आईआईटी कानपुर की ‘गुरु दक्षिणा’: जब एक छात्र की सफलता ने वापस आकर अपनी जड़ों को सींचा
kanpur - Thu Jun 11

कानपुर: अक्सर हम सफलता की कहानियाँ सुनते हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ तब पूरी होती हैं जब सफलता के शिखर पर पहुँचा व्यक्ति अपनी जड़ों को याद रखता है। आईआईटी कानपुर के 1969 बैच के पूर्व छात्र जगजीत सिंह बिंद्रा ने संस्थान को 11.5 मिलियन डॉलर (करीब 96 करोड़ रुपये से अधिक) की दान राशि देकर केवल एक चेक नहीं सौंपा है, बल्कि कृतज्ञता का एक नया मानक स्थापित किया है।
सफलता का वह 'गोल्डन राउंड ट्रिप'
जगजीत सिंह बिंद्रा का करियर लार्सन एंड टुब्रो से लेकर वर्ली जैसी वैश्विक कंपनियों के बोर्डरूम तक रहा है। 1969 में जब उन्होंने आईआईटी कानपुर से केमिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली थी, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह छात्र एक दिन वैश्विक औद्योगिक जगत का दिग्गज बनेगा। आज, दशकों बाद, उनकी वापसी केवल एक पूर्व छात्र की नहीं, बल्कि एक 'मेंटर' की है।
भवन ही नहीं, भविष्य की नींव
यह दान केवल ईंट और पत्थर से बनने वाले 'जेनिस एवं जगजीत बिंद्रा केमिकल इंजीनियरिंग एनेक्स' के बारे में नहीं है। यह आने वाली उन पीढ़ियों के लिए है जो 4000 वर्गमीटर में फैली अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में अपने सपनों को हकीकत में बदलेंगी।
अत्याधुनिक तकनीक: स्मार्ट कक्षाएं और शोध स्थल।
सतत जुड़ाव: यह केवल एकमुश्त दान नहीं है; बिंद्रा पिछले 30 वर्षों से संस्थान के साथ निरंतर जुड़े रहे हैं।
क्या शिक्षा का असली उद्देश्य यही है?
संस्थान के निदेशक प्रो. मणींद्र अग्रवाल ने सही कहा कि बिंद्रा का योगदान संस्थान की विभिन्न पहलों का आधार रहा है। यह घटना शिक्षाविदों और छात्रों के लिए एक बड़ा संदेश है:
संस्थान और पूर्व छात्र का रिश्ता: जब पूर्व छात्र वापस आकर अपनी संस्था को सहयोग देते हैं, तो वह संस्थान की 'इकोसिस्टम' को आत्मनिर्भर बनाता है।
विनम्रता का पाठ: इतनी बड़ी राशि को 'छोटा' और 'सौभाग्य' बताना यह दर्शाता है कि उच्च पदों पर पहुँचने के बाद भी शिक्षा के प्रति सम्मान कितना गहरा हो सकता है।
जगजीत सिंह बिंद्रा का यह कदम भारत में 'एलुमनाई गिविंग' (Alumni Giving) की संस्कृति को एक नई दिशा दे रहा है। यह खबर उन युवाओं के लिए एक मिसाल है जो आज आईआईटी की उन क्लासरूम्स में बैठ रहे हैं, जहाँ से कभी बिंद्रा ने अपनी उड़ान शुरू की थी। यह केवल पैसे का निवेश नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों में किया गया एक अटूट विश्वास है।
आईआईटी कानपुर की ‘गुरु दक्षिणा’: जब एक छात्र की सफलता ने वापस आकर अपनी जड़ों को सींचा
कानपुर: अक्सर हम सफलता की कहानियाँ सुनते हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ तब पूरी होती हैं जब सफलता के शिखर पर पहुँचा व्यक्ति अपनी जड़ों को याद रखता है। आईआईटी कानपुर के 1969 बैच के पूर्व छात्र जगजीत सिंह बिंद्रा ने संस्थान को 11.5 मिलियन डॉलर (करीब 96 करोड़ रुपये से अधिक) की दान राशि देकर केवल एक चेक नहीं सौंपा है, बल्कि कृतज्ञता का एक नया मानक स्थापित किया है।
सफलता का वह 'गोल्डन राउंड ट्रिप'
जगजीत सिंह बिंद्रा का करियर लार्सन एंड टुब्रो से लेकर वर्ली जैसी वैश्विक कंपनियों के बोर्डरूम तक रहा है। 1969 में जब उन्होंने आईआईटी कानपुर से केमिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली थी, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह छात्र एक दिन वैश्विक औद्योगिक जगत का दिग्गज बनेगा। आज, दशकों बाद, उनकी वापसी केवल एक पूर्व छात्र की नहीं, बल्कि एक 'मेंटर' की है।
भवन ही नहीं, भविष्य की नींव
यह दान केवल ईंट और पत्थर से बनने वाले 'जेनिस एवं जगजीत बिंद्रा केमिकल इंजीनियरिंग एनेक्स' के बारे में नहीं है। यह आने वाली उन पीढ़ियों के लिए है जो 4000 वर्गमीटर में फैली अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में अपने सपनों को हकीकत में बदलेंगी।
अत्याधुनिक तकनीक: स्मार्ट कक्षाएं और शोध स्थल।
सतत जुड़ाव: यह केवल एकमुश्त दान नहीं है; बिंद्रा पिछले 30 वर्षों से संस्थान के साथ निरंतर जुड़े रहे हैं।
क्या शिक्षा का असली उद्देश्य यही है?
संस्थान के निदेशक प्रो. मणींद्र अग्रवाल ने सही कहा कि बिंद्रा का योगदान संस्थान की विभिन्न पहलों का आधार रहा है। यह घटना शिक्षाविदों और छात्रों के लिए एक बड़ा संदेश है:
संस्थान और पूर्व छात्र का रिश्ता: जब पूर्व छात्र वापस आकर अपनी संस्था को सहयोग देते हैं, तो वह संस्थान की 'इकोसिस्टम' को आत्मनिर्भर बनाता है।
विनम्रता का पाठ: इतनी बड़ी राशि को 'छोटा' और 'सौभाग्य' बताना यह दर्शाता है कि उच्च पदों पर पहुँचने के बाद भी शिक्षा के प्रति सम्मान कितना गहरा हो सकता है।
जगजीत सिंह बिंद्रा का यह कदम भारत में 'एलुमनाई गिविंग' (Alumni Giving) की संस्कृति को एक नई दिशा दे रहा है। यह खबर उन युवाओं के लिए एक मिसाल है जो आज आईआईटी की उन क्लासरूम्स में बैठ रहे हैं, जहाँ से कभी बिंद्रा ने अपनी उड़ान शुरू की थी। यह केवल पैसे का निवेश नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों में किया गया एक अटूट विश्वास है।