी हाजिरी रजिस्टर — ताकि ओवरटाइम का हिसाब न हो। बैंक खाते ठेकेदार के नियंत्रण में — ताकि मजदूर सवाल न कर सके।
और सबसे बड़ी विडंबना — रेलवे स्वयं "Principal Employer" है। Contract Labour (Regulation and Abolition) Act 1970 के तहत वह ठेकेदार के हर उल्लंघन के लिए सीधे जिम्मेदार है। फिर भी वह "हमें नहीं पता" की मुद्रा में बैठा रहता है।
कानून नए आए, क्रियान्वयन वही पुराना
नवंबर 2025 में देश में चार नई श्रम संहिताएं लागू हो गईं। वेतन संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, व्यावसायिक सुरक्षा संहिता और औद्योगिक संबंध संहिता — ये सब मिलकर श्रमिकों को मजबूत अधिकार देती हैं।
नई संहिता कहती है:
ओवरटाइम का दोगुना भुगतान अनिवार्य
वेतन हर माह की 7 तारीख तक देना जरूरी
भत्ते अगर कुल पारिश्रमिक के 50% से अधिक हों, तो PF-ESI का आधार बड़ा होगा
लेकिन कानपुर सेंट्रल के मजदूरों को इन अधिकारों की जानकारी तक नहीं। और जिन्हें जानकारी है, वे चुप हैं — क्योंकि नौकरी जाने का डर, ठेकेदार की दबंगई और शिकायत के बाद कोई सुनवाई न होने का अनुभव उन्हें चुप रखता है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश — पर धरातल पर अँधेरा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में कम वेतन देने को "शोषणकारी दासता" और "दमनकारी और बाध्यकारी" बताया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि ठेका श्रमिक नियमित वेतनमान नहीं माँग सकते — परंतु न्यूनतम वेतन उनका अकाट्य अधिकार है।
अकाट्य अधिकार — लेकिन जिसे काटा जा रहा है, रोज, बिना किसी डर के।
आखिर जिम्मेदार कौन?
यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें हर कोई खुद को बेकसूर बताता है —
रेलवे कहता है: "ठेकेदार की जिम्मेदारी है।"
ठेकेदार कहता है: "जितना मिला, उतना दिया।"
श्रम विभाग कहता है: "शिकायत आए तो देखें।"
और इस त्रिकोण के केंद्र में खड़ा मजदूर — जिसके पसीने से स्टेशन चमकता है — हर महीने कानूनी हक से आधी से भी कम मजदूरी लेकर घर लौटता है।
क्या करें मजदूर भाई?
यदि आप या आपके परिजन ऐसी किसी कंपनी में काम करते हैं, तो ये रास्ते खुले हैं:
श्रम आयुक्त कार्यालय, UP — लिखित शिकायत दर्ज …
कानपुर सेंट्रल पर ठेका मजदूरी का काला सच: कानून कागज पर, शोषण जमीन पर —Javed aziz Khan संवाददाता, कानपुर
कानपुर सेंट्रल पर ठेका मजदूरी का काला सच: कानून कागज पर, शोषण जमीन पर
— विशेष संवाददाता, कानपुर
कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन — उत्तर भारत के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक। रोज लाखों यात्री यहाँ से गुजरते हैं। प्लेटफॉर्म चमकते हैं, शौचालय साफ दिखते हैं, सामान ढोया जाता है — लेकिन यह सफाई और सेवा जिनके हाथों से होती है, वे खुद किस हाल में जी रहे हैं? यह सवाल न रेलवे प्रशासन पूछता है, न ठेकेदार — और न ही वह व्यवस्था जो इन सबकी निगरानी के लिए बनी है।
₹20,358 का हक, मिलते हैं ₹7,000
केंद्र सरकार ने स्वयं अक्टूबर 2024 से "A" श्रेणी क्षेत्रों में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन ₹783 प्रतिदिन यानी ₹20,358 प्रतिमाह निर्धारित किया है। रेलवे केंद्र सरकार का प्रतिष्ठान है — इसलिए यही दर यहाँ लागू होती है, राज्य की दर नहीं।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कानपुर सेंट्रल पर आउटसोर्सिंग कंपनियों के जरिये काम करने वाले सफाईकर्मियों, कुलियों और सहायक कर्मचारियों को ₹7,000 से ₹13,000 प्रतिमाह के बीच भुगतान किया जा रहा है। यानी उनके कानूनी हक का मात्र 35 से 40 प्रतिशत।
बाकी पैसा कहाँ जाता है? यह प्रश्न जितना सरल है, उत्तर उतना ही असुविधाजनक।
CAG ने किया था खुलासा — फिर भी कुछ नहीं बदला
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की रिपोर्ट संख्या 19/2018 — जो संसद में पेश की जा चुकी है — इस पूरे तंत्र का सरकारी आईना है। CAG ने रेलवे के 463 अनुबंधों की जाँच की और जो पाया, वह चौंकाने वाला था:
285 अनुबंधों में ठेकेदारों ने श्रम आयुक्त कार्यालय को कोई विवरणी ही जमा नहीं की
120 अनुबंधों के रिकॉर्ड और रजिस्टर ऑडिट को उपलब्ध ही नहीं कराए गए
मात्र 10 प्रतिशत अनुबंधों में श्रमिकों को उनकी रोजगार की शर्तें बताई गई थीं
₹0.96 करोड़ की ESI राशि काटी ही नहीं गई या काटकर ESIC में जमा नहीं हुई — और रेलवे प्रशासन ने वसूली के लिए कोई कदम नहीं उठाया
यह रिपोर्ट सात साल पुरानी है। व्यवस्था आज भी वैसी ही है।
ठेकेदार कमाते हैं करोड़, मजदूर को मिलते हैं टुकड़े
रेलवे से आउटसोर्सिंग अनुबंध लाखों-करोड़ों का होता है। एक ठेकेदार को ₹8 से ₹20 लाख प्रतिवर्ष तक का अनुबंध मिलता है — जिसमें श्रमिकों के वेतन, PF, ESI और अन्य देनदारियाँ शामिल मानी जाती हैं। लेकिन शोषण का यह तंत्र कई परतों में काम करता है:
नकद भुगतान — ताकि कोई रिकॉर्ड न रहे। PF और ESI की कटौती — पर जमा कहीं नहीं। फर्जी हाजिरी रजिस्टर — ताकि ओवरटाइम का हिसाब न हो। बैंक खाते ठेकेदार के नियंत्रण में — ताकि मजदूर सवाल न कर सके।
और सबसे बड़ी विडंबना — रेलवे स्वयं "Principal Employer" है। Contract Labour (Regulation and Abolition) Act 1970 के तहत वह ठेकेदार के हर उल्लंघन के लिए सीधे जिम्मेदार है। फिर भी वह "हमें नहीं पता" की मुद्रा में बैठा रहता है।
कानून नए आए, क्रियान्वयन वही पुराना
नवंबर 2025 में देश में चार नई श्रम संहिताएं लागू हो गईं। वेतन संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, व्यावसायिक सुरक्षा संहिता और औद्योगिक संबंध संहिता — ये सब मिलकर श्रमिकों को मजबूत अधिकार देती हैं।
नई संहिता कहती है:
ओवरटाइम का दोगुना भुगतान अनिवार्य
वेतन हर माह की 7 तारीख तक देना जरूरी
भत्ते अगर कुल पारिश्रमिक के 50% से अधिक हों, तो PF-ESI का आधार बड़ा होगा
लेकिन कानपुर सेंट्रल के मजदूरों को इन अधिकारों की जानकारी तक नहीं। और जिन्हें जानकारी है, वे चुप हैं — क्योंकि नौकरी जाने का डर, ठेकेदार की दबंगई और शिकायत के बाद कोई सुनवाई न होने का अनुभव उन्हें चुप रखता है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश — पर धरातल पर अँधेरा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में कम वेतन देने को "शोषणकारी दासता" और "दमनकारी और बाध्यकारी" बताया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि ठेका श्रमिक नियमित वेतनमान नहीं माँग सकते — परंतु न्यूनतम वेतन उनका अकाट्य अधिकार है।
अकाट्य अधिकार — लेकिन जिसे काटा जा रहा है, रोज, बिना किसी डर के।
आखिर जिम्मेदार कौन?
यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें हर कोई खुद को बेकसूर बताता है —
रेलवे कहता है: "ठेकेदार की जिम्मेदारी है।"
ठेकेदार कहता है: "जितना मिला, उतना दिया।"
श्रम विभाग कहता है: "शिकायत आए तो देखें।"
और इस त्रिकोण के केंद्र में खड़ा मजदूर — जिसके पसीने से स्टेशन चमकता है — हर महीने कानूनी हक से आधी से भी कम मजदूरी लेकर घर लौटता है।
क्या करें मजदूर भाई?
यदि आप या आपके परिजन ऐसी किसी कंपनी में काम करते हैं, तो ये रास्ते खुले हैं:
श्रम आयुक्त कार्यालय, UP — लिखित शिकायत दर्ज …